दादागिरी पर भारी पडी अण्णागिरी

Publsihed: 10.Apr.2011, 19:45

मनमोहन सिहं इतने भोले भी नही। आधुनिक गांधी अण्णा हजारे की बातें नहीं मानने की पूरी कोशिश की थी उनने। तीन दिन तक मनमोहन सिंह के नुमाइंदे कपिल सिब्बल संविधान की दुहाई देकर समझाने-बुझाने की कोशिश कर रहे थे। अण्णा के नुमाइंदे अरविद केजरीवाल को बता रहे थे जो निवाचित नही हुए, वे कानून बनाने वाली कमेटी में कैसे आएंगे। आएंगे भी, तो सरकारी नोटिफिकेशन कैसे होगा। कपिल सिब्बल के मन में धुकधुकी भी थी, किसी ने सोनिया गांधी की रहनुमाई वाली एनएसी पर सवाल उठाया तो क्या होगा। एनएसी मैंबर कौन से चुनकर आए हैं, सारे सरकारी बिलों की हरी झंडी पहले उन्हीं से लेती है सरकार। उनके नामों की नोटिफिकेशन कैसे की थी सरकार ने।

आलोक तोमर का चला जाना

Publsihed: 29.Mar.2011, 19:02

आलोक जी के साथ बहुत पुराना रिश्ता था, भले ही मैं चंडीगढ़ जनसत्ता में था, वह दिल्ली में थे. पर हमारी मुलाकात 1989 में मेरे जनसत्ता ज्वाइन करने से पहले की थी. मैने बाद में जनसत्ता ज्वाइन किया, पर छोडा आलोक तोमर से पहले. हम दोनो जब जनसत्ता छोड चुके थे तो अक्सर मुलाकातें हुआ करतीं थी. मैने अपने जीवन में आलोक तोमर जैसा धुरंधर लिखाड नही देखा. लेखनी पर जबरदस्त पकड थी. वैसे तो प्रभाष जोशी जी ने एक बखिया उधेडने वाले छांटे थे… इसीलिए स्लोगन भी था… सबकी खबर दे, सबकी खबर ले… पर किसी की बखिया उधेडनी हो, तो आलोक तोमर की शब्दावली उधार लेनी पडती थी. आलोक तोमर जैसा खबरची और शब्दों का खिलाडी न पहले कभी हुआ, न आगे कभी होगा. आलोक ने अपने जीवन में कई प्रयोग किए. बहुत कम लोग जानते होंगें… अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोडपति प्रथम के सारे सवाल आलोक तोमर ने तैयार किए थे.

भारत-विभाजन के पीछे बहके मुसलमानों का फितूर (भाग दो)

Publsihed: 13.Dec.2010, 20:36

ईरानियों का वर्चस्व

‘ताज महल बनाने के लिए 20 हजार लोग 22 साल तक दिनरात जुटे रहे’-अपने इस वाक्य के लिए मशहूर हुआ फ्रांसीसी जवाहरात व्यापारी टेवरनिअर बताता है: ‘यहां तक कि सरदार ईरानी भगोड़े हैं, जिनकी जन्मभूमि हिन्दुस्तान नहीं है और जो दिल के बहुत छोटे हैं। ऐसे तंगदिल लोगों को उन लोगों का साथ मिल गया, जिन्होंने इस धरती को अपना सर्वस्व दे डाला।’ वह आगे लिखता है: ‘मैंने कहीं उल्लेख किया है कि मुगलों की रियाया में शामिल देशी मुसलमानों में से महज कुछ मुसलमानों को ही बड़े ओहदे हासिल थे, और यही वजह थी कि अनेक ईरानी लोग किस्मत आजमाने हिन्दुस्तान चले आए।

भारत-विभाजन के पीछे बहके मुसलमानों का फितूर (भाग एक)

Publsihed: 13.Dec.2010, 20:18

भारत को जीतने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अनेक अधिकारियों ने भारत का ‘इतिहास’ लिखा। उन्होंने जगह-जगह लिखा कि भारत पर अंग्रेजों से पहले मुसलमानों का राज था। उन्होंने अपनी इस शरारत के जरिये मुसलमानों के दिमाग में एक गलत धारणा बैठा दी, जिसका नतीजा अंतत: यह निकला कि वे बेचारे घमंड, हठधॢमता और अदम्य महात्वाकांक्षा का शिकार बन गए। इसकी परिणति 1947 में भारत-विभाजन के रूप में सामने आई। ब्रिटिश हुक्मरानों ने कहा कि उन्होंने मुसलमानों के हाथों से हुकूमत ली। इससे बड़ा झूठ तो कोई हो ही नहीं सकता।