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Indian Politics based articles

अंदरूनी लोकतंत्र से ही उपजेगा जनाधार

Publsihed: 18.Jan.2008, 20:51

अगर इस साल लोकसभा चुनाव नहीं भी हुए, तो भी आम चुनावों में अब सिर्फ सवा साल बाकी रह गया है। राजग ने छह साल केंद्र में सरकार चलाई, लेकिन आखिरी दिनों में भारतीय जनता पार्टी की इतनी बुरी हालत नहीं हुई थी, जितनी इस समय कांग्रेस की दिखाई देने लगी है। दिसंबर 2003 में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के चुनाव जीतने से भारतीय जनता पार्टी इतनी उत्साहित थी कि लोकसभा चुनाव वक्त से पहले करवा दिए। लोकसभा चुनावों में भाजपा से आठ सीटें ज्यादा जीतने से कांग्रेस इतनी उत्साहित थी कि उसे जनादेश मान बैठी।

रोटी, कपड़ा, मकान और नैनो

Publsihed: 11.Jan.2008, 20:41

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की सरकार ने आम आदमी के हित में कितने काम किए, इसका हिसाब-किताब तो अगले चुनावों में ही पता चलेगा। वैसे एक वर्ग का मानना है कि पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात ने अपना फैसला सुना दिया है। इस बड़े तबके के हिसाब से मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी आम आदमी की बात करके सत्ता तक तो पहुंचे पर आम आदमी को कोई फायदा नहीं हुआ। दूसरी तरफ आजादी से पहले के भारत के दो बड़े औद्योगिक घरानों बिड़ला और टाटा ने अचानक आम आदमी की फिक्र करना शुरू कर दिया है।

भाजपा का अश्वमेघ घोड़ा कहीं रास्ते में न रुके

Publsihed: 03.Jan.2008, 20:40

गुजरात-हिमाचल में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी में नया उत्साह आ गया है। लोकसभा चुनावों में हार के बाद से पार्टी में मुर्दनी छाई हुई थी। इस बीच पार्टी में कई प्रयोग हुए लेकिन कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं भरा जा सका था। भाजपा को निराशा के चक्रव्यूह में फसाने का काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विवादास्पद फैसलों से हुआ था। उत्तर प्रदेश में भाजपा की करारी हार के बाद संघ ने भाजपा पर अपनी नीतियां-निर्देश थोपने की गलती कबूल की और लाल कृष्ण आडवाणी का विरोध छोड़ दिया। आडवाणी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करके अगले लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला इसी समीक्षा से निकला। स्वाभाविक तौर पर संघ परिवार के बदले रुख से भाजपा में नए सिरे से उथल-पुथल शुरू हो चुकी है।

मोदी को मुद्दा बना खुद हारी कांग्रेस

Publsihed: 23.Dec.2007, 09:09

गुजरात के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का पलड़ा उसी दिन भारी हो गया था, जिस दिन कांग्रेस नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत विरोध पर उतर आई थी। चौदहवीं लोकसभा के चुनावNarendra Modi में कांग्रेस ने मोदी को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया था, तो गुजरात में कांग्रेस की स्थिति में सुधार हुआ था। अलबत्ता विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस 91 क्षेत्रों में जीती थी, जबकि भाजपा 89 क्षेत्रों में। इसका मतलब यह हुआ कि करीब साढ़े तीन साल पहले नरेंद्र मोदी का प्रभाव घटना शुरू हो गया था, लेकिन कांग्रेस ने हालात का फायदा उठाकर खुद को मजबूत करने की बजाए कमजोर कर लिया।

चुनाव नतीजों से पहले ही यह चर्चा शुरू हो गई कि गुजरात में न तो भाजपा जीतेगी, न हारेगी। जीतेंगे तो नरेंद्र मोदी, हारेंगे तो नरेंद्र मोदी।

संसद की कारगुजारी से चुनावी आहट

Publsihed: 08.Dec.2007, 20:35

एटमी करार पर हुई बहस के बाद वामपंथी, तीसरे मोर्चे और राजग के सांसदों ने वाकआउट करके यूपीए सरकार को अल्पमत में दिखा दिया है। भले ही वामपंथी दलों ने मनमोहन सिंह सरकार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से बातचीत करने की हरी झंडी दे दी है, लेकिन संसद में दिखाए गए तेवरों से चौदहवीं लोकसभा पर अभी भी तलवार लटकी हुई है। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम 2008-09 का बजट तैयार कर रहे हैं, संसद पर लटकी तलवार के कारण माना जा रहा है कि मौजूदा सरकार का यह बजट ही आखिरी हो सकता है। इसलिए तय है कि यह बजट लोकलुभावन होगा।

सवाल करार का नहीं, विदेश नीति का

Publsihed: 21.Oct.2007, 20:31

वामपंथी दलों की मुख्य चिंता भारत-अमेरिका एटमी करार की नहीं, अलबत्ता विदेश नीति को लेकर है। एटमी करार के जरिए अमेरिका ने जिस तरह की रणनीति अख्तियार की है, उससे भारत की विदेश नीति में बदलाव होना स्वाभाविक है। मौजूदा सरकार कितना भी कहे कि भारत की विदेश नीति कतई प्रभावित नहीं होगी, लेकिन मनमोहन सिह का यह कथन विश्वसनीय साबित नहीं होता। खासकर ईरान को लेकर अमेरिका के भारत पर पड़ रहे दबाव के कारण यह स्पष्ट हो जाता  है कि महाशक्ति के असली इरादे क्या हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान-पाक-भारत गैस पाईप लाइन का समझौता न हो, इसीलिए उसने भारत के सामने एटमी ऊर्जा का प्रस्ताव रखा था।