कश्मीर पर मध्यस्थता की अमेरिकी-ब्रिटिश साजिश

अमेरिका के नए राष्ट्रपति बाराक ओबामा 20 जनवरी को पदभार ग्रहण कर लेंगे। चुनाव के दौरान उनके मुसलमान होने का विवाद उठा था तो उन्होंने सफाई दी थी वह हमेशा इसाई धर्म अपनाते रहे हैं। खुद को इसाई साबित करने के लिए वह अपनी शपथ में 'गॉड' शब्द का इस्तेमाल करेंगे। अदालत ने उन्हें इसकी इजाजत दे दी है, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि मुस्लिम पिता और इसाई मां की संतान बाराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ नीति क्या मोड़ लेगी। राष्ट्रपति बुश ने नाईन-इलेवन के बाद आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी तो ब्रिटेन और पाकिस्तान उनके प्रमुख सहयोगी थे। यूरोप के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन और पाकिस्तान में भी लड़ाई के खिलाफ लोग सड़कों पर प्रदर्शन करने उतरे थे। विरोध की वजह आगे चलकर इसके सभ्यताओं की जंग बनने का खतरा था। इस खतरे को राष्ट्रपति बुश भी समझते थे, इसीलिए उन्होंने भारत के सहयोग की पेशकश ठुकराकर पाकिस्तान को मदद का लालच देकर सहयोगी बनाया था।

शुरू-शुरू में राष्ट्रपति बुश अपनी रणनीति में कामयाब रहे थे, लेकिन पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ का आधार लगातार घटता गया। मुशर्रफ सरकार के बुश समर्थक होने के कारण पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार हो गया। आखिर मुशर्रफ को सत्ता से बाहर होना पड़ा। बुश के लिए संतोष की बात यह थी कि अमेरिका विरोधी नवाज शरीफ सत्ता में नहीं आए, अलबत्ता अमेरिका समर्थक आसिफ अली जरदारी सत्ता में आ गए। लेकिन जरदारी भी यह जानते हैं कि वह अमेरिकी सहयोग से ज्यादा दिन सत्ता में नहीं बने रह सकेंगे, इसलिए राष्ट्रपति जरदारी और उन्हीं की पार्टी के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी अमेरिकी प्रशासन और आतंकवादी संगठनों के साथ संतुलन बनाने की रणनीति पर चल रहे हैं। यही वजह है कि अपने आखिरी दिनों में बुश प्रशासन पाकिस्तान की बजाए भारत के करीब दिखाई देने लगा था।

भारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका का बेहतर सहयोगी होता, क्योंकि दोनों ही देश एक ही तरह के आतंकवाद का शिकार हुए थे। लेकिन राष्ट्रपति बुश ने सभ्यताओं की लड़ाई बनने की आशंकाओं को टालने के लिए साथी का गलत चुनाव किया था। यहां तक कि उस समय पाकिस्तान का सहयोग हासिल करने के लिए बुश ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की कश्मीर को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई से अलग रखने की शर्त भी मान ली थी। लेकिन जल्दी ही उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया था इसलिए 2003-04 में बुश ने मुशर्रफ पर दबाव बनाया था कि किसी भी मकसद के लिए अपनाए गए आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया जा सकता। तब अटल बिहारी वाजपेयी की दृढ़शक्ति और जार्ज बुश के दबाव में पहली बार परवेज मुशर्रफ ने कहा था कि पाक आतंकवादियों को अपनी जमीन का किसी भी देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करने देगा। लेकिन बुश की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई उस समय ही विफल हो गई जब वह पाकिस्तान के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर बंद नहीं करवा सके। बुश की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई ने उस समय पूरी तरह दो सभ्यताओं की लड़ाई का रूप ले लिया जब उन्होंने अमेरिका के आर्थिक हितों को सामने रखकर बिना सबूतों के इराक पर हमला किया। इराक को तबाह करके उस पर कब्जा करने के बावजूद वहां से सामूहिक विनाश के हथियार नहीं मिले। इसके बावजूद बुश ने सद्दाम हुसैन को फांसी दिलाकर अपने पिता के अपमान का बदला ले लिया। सारी सभ्य दुनिया इक्कीसवीं सदी के हिटलर का नंगा नाच देखती रही। संभवत: बुश ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान का अपने प्रमुख सहयोगी के तौर पर चुनाव दो कारणों से किया था। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को दो सभ्यताओं की लड़ाई दिखाई देने के आभास को खत्म करना और कमजोर सहयोगी का गलत काम का विरोध करने की क्षमता नहीं होना। भारत इन दोनों ही कारणों से उपयुक्त नहीं बैठता था। लेकिन बुश की गलत नीति ने पाकिस्तान को मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकवाद का 'एपिक सेंटर' बना दिया है, जो भारत के लिए बड़ा खतरा बन गया है।

