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Exclusive Articles written by Ajay Setia

सुख रामों-शिबू सोरेनों वाली पार्टी विद डिफरेंस

Publsihed: 29.Dec.2009, 10:22

अपन ने मनमोहन सिंह का भाषण पढ़ा। देवकांत बरुआ की याद आ गई। इमरजेंसी के दिन थे। चापलूसों का जमाना था। खुद्दार जेल में थे, चापलूस बाहर। इंदिरा गांधी ने बरुआ को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। तो उनने चापलूसी की सारी हदें पार कर दी थी। जब कहा- 'इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा।' यानी इंदिरा ही भारत है, भारत ही इंदिरा है। कोई नेता कितना भी बड़ा हो। देश से बड़ा नहीं होता, न बराबर। न कोई राजनीतिक दल देश से बड़ा होता है। नितिन गड़करी भाजपा के अध्यक्ष बने। तो उनने कहा- 'देश पहले, पार्टी बाद में, खुद आखिर में।' अब आप इस संदर्भ में देवकांत बरुआ के बयान को पढ़िए। इसी संदर्भ में मनमोहन सिंह का ताजा बयान देखिए। कांग्रेस का सवा सौ साला जश्न था। मनमोहन बोले- 'कांग्रेस कमजोर हुई। तो देश कमजोर होगा।' यानी इंदिरा है, तो देश है, कांग्रेस है तो देश है।

वाईएसआर की मौत के बाद आंध्र नित नए संकट में

Publsihed: 26.Dec.2009, 09:38

चौदह साल की रुचिका से छेड़छाड़ पर उन्नीस साल बाद उबल पड़ा है देश। उन्नीस साल बाद पुलिस इंस्पेक्टर शंभू प्रताप सिंह राठौर को छह महीने की सजा मिली। इस बीच वह डीजीपी बनकर रिटायर भी हो चुका। ब्यूरोक्रेसी और पालीटिशियन बचाते रहे राठौर को। राठौर ने पहले रुचिका से छेड़छाड़ की। फिर स्कूल से सस्पेंड करवा दिया। रुचिका के भाई पर चोरी का केस चलवा दिया। जिनने राठौर के खिलाफ अदालत में पीआईएल लगाई। उन पर बिजली चोरी के केस बनवा दिए। तंग आकर रुचिका ने आत्महत्या कर ली। चौटाला, बंशीलाल, भजनलाल सब सरपरस्त थे राठौर के। अब देश चाहता है- राठौर को कड़ी सजा मिले। होम मिनिस्टरी की जाग भी अब खुली। पुलिस मैडल और पेंशन रोकने पर कर रही है विचार। पर ब्यूरोक्रेसी-पालीटिशियन की सांठ-गांठ का यह कोई पहला केस नहीं।

सत्ता नहीं, समाजसेवा होगा गडक़री की बीजेपी का लक्ष्य

Publsihed: 25.Dec.2009, 09:17

अपन नितिन गड़करी से पहले मिले तो थे। पर ऐसे कभी नहीं। एक घंटे की प्रेस कांफ्रेंस। समां बांधकर रख दिया। उन लोगों को बहुत निराशा हुई। जो राष्ट्रीय राजनीति का अनाड़ी समझ बैठे थे। पहली प्रेस कांफ्रेंस में ही मनोबल तोड़ने के इरादे से पहुंचे थे कई धुंरधर। पर गड़करी को सुनकर खुद का मनोबल टूट गया। गड़करी का मुंह ताकते रह गए। बैठे-बैठे अपन को शिव खेड़ा की याद आ गई। प्रेरणा गुरु शिव खेड़ा। दिल्ली को दूसरा शिव खेड़ा मिल गया। युवाओं का मनोबल बढ़ाने वाला। श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाला। पर शिव खेड़ा हौंसला बढ़ा सकता है। चुनाव नहीं जीत सकता। ताकि सनद रहे सो बता दें- लड़कर हार चुके हैं शिव खेड़ा। बीजेपी को चुनाव जिताने का ठेका लेकर गड़करी भी नहीं आए।

