Edit Page

संवैधानिक ब्रेकडाउन और राजनीतिक अनाडीपन

Publsihed: 10.May.2016, 09:30

उत्तराखंड विधानसभा का नतीजा उम्मीद के मुताबिक ही है. स्पीकर ने भाजपा के विधायक भीम लाल आर्य को बर्खास्त नहीं कर के भाजपा का एक वोट हरीश रावत के लिए सुरक्षित कर लिया था. इस लिए भाजपा 28 से 27 हो गई, लेकिन कांग्रेस की रेखा आर्य ने भाजपा के साथ वोट कर के भाजपा के वोट फिर 28 कर दिए. बाकी 62 में से 34 वोट हरीश रावत के पक्ष में गए.....यानि स्पीकर ने 9 कांग्रेसी विधायकों को निलंबित न किया होता तो हरीश रावत के पक्ष में 34 और उन के विपक्ष में 37 विधायक होते.

अटार्नी जनरल संवैधानिक ब्रेकडाउन समझाने में फेल

Publsihed: 06.May.2016, 09:30

नैनीताल हाईकोर्ट ने जब उत्तराखंड में राष्ट्रपति राज की अधिसूचना रद्द करते हुए विधानसभा और सरकार को बहाल कर दिया था तो सुब्रह्मणयम स्वामी ने कहा था कि अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी को इस्तीफा देना चाहिए. अब सुप्रीम कोर्ट भी उसी दिशा में आगे बढ रहा है तो अटार्नी जनरल की योग्यता पर सवाल खडा होता है. उत्तराखंड विधानसभा को केंद्रीय मंत्रीमंडल ने संवैधानिक ब्रेकडाउन का मुद्दा बना कर निलंबित और सरकार को बर्खास्त किया था. अटार्नी जनरल दोनो अदालतों में सरकार का यह पक्ष तर्कपूर्ण ढंग से नहीं रख पाए.

क्या सुप्रीमकोर्ट में संवैधानिक ब्रेकडाऊन आधार बनेगा

Publsihed: 22.Apr.2016, 09:30

सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी जिसमे उत्तराखंड के राष्ट्रपति राज की अधिसूचना को रद्द कर के 29 अप्रैल को विधानसभा में बहुमत का फैसला करने के आदेश जारी किए थे.स्टे अंतरिम है , उस पर आगे सुनवाई 27 अप्रेल को होगी. अब 9 विधायकों ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है कि जब तक उन की सदस्यता का फैसला नहीं होता उन्हे 29 अप्रेल को वोट का अधिकार दिया जाए. हाई कोर्ट ने कह दिया था कि मतविभाजन के समय विधानसभा में विधायकों की स्थिति वह रहेगी, जो 27 मार्च को थी.

गुम होते बच्चों की फिक्र किसे है

Publsihed: 13.Dec.2011, 20:30

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट में बच्चों के अपहरण का देह व्यापार से सीधा संबंध बताया गया था। इसके बाद 2003-04 में राष्ट्रीय मानवाध

संसद की अनदेखी

Publsihed: 02.Dec.2011, 00:06

जनसत्ता, 1 दिसंबर, 2011 : वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने चौबीस नवंबर को उपभोक्ता क्षेत्र में विदेशी निवेश संबंधी मंत्रिमंडल के फैसले का एलान किया। उन्होंने कहा कि जनता ने यूपीए को बहुमत दिया है, इसलिए उन्हें फैसले करने का अधिकार है। अगर संविधान में ऐसा होता तो संसद की जरूरत ही क्या थी। अमेरिका की तरह यहां प्रधानमंत्री का सीधा चुनाव नहीं होता। सरकार अपने फैसलों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी है और उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का भी प्रावधान है। रहा चुनाव में बहुमत का सवाल, तो वह भी जनता ने न कांग्रेस को दिया न यूपीए को।