20 जनवरी 2009 को जार्ज बुश के सत्ता से हटने के बाद आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय लड़ाई के दोनों रणनीतिकार सत्ता से बाहर हो चुके होंगे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और बुश के प्रमुख सहयोगी परवेज मुशर्रफ पहले ही सत्ता से बाहर हो चुके हैं। सत्ता हस्तांतरण से पांच दिन पहले बुश ने ब्लेयर और मुशर्रफ का आभार जताया, लेकिन इन दोनों के देशों में अब इनकी नीतियां सवालिया निशान बनी हुई हैं। ब्रिटेन के नए विदेशमंत्री डेविड मिलिबेंड ने 2001 में शुरू हुई आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को महान गलती करार दिया है। पंद्रह जनवरी को लंदन के प्रमुख अखबार 'गार्जियन' में लिखे अपने लेख में मिलिबेंड ने कहा है कि लोकतंत्र में आतंकवाद को कानून का राज स्थापित करके खत्म किया जाना चाहिए, ऐसे कदम नहीं उठाए जाने चाहिए जिनसे आतंकवाद को बढ़ावा मिले। उनका कहना है कि ग्यारह सितंबर 2001 के बाद अमेरिका और ब्रिटेन की ओर से शुरू की गई आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई ने आतंकवाद को बढ़ावा दिया है।  मिलिबेंड के तर्कों से सभ्य और लोकतांत्रिक समाज सहमत नहीं हो सकता। असल में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई बुरी नहीं थी, उसका मकसद ऐसे लोगों का खात्मा करना था जो विध्वंस फैलाकर दुनियाभर में लोकतंत्र और कानून के राज को चुनौती दे रहे थे। लेकिन जब उस लड़ाई ने राजनीतिक-आर्थिक स्वार्थपूर्ति और सभ्यताओं की लड़ाई का रूप ले लिया तो गलत दिशा में चली गई। मिलिबेंड का यह लेख ठीक उस समय छपा, जब वह भारत के दौरे पर थे और लगातार तीन दिन तक आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान की पैरवी कर रहे थे। उन्होंने मुंबई हमले के लिए जिम्मेदार पाकिस्तानी आतंकी सरगनाओं को भारत के सुपुर्द करने की मुखालफत तो की ही, हमले की वजह कश्मीर समस्या तक बता दिया। डेविड मिलिबेंड को हम अपरिपक्व कूटनीतिक मानकर खारिज नहीं कर सकते। डेविड मिलिबेंड के कुतर्क कोई भी लोकतांत्रिक देश स्वीकार नहीं कर सकता। कश्मीर विवाद का हवाला देकर आतंकी वारदात को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यही तर्क पहले परवेज मुशर्रफ देते रहे हैं और मुंबई वारदात के बाद नए राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी दिए थे।

ब्रिटिश विदेशमंत्री डेविड मिलिबेंड के बयान को अमेरिका में नए निजाम के साथ जोड़कर भी देखना पड़ेगा। मिलिबेंड ने कश्मीर का मसला उस समय उठाया है जब अमेरिका के नए राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने अपनी प्राथमिकताओं में कश्मीर को शामिल किया है। ओबामा ने राष्ट्रपति पद के चुनाव के समय जब कश्मीर के लिए विशेष दूत नियुक्त करने की बात कही थी तो भारत में कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी। लेकिन अब यह साफ होने लगा है कि बाराक ओबामा तीसरे देश की मध्यस्थता नामंजूर करने वाली भारतीय नीति के खिलाफ कश्मीर मसले पर ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ओबामा प्रशासन की ओर से संयुक्त राष्ट्र में मनोनीत किए गए राजदूत सुसान राइस ने कश्मीर को 'हाट स्पाट' करार देकर दुनिया के पांच विवादास्पद क्षेत्रों के साथ जोड़ा है। उन्होंने कश्मीर समेत जिन छह क्षेत्रों को विवादास्पद बताकर ओबामा प्रशासन की प्राथमिकता बताया है, वे सभी छह क्षेत्र मुस्लिम और गैर मुस्लिम विवाद में फंसे हुए हैं। अब जबकि ब्रिटिश विदेश मंत्री डेविड मिलिबेंड और नए अमेरिकी प्रशासन के संयुक्त राष्ट्र में राजदूत ने एक साथ कश्मीर को विवादास्पद करार दिया है, तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को विवादास्पद बनाने का कारण भी ब्रिटेन और अमेरिका ही थे। जवाहर लाल नेहरू जब पाकिस्तान की शिकायत लेकर संयुक्त राष्ट्र में गए, तो सुरक्षा परिषद ने मौका मुआइना करने के लिए आयोग भेजने का फैसला किया था। भारत ने चेकोस्लोवाकिया और पाकिस्तान ने अर्जेटीना के प्रतिनिधि का नाम दिया था। संयुक्त राष्ट्र ने बेल्जियम और कोलंबिया को स्वतंत्र प्रतिनिधि नियुक्त किया था। हालांकि आयोग के तीन सदस्य भारत के खिलाफ थे, इसके बावजूद आयोग के सदस्य सच्चाई की अनदेखी नहीं कर पाए। आयोग ने कश्मीर के भारत में विलय के कागजों की कानूनी जांच पड़ताल करके सही पाया था और यह भी सही पाया था कि कश्मीर में घुसपैठ करने वाले कबायली नहीं अलबत्ता पाकिस्तानी फौजी थे। आयोग के प्रारूप में तीन बातें कही गई थी। पहली- युध्द विराम लागू किया जाए। दूसरी- पाकिस्तान वहां से अपनी फौजें, अपने नागरिक और कबालियों को बिना शर्त हटाए। भारत कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त फौजें रखे। तीसरी- पहली और दूसरी शर्त लागू हो जाने के बाद आयोग जम्मू कश्मीर की जनता की राय लेने का रास्ता निकालेगा। भारत ने पांच शर्तों के साथ आयोग की तीनों बातें मान ली थी। पाकिस्तान की शर्तें प्रारूप का उल्लंघन करने वाली थी। इसके बाद आयोग ने पांच जनवरी 1949 को जनमत संग्रह कराने का प्रारूप पेश किया। इस बीच पाकिस्तान ने युध्द विराम और अपनी सेना हटाने के बजाए सेना बढ़ा दी और प्रारूप को प्रस्ताव पास करने के लिए पेश किए जाने से पहले अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रयूमैन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने मध्यस्थता का प्रस्ताव पेश कर दिया। अमेरिका और ब्रिटेन तब से अपनी मध्यस्थता का दबाव बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। ब्रिटिश विदेशमंत्री और अमेरिकी राजदूत के ताजा बयानों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

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