Current Analysis

Earlier known as राजनीति this column has been re-christened as हाल फिलहाल.

पाक कुएं से निकल कर खाई की ओर

Publsihed: 31.Aug.2008, 20:39

बेनजीर भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी ने जब युसुफ रजा गिलानी को प्रधानमंत्री पद के लिए पीपीपी के उम्मीदवार के तौर पर चुना था तो पाकिस्तान में उन्हें मिस्टर सोनिया गांधी कहा गया। सोनिया गांधी के बारे में भारत और बाहर यह धारणा बनी हुई है कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की कुर्सी ठुकरा कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था। आज यह मुद्दा नहीं है कि उस समय के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और सोनिया गांधी के बीच क्या बात हुई थी।

संसदीय समिति ऐसी जांच में सक्षम नहीं

Publsihed: 24.Aug.2008, 20:39

सांसदों की खरीद-फरोख्त के मामले में जांच समिति का काम करीब-करीब पूरा हो गया है। कार्यकाल बढ़ाया नहीं गया, तो इस हफ्ते रिपोर्ट सौंप दी जाएगी। लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी भी यह मानकर चल रहे हैं कि रिपोर्ट इस हफ्ते आ जाएगी। इसलिए उन्होंने चार सितंबर को संसद की गिरती साख पर गोलमेज कांफ्रेंस बुलाने का फैसला किया है। सोमनाथ चटर्जी को एक कड़े स्पीकर के तौर पर याद किया जाएगा।

गठबंधनों पर ही निर्भर होगी चुनावी बिसात

Publsihed: 18.Aug.2008, 06:10

लाल किले के प्राचीर से मनमोहन सिंह का आखिरी भाषण लाचार प्रधानमंत्री की तरह हुआ। एक ऐसा लाचार प्रधानमंत्री जो महंगाई से लेकर आतंकवाद की समस्या तक से जूझ रहा है। इसके बावजूद सोनिया गांधी अगर उन्हीं को सामने रखकर चुनावी दंगल में कूदने का मन बना रही हैं तो कांग्रेस भारी रिस्क लेगी। लालकिले से भाषण देते समय मनमोहन सिंह के चेहरे पर जीत के कोई हाव-भाव नहीं थे।

संसदीय जांच समिति का संकट

Publsihed: 10.Aug.2008, 20:39

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में आजकल हर्षद मेहता की चर्चा है। हर्षद मेहता ने 1990-91 में पांच हजार करोड़ का शेयर घोटाला करके पूरी दुनिया को चौँका दिया था। उन्होंने इससे भी ज्यादा तब चौंकाया था जब कहा कि उन्होंने नरसिंह राव को एक करोड़ रुपए की रिश्वत से उनका मुंह बंद किया था। हर्षद मेहता ने चार नवंबर 1991 को खुद प्रधानमंत्री आवास जाकर नोटों से भरे दो सूटकेस देने की बात कही थी।

दक्षेस ही नहीं, अमेरिका भी आईएसआई से परेशान

Publsihed: 03.Aug.2008, 08:43

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन के गठन के समय ही तय हो गया था कि इस मंच से द्विपक्षीय मसले नहीं उठाए जाएंगे। अलबत्ता शिखर सम्मेलन के समय द्विपक्षीय बातचीत में आपसी मसले उठाए जा सकते हैं। इसलिए इस बात की कोई गुंजाइश ही नहीं थी कि भारत दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क-दक्षेस) के मंच से आतंकवाद के मुद्दे पर कोई दोषारोपण करेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत और अफगानिस्तान की आतंकवादी वारदातों में आईएसआई की भूमिका पर अपनी बात पाक के प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी से सीधी बातचीत में उठाना ही उचित समझा।

एटमी करार पर सहमति नहीं है विश्वासमत

Publsihed: 27.Jul.2008, 20:37

यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि भारत के संसद में एटमी करार पर सहमति दे दी है। यूपीए लोकसभा के विश्वासमत को एटमी करार पर सहमति बताकर प्रचारित कर रहा है। यह संसद के साथ धोखे के सिवा कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी संसद के अंदर और बाहर कई बार कह चुके हैं कि विदेशों के साथ होने वाले करारों को संसद की मंजूरी का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। इन दोनों नेताओं ने वामपंथी दलों के साथ चली नौ महीने की बातचीत में भी यही तर्क पेश किया था।

