चुनाव आयोग को निष्पक्ष बनाने की जरूरत

मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी ने न सिर्फ  पक्षपात करने वाले आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की है, अलबत्ता आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोलजियम बनाने और रिटायरमेंट के बाद पद या राजनीति में आने की पाबंदी लगाने की सिफारिश भी की है।

मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी को देश के दो सौ सांसदों ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ शिकायत की थी। गोपालस्वामी का यह काम था कि वह उस याचिका पर अपना फैसला सुनाते। यह अलग बात है कि उन्हें अपने सहयोगी चुनाव आयुक्त के खिलाफ सिफारिश करने का हक है या नहीं। इस बात का फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगी, क्योंकि संविधान के किसी प्रावधान पर कोई मतभेद हों तो उसका फैसला केंद्रीय मंत्रिमंडल नहीं कर सकता। संवैधानिक प्रावधानों और यहां तक कि संसद की ओर से बनाए गए कानूनों की समीक्षा करना सुप्रीम कोर्ट का काम है। इसी अधिकार के तहत सुप्रीम कोर्ट संसद की ओर से पारित और राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित कई कानूनों को संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताकर रद्द कर चुकी है। संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयुक्त को हटाने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश का जिक्र है। नवीन चावला का मामला जब सुप्रीम कोर्ट में गया था, तो अदालत ने इसीलिए मुख्य चुनाव आयुक्त से राय मांगी थी। मुख्य चुनाव आयुक्त के वकील ने कहा  कि किसी चुनाव आयुक्त के खिलाफ शिकायत को संविधान के तहत उस पर कार्रवाई करने का मुख्य चुनाव आयुक्त को हक है। इस पर अदालत ने यही बात उन्हें हल्फिया बयान में देने को कही थी और हल्फिया बयान दाखिल कर दिया गया था। यह ठीक है कि सरकारी वकील ने मुख्य चुनाव आयुक्त के हक को उसी समय चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने उसे स्वीकार नहीं करते हुए कहा था- 'फिलहाल यह फैसला नहीं करते हैं कि चुनाव आयोग को अपने आप कार्रवाई का हक है या किसी की शिकायत मिलने पर।' अदालत ने याचिकाकर्ता जसवंत सिंह के वकील को सलाह दी थी कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त के पास अपील दाखिल करें। संभवत: गोपालस्वामी एनडीए का मेमोरेंडम मिलने के बाद कोई न कोई फैसला करने के लिए बाध्य थे। वह अदालत में दिए गए हल्फिया बयान से मुकर नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने नवीन चावला को जवाब देने का बाकायदा मौका दिया। नवीन चावला पर आरोप था कि वह चुनाव आयोग में कांग्रेस के हितों की रक्षा करते हैं और सभी गोपनीय सूचनाएं लीक करते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त का नोटिस मिलते ही नवीन चावला ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधिमंत्री हंसराज भारद्वाज से सलाह ली। हंसराज भारद्वाज ने नवीन चावला का जवाब विधि सचिव की ओर से भिजवाया। यह किसी चुनाव आयुक्त की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगने का सबूत है। नवीन चावला को अपने नोटिस का जवाब देने के लिए निजी वकीलों से सलाह-मशविरा करना चाहिए था, न कि उसी सरकारी अमले से, जिसके साथ उन पर सांठ-गांठ का आरोप लगा था।

मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी आयोग की बैठकों में नवीन चावला की ओर से अपनाए जाने वाले व्यवहार के भुगतभोगी और प्रत्यक्षदर्शी थे। इसलिए राष्ट्रपति को भेजी गई उनकी सिफारिश पुख्ता सबूतों के साथ है। विधिमंत्री हंसराज भारद्वाज शुरू से ही नवीन चावला को सलाह दे रहे थे, इसलिए उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश से कड़ा झटका लगा है। जिसका सबूत उनकी ओर से गोपालस्वामी के खिलाफ इस्तेमाल की गई अमर्यादित भाषा से मिलता है। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस करके न सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश को नामंजूर करने का संकेत दिया, अलबत्ता यह भी संकेत दे दिया कि नवीन चावला मुख्य चुनाव आयुक्त बनकर रहेंगे। ऐसा करके विधिमंत्री ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और केंद्रीय मंत्रिमंडल के अधिकारों की भी खिल्ली उड़ाई है। स्वाभाविक है कि वह कांग्रेस आलाकमान से मिले इशारे के बिना इस हद तक नहीं जा सकते थे। इतना काफी नहीं था, इसलिए उन्होंने यह भी कहा कि गोपालस्वामी ने अपना बुढ़ापा खराब कर लिया है। विधिमंत्री का यह कथन लोकतंत्र और संवैधानिक पद पर की गई असहनीय टिप्पणीं है। संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त का दर्जा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जैसा है। विधिमंत्री के इस कथन से यह भी साबित हुआ कि सरकारें किस प्रकार संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को उनका बुढ़ापा सुधारने का लालच देकर दुरुपयोग करती हैं। कांग्रेस के नेता गोपालस्वामी को भाजपा के इशारे पर काम करने वाला और जल्द ही भाजपा कोटे से राज्यसभा में पहुंचने की भविष्यवाणी करने लगे हैं। कांग्रेस ने बाकायदा इस तरह की खबरें भी छपवाई कि गोपालस्वामी का रिटायर होने के बाद राज्यसभा में आना तय है। कांग्रेस खुद पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल को राज्यसभा में लाकर यूपीए सरकार में मंत्री बना चुकी है। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर लांछन लगाकर उन्हें मिले संवैधानिक अधिकार को विवादास्पद बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ी। बेहतर होता कि यूपीए सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त की आयुक्त के खिलाफ सिफारिश के अधिकार पर राष्ट्रपति के माध्यम से सप्रीम कोर्ट से राय मांगती। अभी भी यही होगा, अगर सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश नामंजूर कर दी, तो सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त के संवैधानिक अधिकार की समीक्षा होगी। अगर सरकार ने उनकी सिफारिश मंजूर करके नवीन चावला को बर्खास्त कर दिया, तो नवीन चावला अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ अदालत जाएंगे।

गोपालस्वामी पर लांछन लगाने से पहले कांग्रेस के नेताओं को उनकी ओर से राष्ट्रपति को लिखी गई दूसरी चिट्ठी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अगर उन्हें इसकी जानकारी होती तो वे इस निक्रिष्ट हद तक नहीं जाते। गोपालस्वामी ने जिस दिन राष्ट्रपति को नवीन चावला  की बर्खास्तगी पर सिफारिश भेजी थी उसी दिन उन्होंने दो चिट्ठियां और लिखी थी। एक चिट्ठी में सिफारिश की गई थी कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति ऐसे कोलजियम की ओर से की जानी चाहिए, जिसमें किसी को चुनाव आयुक्त पर ऊंगली उठाने की गुंजाइश न रहे। उन्होंने सिफारिश की थी कि कोलजियम में प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता, लोकसभा स्पीकर, राज्यसभा का उपसभापति शामिल किए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि यही सिफारिश अपने रिटायरमेंट से पहले लिखी गई चिट्ठी में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त बीबी टंडन ने भी भेजी थी। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा चुनाव आयोग की निष्पक्षता के लिए आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोलजियम बनाने की मांग तब से कर रही है, जबसे नवीन चावला की नियुक्ति हुई है। गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को लिखी दूसरी चिट्ठी में मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी 1991 के कानून और 1993 के संशोधन का हवाला देते हुए कहा है कि इनमें रिटायरमेंट के बाद आयुक्तों की नियुक्तियों के बारे में कुछ नहीं कहा गया। उन्होंने राष्ट्रपति को सलाह दी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों पर रिटायरमेंट के बाद सरकारी कृपा से मिलने वाली नियुक्तियों पर रोक लगनी चाहिए। इतना ही नहीं, गोपालस्वामी ने यह भी कहा है कि उन पर रिटायरमेंट के दस साल तक किसी राजनीतिक दल में शामिल होने पर भी रोक लगनी चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी की यह दोनों सिफारिशी चिट्ठियां उन पर लगाए जा रहे आरोपों का जवाब है। गोपालस्वामी ने इस संबंध में टीएन शेषन बनाम केंद्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गई टिप्पणीं को याद कराया है। जिसमें अदालत ने कहा था- 'लोकतंत्र हमारे संविधान का मूल तत्व है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की स्वस्थ लोकतंत्र की गारंटी हो सकते हैं। लोकतंत्र में यह जरूरी है कि चुनाव करवाने वाली एजेंसी किसी भी बाहरी राजनीतिक या सरकारी दबावों से मुक्त रहे। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग का गठन करके यह लक्ष्य हासिल किया गया है।' लेकिन चुनाव आयोग तभी निष्पक्ष रह सकता है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों को अपना बुढ़ापा सुधारने का लालच न रहे। जब कानूनी तौर पर पाबंदी होगी, तो चुनाव आयोग के सदस्य किसी दबाव या लालच में काम नहीं करेंगे।

बहुत सही लिख़ा है|

बहुत सही लिख़ा है|
"लोकतंत्र में यह जरूरी है कि चुनाव करवाने वाली एजेंसी किसी भी बाहरी राजनीतिक या सरकारी दबावों से मुक्त रहे। "

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