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Exclusive Articles written by Ajay Setia

आतंकियों-घुसपैठियों की पीठ पर देश का गृहमंत्री

Publsihed: 22.May.2008, 20:41

जब बाड ही खेत को खाने लगे। तो खेत का खुदा ही रखवाला। गृहमंत्री शिवराज पाटिल पर यह कहावत एकदम फिट। देश को ऐसा गृहमंत्री न पहले कभी मिला। न आगे कभी मिलना। सोनिया गांधी को ऐसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर फख्र। जिनका न कोई राजनीतिक आधार। न जमीनी आधार। अपन तो पाटिल के बयान पर हैरान हुए। जब वह वसुंधरा राजे पर भड़कते हुए बोले- 'यह राजशाही नहीं। लोकतंत्र है।' जी हां, इसीलिए लातूर में हारकर वह देश के गृहमंत्री हो गए। इसीलिए दक्षिण दिल्ली में हारकर मनमोहन देश के पीएम हो गए। इसी लोकतंत्र की बात कर रहे हैं पाटिल। वसुंधरा को बता रहे हैं- 'यह राजशाही नहीं।' जो जनता के वोट से जीतकर सीएम बनी। जिसे किसी सोनिया ने नोमिनेट नहीं किया।

पीएम का जश्न, महंगाई और जयपुर का मातम

Publsihed: 21.May.2008, 20:59

यों तो जयपुर की आतंकी वारदात का आज दसवां दिन। अपने यहां तेरहवीं से पहले मातम मनाने की संस्कृति। मार्च 2006 को आतंकियों ने बनारस के मंदिरों में बम फोड़े। तो सोनिया गांधी ने होली नहीं मनाई थी। वाजपेयी, जो होली के शौकीन। उनने भी होली नहीं मनाई। सो अब तेरहवीं से पहले मनमोहन का डिनर अजीब-ओ-गरीब। बनारस में सिर्फ 28 लोग मरे थे। जयपुर में 66 लोग मर चुके। मनमोहन सालाना रिपोर्ट कार्ड जारी करते। डिनर न रखते। तो संस्कृति भी बची रहती। आतंकवाद के खिलाफ गंभीरता भी दिखती। बीजेपी को भी जनता की भावनाओं का ख्याल रखना चाहिए।

आतंकवाद के माहौल में सालगिरह का जश्न

Publsihed: 21.May.2008, 06:59

आडवाणी कर्नाटक की भागदौड़ से लौटे। तो हरकिशन सुरजीत का हालचाल पूछने गए। मनमोहन की सरकार बनवाने में अहम भूमिका थी सुरजीत की। सो मनमोहन इतवार को ही अस्पताल हो आए। मनमोहन के साथ सुरजीत कभी संसद में नहीं रहे। पर आडवाणी-सुरजीत एक ही वक्त राज्यसभा में थे। आडवाणी-सुरजीत ने तब भी इकट्ठे काम किया। जब बीजेपी-सीपीएम ने वीपी सरकार को समर्थन दिया। सो आडवाणी ने येचुरी को फोन किया। तो पुराने किस्से याद किए। वैसे अभी ऐसा वक्त नहीं आया था। वाहे-गुरु सुरजीत को चंगा भला करें। जैसे चंगे-भले होकर करुणानिधि अस्पताल से लौटे। सुरजीत का हालचाल पूछ अपने मनमोहन तो चुनावी तैयारियों में जुट गए। कल सरकार की चौथी सालगिरह। इसे अपन चौथा तो नहीं कह सकते।