देशभक्ति नहीं होगा हार-जीत का पैमाना

Publsihed: 20.Jul.2008, 20:55

मनमोहन सिंह को पहले ही पता था कि लोकसभा में उनकी सरकार के भाग्य का फैसला एटमी करार से देश को नफे-नुकसान के आधार पर नहीं होगा, अलबत्ता जोड़तोड़ और नए गठबंधन ही सरकार के भाग्य का फैसला करेंगे।

लोकसभा में मनमोहन सरकार के भाग्य का फैसला करते समय सांसद जब वोट डालेंगे, तो देशभक्ति पैमाना नहीं होगा। वैसे एटमी करार पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही देशभक्ति की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन दस फीसदी सांसदों ने भी गहराई में जाकर करार को समझने की कोशिश नहीं की। संभवत: दोनों पक्षों के पचास के करीब सांसद ही ऐसे निकलेंगे, जिन्होंने भारत-अमेरिका एटमी करार से जुड़े 1954 के अमेर

कैसे-कैसे लोग करेंगे करार का फैसला

Publsihed: 14.Jul.2008, 06:09

लोकसभा, विधानसभाओं, स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने  वालों और वोटरों के लिए अलग-अलग मापदंड तय होने चाहिए। संसद का चुनाव लड़ने का हक राष्ट्रीय दलों को हो, लोकसभा में मतदान का हक भी सिर्फ स्नातकों को हो।

अब जबकि हफ्तेभर में लोकसभा मनमोहन सरकार का भविष्य तय करेगी, तो फैसला उन मुट्ठीभर निर्दलीयों और क्षेत्रीय दलों के सांसदों पर निर्भर होगा, जिनका विचारधारा या अंतरराष्ट्रीय राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं। सरकार को संसद का जनादेश अमेरिका से एटमी करार पर  लेना है, लेकिन जब सरकार के भविष्य का फैसला होगा, तो यह मुद्दा छोटे-छोटे व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों में दब जाएगा। एटमी करार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा है, राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के ज्यादा सांसद एटमी करार के खिलाफ हैं, इसके बावजूद फैसला उनके हाथ में नहीं है।

चमक-चमक कर चूके चतुर सुजान

Publsihed: 07.Jul.2008, 05:57

कांग्रेस ने वामपंथी दलों को चार साल तक इस्तेमाल करके कूड़ेदान में फेंक दिया है। सारी दुनिया में अमेरिका विरोध का डंका बजाने वाले वामपंथी ठगे से रह गए हैं। कांग्रेस ने उन्हीं की वैसाखियों का इस्तेमाल करके अमेरिका के साथ दोस्ती का नया अध्याय शुरू कर दिया है। राजनीति में सही समय पर सही फैसला लेने का क्या मतलब होता है, यह वामपंथी दलों को अब समझ आ गया होगा। वामपंथी दलों को जुलाई 2005 में उस समय फैसला करना चाहिए था, जब न्यूनतम साझा कार्यक्रम को दरकिनार करके मनमोहन सिंह ने अमेरिका से एटमी करार किया था। सुविधावादी राजनीति और सिध्दांतवादी राजनीति एक साथ नहीं चल सकती। माकपा महासचिव प्रकाश करात पिछले तीन साल से दोनों में तालमेल करके राजनीति की नई परिभाषा लिखने की कोशिश कर रहे थे।

गिरती-पड़ती यहां तक आई सरकार

Publsihed: 30.Jun.2008, 06:16

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी के मुख्यमंत्रियों और राज्य के प्रभारी महासचिवों को बुलाकर लोकसभा चुनावों की तैयारी करने को कह दिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अब भी भरसक कोशिश है कि वामपंथियों के समर्थन वापस लेने से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से भारत के लिए नए सेफगार्ड तय हो जाएं, ताकि यूरेनियम आयात के रास्ते खुल जाएं। इसके बाद भले ही अमेरिका से वन-टू-थ्री एक्ट के तहत करार पर दस्तखत होने से पहले उनकी सरकार गिर जाए। प्रणव मुखर्जी और प्रकाश करात यही रास्ता निकालने की कोशिशों में जुटे हुए हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।