जवाब नहीं बना तो स्पिन डाक्टरी पर उतरे जयराम

Publsihed: 23.Dec.2009, 10:15

अपन ने कल लिखा था- कटघरे में होंगे जयराम। सो जेटली और येचुरी ने कटघरे में खड़ा किया। दोनों पूरी तैयारी करके आए थे। येचुरी तो खुद कोपेनहेगन में थे। सो पूरे मसाले के साथ तैयार थे। मूल रूप से वकील जेटली की तैयारी का तो कहना ही क्या। अपन को पता था येचुरी पूरे जोर-शोर से नहीं घेरेंगे। आखिर जयराम रमेश का स्टैंड वही था। जो चीन का था। चीन वामपंथियों की सबसे बड़ी कमजोरी। पर येचुरी ने फिर भी उतना कम नहीं घेरा। जितना कोई वामपंथी विरोधी सोचता हो। पहले बात येचुरी की ही। पता है ना- येचुरी की सीपीएम पार्टी डी राजा की सीपीआई से बड़ी। सो अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे कुरियन ने जेटली के बाद राजा को बुलाया। तो येचुरी बिदक गए। पूछा- 'बुलाने का पैमाना क्या है?' कुरियन वामपंथियों में ऐसी जलन देख दंग रह गए। उनने कहा- 'जिसने पहले अपना नाम दिया।' बात खत्म हो गई। पर तभी कागज उलट-पलट कर देखे। तो येचुरी का लिस्ट में नाम ही नहीं मिला।

कल तो बच गए, आज कटघरे में होंगे जयराम

Publsihed: 22.Dec.2009, 10:09

तेलंगाना के डर से लोकसभा तो सिमट गई। पिछले शुक्रवार को ही सिमट गई। पर राज्यसभा अभी भी जारी। यों सत्रावसान 21 दिसंबर को होना तय था। इक्कीस की तारीख तय करने की वजह थी। वजह थी- कोपेनहेगन में हुए समझौते पर संसद में बयान देना। यह विपक्ष की मांग थी- सत्रावसान कोपेनहेगन पर बयान के बाद हो। सरकार तैयार हो गई। सो मनमोहन-जयराम के लौटने पर सत्रावसान तय हुआ। ऐसा होता तो लालकृष्ण आडवाणी का इस्तीफा भी 21 को होता। पर अपने ही बिछाए तेलंगाना जाल में कांग्रेस फंसी। तो लोकसभा से 18 को ही निजात पा ली। बीजेपी को भी अपनी पार्लियामेट्री पार्टी की मीटिंग 18 को बुलानी पड़ी। बीजेपी पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग 21 को होती। तो पार्लियामेंट्री बोर्ड 22 को बैठता। उस दिन पूरा होता राजनाथ सिंह का कार्यकाल। पर कांग्रेस तेलंगाना में फंसी। तो  बीजेपी का जलवायु परिवर्तन वक्त से पहले हो गया।

न राजनीति से संन्यास, न रथ से उतरेंगे आडवाणी

Publsihed: 19.Dec.2009, 00:00

सरकार 21 तक संसद नहीं चला पाई। तो बीजेपी ने भी सत्रावसान के साथ ही नेता पद का फैसला निपटा लिया। बीजेपी शुक्रवार को अचानक पारदर्शी हो गई। पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग मीडिया के लिए खोल दी गई। मीडिया के सामने पार्लियामेंट्री पार्टी के संविधान में संशोधन हो गया। अब पार्लियामेंट्री पार्टी अपना नेता नहीं, अलबत्ता अध्यक्ष चुनेगी। चुना हुआ अध्यक्ष लोकसभा और राज्यसभा के नेता तय करेगा। संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया वेंकैया नायडू ने। समर्थन तो सबने किया ही। सिवा लालकृष्ण आडवाणी के। जब तक संशोधन नहीं हुआ। वह अध्यक्ष नहीं चुन लिए गए। चुप्पी साधकर बैठे रहे। संशोधन हो गया। तो राजनाथ सिंह ने प्रस्ताव रखा- 'तो क्यों न हाथोंहाथ अध्यक्ष चुन लिया जाए।' आडवाणी के नाम का प्रस्ताव पेश किया- यशवंत सिन्हा ने। अपन ने सिन्हा के बार-बार आडवाणी विरोधी बयानों का जिक्र किया ही था। तो इसे अब आप नई शुरूआत मानिए।

अगला हफ्ता बीजेपी में उथल-पुथल का

Publsihed: 17.Dec.2009, 05:56

सुषमा स्वराज को रोकने के लिए ब्राह्मणवाद का फच्चर। पर अपन को कतई नहीं लगता यह फच्चर सुषमा को रोक पाएगा। आडवाणी ने सुषमा को अपनी कुर्सी देना तय कर लिया। राजनाथ सिंह की निगाह इस कुर्सी पर होगी। पर इस मामले में संघ का दखल नहीं चलेगा। संघ में जातिवाद से पद नहीं भरे जाते। सो सवाल जातीय संतुलन का होता। तो गडकरी अध्यक्ष तय न होते। आडवाणी न सिर्फ सुषमा को अपनी भावी रणनीति बता चुके थे। अलबत्ता मोहन भागवत को भी बता चुके थे। मंगलवार को आडवाणी ने सुषमा-जेटली की पीठ थपथपाई। तो वह कोई अंदरूनी राजनीतिक चाल नहीं थी। जो सुषमा की दावेदारी मजूबत करने को ऐसा कहते। आडवाणी जब फैसला कर चुके। तो उसका कारण बताने की जरूरत नहीं।