तुम्हारी कमीज पर मेरी कमीज से ज्यादा धब्बे

Publsihed: 19.May.2008, 20:41

जयपुर के धमाकों ने राजनीति तेज कर दी। कांग्रेस-बीजेपी में एक-दूजे को कटघरे में खड़ा करने की होड़। आतंकवाद पर कांग्रेस का रिकार्ड अच्छा नहीं। तो उसने भाजपा का रिकार्ड याद कराने का तरीका अपनाया। कांग्रेस अपने रिकार्ड पर बात करने को तैयार नहीं। अरुण जेटली ने इतवार को मनमोहन सिंह की बखिया उधेड़ी। तो कांग्रेस जल-भुन गई। जेटली की बाकी बातें बाद में। पहले फेडरल एजेंसी की बात। अपन ने यह बात पंद्रह मई को ही लिख दी थी। जब अपन ने लिखा- 'पोटा हटाकर फेडरल एजेंसी की वकालत।' तो अपन ने उस दिन खुलासा किया- 'फेडरल एजेंसी का आइडिया छह साल पहले आडवाणी का था। तब कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने विरोध किया।' यही बात पांच दिन बाद जेटली ने याद कराई।

कांग्रेस बांग्लादेशियों के भरोसे असम जीत चुकी

Publsihed: 16.May.2008, 20:41

कांग्रेस शुक्रवार को भी वसुंधरा पर भड़की हुई थी। अबके भड़ास अपने शकील अख्तर ने निकाली। बोले - 'बीजेपी और बीएसपी सोनिया और राहुल से डरे हुए हैं।' सोनिया तो चलो जयपुर गई। जिस पर वसुंधरा भड़की। पर राहुल बाबा बीच में कहां से आ गए। अपन को समझ नहीं आया। असल में कांग्रेसियों को राहुल बाबा पर ज्यादा ही भरोसा। इसलिए बाकी किसी महामंत्री का नाम तक नहीं लेते। पर अपन बात कर रहे थे वसुंधरा के खिलाफ निकली भड़ास की। मनीष तिवारी गुरुवार को ही अपनी भड़ास निकाल चुके थे। अब रह गए अभिषेक मनु और जयंती नटराजन।

वोट बैंक की जमहूरियत में इंसानियत हुई स्वाहा:

Publsihed: 15.May.2008, 20:41

अपन को चुनाव करना होगा। इंसानियत और जमहूरियत में से किसे चुनें। शायद ही कोई ऐसा शख्स मिले। जो इंसानियत पर जमहूरियत को तरजीह दे। इकसठ साल पहले अपन को आजादी मिली। तो अपन ने जमहूरियत को खुद अपनाया था। पर अब जब जमहूरियत ही इंसानियत में आड़े आए। तो क्या अपन को सोचना नहीं चाहिए? अपन ऐसी जमहूरियत का क्या करेंगे? जिसमें इंसानियत ही न बचे। अब तो जमहूरियत ने इंसानियत पर ही हमला बोल दिया। सोचो, जमहूरियत में वोटों का लालच न होता। तो बांग्लादेशी निकाल बाहर न किए जाते। बांग्लादेशी घुसपैठिए कब वोटर बन गए। अपन को पता ही नहीं चला। पता तब चला, जब अपनी जमहूरियत घुसपैठियों ने लूट ली। अब आजादी लूटने पर भी आमादा।

पोटा हटाकर फैडरल एजेंसी की वकालत

Publsihed: 14.May.2008, 20:41

अपनी आशंका सही ही निकली। घुसपैठ-धमाकों के तार पाकिस्तानी सियासत से ही जुड़े हैं। अपन ने कल सांभा सेक्टर में घुसपैठ का जिक्र किया। जिस पर एंटनी ने पाक फौज पर ऊंगली उठाई। घुसपैठ और विस्फोट के बाद बुधवार को तंगधार सेक्टर में गोलाबारी हुई। पाकिस्तान ने दूसरी बार सीज फायर का उल्लंघन किया। पाकिस्तानी फौज-आतंकवादियों का रिश्ता छुपा नहीं। यह कारगिल के वक्त भी साबित हुआ। जयपुर के विस्फोटों की जांच की सुई भी लश्कर-हूजी की ओर। लश्कर पाकिस्तानी आतंकी संगठन। तो हूजी आईएसआई का बांग्लादेशी आतंकी मॉडल। गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल जयपुर से लौटकर बोले- 'वारदात के पीछे सीमा पार की ताकतें।' पर जायसवाल के अलावा कोई पाक पर ऊंगली उठाने से बचा। शिवशंकर मेनन को ही लो। पूछा तो बोले- 'अभी किसी पर ऊंगली उठाना ठीक नहीं।' यह है आतंकवाद से लड़ने की भूल-भुलैया।

