Current Analysis

Earlier known as राजनीति this column has been re-christened as हाल फिलहाल.

एटमी करार पर सहमति नहीं है विश्वासमत

Publsihed: 27.Jul.2008, 20:37

यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि भारत के संसद में एटमी करार पर सहमति दे दी है। यूपीए लोकसभा के विश्वासमत को एटमी करार पर सहमति बताकर प्रचारित कर रहा है। यह संसद के साथ धोखे के सिवा कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी संसद के अंदर और बाहर कई बार कह चुके हैं कि विदेशों के साथ होने वाले करारों को संसद की मंजूरी का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। इन दोनों नेताओं ने वामपंथी दलों के साथ चली नौ महीने की बातचीत में भी यही तर्क पेश किया था।

देशभक्ति नहीं होगा हार-जीत का पैमाना

Publsihed: 20.Jul.2008, 20:55

मनमोहन सिंह को पहले ही पता था कि लोकसभा में उनकी सरकार के भाग्य का फैसला एटमी करार से देश को नफे-नुकसान के आधार पर नहीं होगा, अलबत्ता जोड़तोड़ और नए गठबंधन ही सरकार के भाग्य का फैसला करेंगे।

लोकसभा में मनमोहन सरकार के भाग्य का फैसला करते समय सांसद जब वोट डालेंगे, तो देशभक्ति पैमाना नहीं होगा। वैसे एटमी करार पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही देशभक्ति की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन दस फीसदी सांसदों ने भी गहराई में जाकर करार को समझने की कोशिश नहीं की। संभवत: दोनों पक्षों के पचास के करीब सांसद ही ऐसे निकलेंगे, जिन्होंने भारत-अमेरिका एटमी करार से जुड़े 1954 के अमेर

कैसे-कैसे लोग करेंगे करार का फैसला

Publsihed: 14.Jul.2008, 06:09

लोकसभा, विधानसभाओं, स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने  वालों और वोटरों के लिए अलग-अलग मापदंड तय होने चाहिए। संसद का चुनाव लड़ने का हक राष्ट्रीय दलों को हो, लोकसभा में मतदान का हक भी सिर्फ स्नातकों को हो।

अब जबकि हफ्तेभर में लोकसभा मनमोहन सरकार का भविष्य तय करेगी, तो फैसला उन मुट्ठीभर निर्दलीयों और क्षेत्रीय दलों के सांसदों पर निर्भर होगा, जिनका विचारधारा या अंतरराष्ट्रीय राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं। सरकार को संसद का जनादेश अमेरिका से एटमी करार पर  लेना है, लेकिन जब सरकार के भविष्य का फैसला होगा, तो यह मुद्दा छोटे-छोटे व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों में दब जाएगा। एटमी करार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा है, राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के ज्यादा सांसद एटमी करार के खिलाफ हैं, इसके बावजूद फैसला उनके हाथ में नहीं है।

चमक-चमक कर चूके चतुर सुजान

Publsihed: 07.Jul.2008, 05:57

कांग्रेस ने वामपंथी दलों को चार साल तक इस्तेमाल करके कूड़ेदान में फेंक दिया है। सारी दुनिया में अमेरिका विरोध का डंका बजाने वाले वामपंथी ठगे से रह गए हैं। कांग्रेस ने उन्हीं की वैसाखियों का इस्तेमाल करके अमेरिका के साथ दोस्ती का नया अध्याय शुरू कर दिया है। राजनीति में सही समय पर सही फैसला लेने का क्या मतलब होता है, यह वामपंथी दलों को अब समझ आ गया होगा। वामपंथी दलों को जुलाई 2005 में उस समय फैसला करना चाहिए था, जब न्यूनतम साझा कार्यक्रम को दरकिनार करके मनमोहन सिंह ने अमेरिका से एटमी करार किया था। सुविधावादी राजनीति और सिध्दांतवादी राजनीति एक साथ नहीं चल सकती। माकपा महासचिव प्रकाश करात पिछले तीन साल से दोनों में तालमेल करके राजनीति की नई परिभाषा लिखने की कोशिश कर रहे थे।

गिरती-पड़ती यहां तक आई सरकार

Publsihed: 30.Jun.2008, 06:16

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी के मुख्यमंत्रियों और राज्य के प्रभारी महासचिवों को बुलाकर लोकसभा चुनावों की तैयारी करने को कह दिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अब भी भरसक कोशिश है कि वामपंथियों के समर्थन वापस लेने से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से भारत के लिए नए सेफगार्ड तय हो जाएं, ताकि यूरेनियम आयात के रास्ते खुल जाएं। इसके बाद भले ही अमेरिका से वन-टू-थ्री एक्ट के तहत करार पर दस्तखत होने से पहले उनकी सरकार गिर जाए। प्रणव मुखर्जी और प्रकाश करात यही रास्ता निकालने की कोशिशों में जुटे हुए हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

करार पर चुनाव का नफा-नुकसान

Publsihed: 22.Jun.2008, 20:39

अमेरिका के साथ एटमी करार को लेकर यूपीए सरकार इतने गंभीर संकट में है कि देश पर मध्यावधि चुनावों के बादल मंडरा रहे हैं। असल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जुलाई 2005 में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के साथ एटमी करार पर साझा बयान जारी करने से पहले ही राजनीतिक मजबूरियों को समझ लेना चाहिए था। वह उन वामपंथी दलों के समर्थन से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं, जिन्हें अमेरिका फूटी आंख नहीं सुहाता।

सार्क में भी छाया रहेगा पेट और पेट्रोल

Publsihed: 16.Jun.2008, 05:47

अमेरिका का मानना है कि भारत और चीन पेट और पेट्रोल पर सबसे ज्यादा दबाव बढ़ा रहे हैं। इन दोनों देशों को अपनी आबादी को काबू में लाना होगा। सार्क सम्मेलन में भी इस बार यही अहम मुद्दा होगा।

पंजाब प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले थे। दलित समुदाय के इस नेता ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि लोकसभा चुनाव को नजदीक देखते हुए सरकार को किसानों की तरह दलितों के कर्ज भी माफ कर देने चाहिए।

अमीर बनने के कानूनी रास्ते निकाल लिए नेताओं ने

Publsihed: 07.Jun.2008, 20:40

राजनेताओं की संपत्ति में आमदनी से ज्यादा इजाफा कैसे हो जाता है। भारत की आम जनता इसे बाखूबी जानती है, लेकिन हमारा कानून नहीं जानता। आप शायद ही ऐसे किसी नेता का नाम बता सकें, जो आमदनी से ज्यादा संपत्ति पाए जाने के बाद जेल की सालाखों में गया हो। आप ऐसे अनेक नेताओं का नाम जानते होंगे, जिनके यहां आयकर के छापों में आमदनी से ज्यादा संपत्ति पाई गई, लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। सुखराम के अलावा जयललिता, लालू यादव, मायावती जैसे कितने ही नाम आप भी जानते होंगे, जो आपकी आंखों के सामने देखते-देखते करोड़पति और अरबपति हो गए।