विरासत को लेकर कितनी चिंतित सरकार

भारत की विरासत को लेकर जुड़ी वस्तुओं को वापस लाने की कोई स्पष्ट नीति नहीं बन पाई। महात्मा गांधी से जुड़ी वस्तुएं जब-जब नीलाम होती है, सरकार के हाथ-पांव फूल जाते हैं। नीति का ड्राफ्ट पर्यटन मंत्रालय में धूल फांक रहा है।

रामसेतु और भगवान राम के अस्तित्व की तरह इस कहानी को भी नकारा जा सकता है। अलबत्ता नकारा ही जाएगा, लेकिन यह कहानी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। बिल्कुल वैसे ही जैसे भगवान राम पैदा हुए थे और उन्होंने जानकी सीता को रावण से वापस लाने के लिए श्रीलंका पर चढाई की थी। जिसके लिए उन्होंने पुल बनाया था, जिसे हजारों सालों से रामसेतु के तौर पर जाना जाता रहा। यह कहानी कोहेनूर हीरे की है, जो फिलहाल लंदन के टावर में जड़ा है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह कहानी हम अपने परिवारों में सुनते आए हैं कि भगवान कृष्ण ने इसे जामवंत से हासिल किया था। जामवंत की बेटी जामवंती की बाद में कृष्ण से शादी हुई थी। अगर रामसेतु की तरह इस कहानी को भी नहीं मानें, तो चलो छोड़ दें। लेकिन यह तो एक एतिहासिक तथ्य है कि कोहेनूर का ताजा इतिहास हैदराबाद के गोलकुंडा शासन से शुरू होता है। ब्राजील में 1730  में पहला हीरा मिलने से पहले हैदराबाद ही दुनिया में हीरे का एकमात्र स्रोत था। तेरहवीं सदी में खिलजी शासन ने आंध्र प्रदेश के वारंगल क्षेत्र में काकत्या शासकों पर हमला कर के हीरे और सोना-जवाहारत लूटा था। इसी में यह कोहेनूर हीरा था, जो बाद में मुगल शासकों तक और फिर अंग्रेजों के कब्जे में चला गया।

गांधी की वस्तुओं को वापस लाने के लिए आए साल शोर मचता है क्योंकि गांधी के कई अनुयाई उन्हें अपने पास सहेजे हुए हैं। करीब-करीब हर साल या एक दो साल बाद गांधी की वस्तुओं को नीलाम करने की खबर हड़कंप मचा देती है। लेकिन हमने 21.6 ग्राम और 105 कैरेट का कोहेनूर का हीरा वापस लेने के लिए कितने गंभीर प्रयास किए हैं। टीपू सुल्तान भी बाकी मुगल शासकों की तरह भारत पर हमलावर था। उसने मेंगलूर से लेकर मैसूर तक हिंदुओं का कल्तेआम और धर्म परिवर्तन करवाया। उस टीपू सुल्तान की तलवार हासिल करने के लिए भारत का एक सांसद बोली लगाकर हासिल करता है। लेकिन कोहेनूर का हीरा, जो भारत की शान है, उसे हासिल करने के लिए कोई कोशिश नहीं होती। देश के सांसद कई बार मुहिम चलाते हैं, हस्ताक्षर अभियान चलता है, सरकार को ज्ञापन दिया जाता है, उसके बाद भी कुछ नहीं। लेकिन जिस सरकार को आधुनिक भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विरासत को संभालने की चिंता न हो, उसे प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लाने की चिंता कैसे होगी। आजादी के 62 साल बाद भी भारत सरकार अभी यह तय नहीं कर पाई है कि उसे अपने पूर्वजों से जुड़ी वस्तुएं भारत में लाने की क्या नीति अपनानी है।

महात्मा गांधी से जुड़ी वस्तुएं ही पिछले पद्रंह-बीस साल से नीलाम हो रही हैं। 1993, 1998 और 2007 में चार बार गांधी से जुड़ी वस्तुएं निलाम हुई और अभी हाल ही में गांधी की पांच और वस्तुएं नीलाम हुई। भारत सरकार या गांधी का नाम लेकर देश पर शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ने खुद नीलामी में हिस्सा लेकर इन वस्तुओं को हासिल करने की कोशिश नहीं की। हजारों करोड़ रुपया चुनावों में बहाने और सांसदों की खरीद-फरोख्त में करोडों रुपए खर्च करने वाले राजनीतिक दल भारतीय विरासत को लेकर चुप्पी साध लेते हैं। जब जब ऐसा मौका आया भारत सरकार की कोशिश नीलामी रोकने या अनिवासी भारतीयों के सामने मदद के लिए गिड़गिड़ाने की ही रही। मई 2007 को भारत सरकार को उस समय करारा झटका लगा जब महात्मा गांधी की हत्या से 14 दिन पहले उनकी ओर से 'हरिजन' के लिए लिखी गई चिट्ठी नीलाम घर में पहुंची। इस चिट्ठी में गांधी ने हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील की थी। गांधी की इस चिट्ठी का भारत में खासा महत्व था, भारत सरकार ने नीलामी का कड़ा विरोध किया। यह तो शुकर है कि नीलामी करवाने वाले क्रिस्टी ने आखिरी समय में बोली रोक दी और भारत सरकार को चिट्ठी हासिल करने की इजाजत दे दी। इस घटना के बाद सरकार फिर लंबी तान कर सो गई। नतीजा यह निकला कुछ महीनों बाद ही गांधी के 'यंग इंडिया' के लिए लिखे लेख नीलामी घर में जा पहुंचे। ये लेख किसने खरीदे यह अभी तक पता नहीं चल पाया है। इस घटना के बाद भारत सरकार ने भारत की विरासत को बचाने के लिए एक कमेटी बनाई। इस कमेटी की रिपोर्ट अभी भी पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी के दफ्तर में धूल फांक रही है और अब गांधी की पांच वस्तुओं की नीलामी हो गई।