पाक की सियासत से जुड़े घुसपैठ-धमाकों के तार

Publsihed: 13.May.2008, 20:40

अपन जयपुर के धमाकों पर फौरी कयास तो नहीं लगाते। पर धमाकों का रिश्ता पाक की सियासतNawaz Sharif and Asif Ali Zardari से जुड़े। तो अपन को कतई हैरानी नहीं होनी। पाकिस्तान के चुनावों से जमहूरियत लौटी। तो अपन को जहां खुशी हुई। वहां मन में एक आशंका भी थी। आशंका थी- फौज इस जमहूरियत को कितना बर्दाश्त करेगी। करेगी भी या नहीं। फौज ने पाक की जमहूरियत बर्दाश्त नहीं की। तो ठीकरा अपने ही सिर फूटेगा। अपन अभी यह तो नहीं कह सकते- जमहूरियत पटरी से उतरने लगी। पर जमहूरियत फेल करने की साजिशें तो शुरू हो चुकी। पाकिस्तान के अंदर भी। पाकिस्तान से बाहर भी। इक्कतीस मार्च को सय्यद युसूफ रजा गिलानी की सरकार बनी। तो फैसला हुआ था- 'तीस अप्रेल तक सभी बर्खास्त जज बहाल होंगे।'

आडवाणी भूले, या जसवंत या भूली कांग्रेस

Publsihed: 13.May.2008, 04:52

अपन आपकी याददाश्त फिर ताजा कर दें। कंधार अपहरण कांड हुआ। तो देश में क्या हालात थे। वाजपेयी पीएम थे। जसवंत सिंह विदेश मंत्री। वही जसवंत जिनने तब अमेरिकापरस्ती की कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि विमान अपहरण के वक्त अपन ने मदद मांगी। तो अमेरिका ने मुंह फेर लिया था। अब अपहरण कांड फिर सुर्खियों में। जबसे आडवाणी पीएम पद के उम्मीदवार हुए। कईयों की छाती पर सांप लौट गया। आडवाणी को कटघरे में खड़ा करना कांग्रेस का तो काम। पर जसवंत-यशवंत को क्या हुआ। अपन को दोनों कांग्रेस की कठपुतली तो नहीं लगते। अपन को वह दिन नहीं भूले। जब वाजपेयी राज के वक्त एक संपादक ने लेख लिखा था- 'जसवंत सिंह हो सकते हैं वाजपेयी के उत्तराधिकारी।'

अर्जुन सिंह का जहर बुझा तीर फिर फुस्स

Publsihed: 09.May.2008, 21:05

घी हर किसी को हजम नहीं होता। पर कई होते हैं, जो इंसान को भी कच्चा चबा जाएं। डकार भी न लें। अपन आज राजनीति के दो महारथियों की बात करेंगे। पी. चिदंबरम। जिनने ताजा बढ़ी महंगाई पर कहा- 'इतनी भी नहीं बढ़ी। चीखने-चिल्लाने की जरूरत नहीं।' दूसरे- अर्जुन सिंह। जिनका सितारा गर्दिश में। हताश अर्जुन को पिछले महीने बताया गया था- सोनिया-राहुल की चापलूसी से बाज आएं। तो अबके अर्जुन ने अपनी कमान से नया तीर निकाला। उनने सीधा सोनिया पर निशाना साध दिया। बोले- 'हाईकमान सलाह मशविरे से फैसले नहीं ले रहा। इसलिए कांग्रेस में मुश्किल-दर-मुश्किल।' अपन अर्जुन के जहर बुझे राजनीतिक तीरों से वाकिफ।