पच्चीस साल बाद खुलकर हुई चौरासी पर बहस

Publsihed: 15.Dec.2009, 09:44

पहले ज्ञानी जैल सिंह ने राष्ट्रपति होते हुए माफी मांगी। फिर सोनिया गांधी ने भी माफी मांगी। पर जख्म इतनी जल्दी नहीं भरा करते। कई बार तो भरते भी नहीं। सिखों के कत्ल-ए-आम के जख्म माफियों से नहीं भरेंगे। कांग्रेस तो बहस से भी आंख चुराती रही। आयोगों ने कत्ल-ए-आम का खुलासा कम किया। छुपाया ज्यादा। सोमवार को राज्यसभा में पहली बार खुलकर बहस हुई। तो उसका सेहरा अपन हामिद अंसारी के सिर बांधेंगे। जिनने पहली बार बहस की इजाजत दी। ऐसी बहस की इजाजत। जिसमें सिख सांसदों ने जमकर भड़ास निकाल दी। अपन त्रिलोचन को सुन रहे थे। उनने बखिया उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपन हैरान थे- त्रिलो

कांग्रेस अब तटीय आंध्र रायलसीमा हिंसा से डरी

Publsihed: 12.Dec.2009, 10:17

कांग्रेस ने मक्खियों के छत्ते में हाथ डाल लिया। तेलंगाना का ऐलान मक्खियों का छत्ता साबित हुआ। बोडोलैंड, गोरखालैंड, विदर्भ, हरितप्रदेश, बुंदेलखंड की मांग उठ गई। गोरखों ने भी चंद्रशेखर राव की तरह आमरण अनशन का ऐलान कर दिया। गोरखों को इंसाफ का वादा दिलाकर संसद में पहुंचे हैं अपने जसवंत सिंह। सो शुक्रवार को वह भी आंदोलन की आग में कूद गए। बोले- 'गोरखालैंड की मांग जायज। सरकार उसे वक्त रहते मंजूर करे।' उनने पीएम को चिट्ठी भी लिख मारी। चिट्ठी न लिखते। तो गोरखे दिल्ली में आकर घेर लेते। वैसे भी उनने सीट बीजेपी को दी थी। जसवंत सिंह को नहीं। सो जसवंत सिंह ने घेराव से डरकर गोरखालैंड का समर्थन कर दिया। अब 21 दिसंबर से गोरखालैंड समर्थक दिल्ली पहुंचेंगे। तो जसवंत सिंह आगवानी करेंगे। राहुल गांधी बुंदेलखंड का समर्थन कर ही आए थे। अब मायावती ने भी चिंगारी में फूंक मार दी।

चंद्रबाबू -जगनरेड्डी की हवा निकालेगा तेलंगाना

Publsihed: 11.Dec.2009, 00:23

लिब्रहान रपट पर चौथे दिन की बहस निपट गई। राज्यसभा में भी वही रुख रहा। बीजेपी के स्टार स्पीकर थे वेंकैया नायडू। कांग्रेस के स्टार स्पीकर थे कपिल सिब्बल। वेंकैया बोले- 'रपट को बंगाल की खाड़ी में फेंक दो।' कपिल बोले- 'बीजेपी देश से माफी मांगे।' लोकसभा और राज्यसभा की बहस में फर्क सिर्फ एक रहा। लोकसभा में रपट की खामियां गिनाती रही बीजेपी। पर राज्यसभा में जेटली और वेंकैया का जोर रामजन्म भूमि के इतिहास पर रहा। जन्मभूमि का मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के सबूत बताते रहे। पर पतनाला वहीं का वहीं। बुधवार की रात से लिब्रहान पर तेलंगाना हावी हो चुका था। कांग्रेस ने चंद्रशेखर राव के सामने घुटने टेक दिए। अमर अनशन रख चंद्रशेखर राव ने घुटने टिकवा दिए। वैसे चंद्रशेखर राव ने तो हफ्ताभर पहले अनशन तोड़ दिया था। बाकायदा नीबू-पानी पी लिया था।