हमेशा की तरफ भारत सरकार या कांग्रेस पार्टी ने इस बार भी गांधी की वस्तुएं बोली लगाकर वापस लाने की कोशिश नहीं की। हाल ही में नागपुर में हुई भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था कि कांग्रेस सिर्फ गांधी का नाम लेती है, जबकि भाजपा सच्ची गांधीवादी हो गई है। क्योंकि वही उसकी नीतियों का अनुसरण कर रही है। राजनाथ सिंह ने कहा था कि कांग्रेस के पास गांधी का क्या है। आज कांग्रेस में सिर्फ एक परिवार से जुड़ा गांधी का नाम है और इसके अलावा गांधी से जुड़ा कुछ नहीं। लेकिन गांधी की सामाजिक, आर्थिक, कूटनीतिक नीतियों पर हक जताने वाली भारतीय जनता पार्टी ही इस बार गांधी की वस्तुओं के नीलामी के वक्त कहीं दिखाई नहीं दी। कांग्रेस और मौजूदा कांग्रेस सरकार ने तो हद ही कर दी, उन्होंने शिकायतकर्ता जेम्स ओटिस को नीलामी रोकने के लिए मनाने में ही सारा वक्त गंवा दिया। जेम्स ओटिस ने भी तो गांधी में दिलचस्पी के कारण ये वस्तुएं इकट्ठी की थी। अगर उन्होंने नीलामी रोकने के लिए भारत सरकार पर गरीबों की स्वास्थ्य सेवाओं पर ज्यादा धन खर्च करने की शर्त रखी थी, तो इसमें बुराई क्या थी। उन्होंने इसके बदले में संसद पर हमला करने की साजिश रचने वाले अफजल गुरु को रिहा करने की शर्त तो नहीं रखी थी। यह ठीक है कि हमारी आर्थिक नीतियां बाहर का कोई व्यक्ति प्रभावित नहीं कर सकता, किसी को प्रभावित करने की इजाजत भी नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने उसे जिस तरीके से ठुकराया उससे उनके गांधी के प्रति  प्यार का भंडा फूट गया। आनंद शर्मा अपनी नहीं अलबत्ता अपनी सरकार की प्रतिक्रिया जाहिर कर रहे थे। आश्चर्य तो तब हुआ जब महात्मा गांधी के प्रपोत्र तुषार गांधी ने कहा कि गांधी खुद भी ऐसी शर्त को मंजूर नहीं करते। तो क्या महात्मा गांधी इस हालात पर खुश होते कि जो सरकार और पार्टी उनकी कुर्बानियों और विरासत की दुहाई देकर आज भी देश पर शासन कर रही है, वे नीलामी में हिस्सा लेने से बिदक गए। और जिस शराबखोरी के खिलाफ गांधी सारी उम्र लड़ते रहे, उसी शराबखोरी का प्रचार का धंधा करने वाले विजय माल्या ने उनकी वस्तुएं खरीद कर देश को लौटाई, क्या गांधी इस पर खुश हुए होंगे। महात्मा गांधी सारी उम्र गरीबों के लिए लड़ते रहे, उन्होंने खुद भी कम से कम वस्तुओं का इस्तेमाल करने का फैसला सिर्फ इसलिए किया था ताकि वह आम आदमी की तरह रहकर उसके करीब पहुंचना चाहते थे। इसलिए महात्मा गांधी स्वास्थ्य संबंधी जेम्स ओटिस की शर्त को कबूल ही नहीं करते, अलबत्ता भारत सरकार कबूल करने का दबाव भी बनाते। यह अलग बात है कि जो कांग्रेस उनके जीते-जी उनकी इच्छाओं का अनादर करने लगी थी, वह इस मामले में भी उनके दबाव को दरकिनार करती। बेहतर होता कि भारत सरकार जेम्स ओटिस की इच्छा का सम्मान करते हुए इसे ब्लैकमेलिंग कहकर न ठुकराती। लेकिन अब वक्त आ गया है कि सरकार भारतीय विरासत से जुड़ी वस्तुएं देश में वापस लाने के लिए नीति तय करें।

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