जांच की सियासत

Publsihed: 21.Nov.2011, 20:30

जनसत्ता, 22 नवंबर, 2011 : राजनीतिक गलियारों में लोग कहते सुने जाते हैं, राज तो कांग्रेस को ही करना आता है। कौन-सी चाल कब चलनी है, इस मामले में बाकी सब अनाड़ी हैं। मायावती चाहे लाख बार सवाल उठाती रहें कि जयराम रमेश की चिट्ठियां और गुलाम नबी आजाद के आरोपों की बाढ़ चुनावों के वक्त ही क्यों। भारतीय जनता पार्टी भी चाहे जितने आरोप लगाए कि राजग कार्यकाल के स्पेक्ट्रम आबंटन पर एफआईआर सीबीआई का बेजा इस्तेमाल है, पर यह कांग्रेस को ही आता है कि लालकृष्ण आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा के समापन आयोजन की हवा कैसे निकालनी है। आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रैली और संसद के शीत सत्र से

मीडिया की मर्यादा

Publsihed: 12.Nov.2011, 15:06

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा को लगता है कि न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की अध्यक्षता वाली प्रेस परिषद भंग कर देनी चाहिए। यह मांग उन्होंने इसलिए की क्योंकि काटजू ने दृश्य मीडिया को प्रेस परिषद के अधीन लाने की मांग की है। न्यायमूर्ति वर्मा अब दृश्य मीडिया की उस नेशनल ब्राडकास्टिंग अथॉर्टी के अध्यक्ष हैं जो प्रेस परिषद से भी ज्यादा दंतविहीन है, जो नहीं चाहती कि मीडिया पर कोई नियंत्रण होना चाहिए, जो प्रेस परिषद के दायरे में भी नहीं आना चाहती...

जिंदा कौमें और पांच साल का इंतजार

Publsihed: 03.Nov.2011, 15:35

लोकपाल अभी बना नहीं। पता नहीं जनलोकपाल प्रारूप के अनुरूप बनेगा भी या नहीं। कहीं अन्ना हजारे को मजबूत लोकपाल के लिए फिर से आंदोलन न करना पड़े। लेकिन उससे पहले ही टीम अन्ना ने संसद को सुधारने का बीड़ा उठा लिया है। राइट-टू-रिकॉल के लिए आंदोलन की डुगडुगी बजनी शुरू हो गई है। राइट टू रिकॉल यानी जनता को अपने चुने हुए सांसदों-विधायकों को वापस बुलाने का अधिकार। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने भी आव देखा न ताव। जयप्रकाश नारायण का नाम लेकर राइट-टू-रिकॉल का समर्थन कर दिया। शरद यादव और नीतिश कुमार समाजवादी परंपरा की उपज हैं। उनके नेता राममनोहर लोहिया कहा करते थे- 'जिंदा कौमें

उत्तराखंड से हुई आदर्श लोकायुक्त की शुरुआत

Publsihed: 30.Oct.2011, 20:30

कहते हैं, दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंककर पीता है। कर्नाटक में लोकायुक्त की मार से सहमी भारतीय जनता पार्टी पर यह कहावत कितनी लागू होती है, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तेजी से भाजपा ने उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदला, उससे कर्नाटक का सबक सीखने की भनक तो लगी ही। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप सुर्खियों में नहीं आए थे। गाहे-बगाहे अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले जरूर आए। अदालतों ने तीखी टिप्पणियां भी की, सरकार के कुछ फैसले रद्द भी किए। विपक्ष भ्रष्टाचार के मामले उजागर करता, उससे पहले ही कर्नाटक के लोकायुक्त की रिपोर्ट आ गई। कर्नाटक के मुख्यमंत्री को

नेताओं की करनी और कथनी

Publsihed: 28.Oct.2011, 15:23

यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री  मनमोहन सिंह आखिरकार कपिल सिब्बल और पी चिदम्बरम के प्रभाव से बाहर आ गए हैं। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के मामले में सारी गलतियां उन्हीं की करी धरी थी। हाल ही की अपनी विदेश यात्रा से लौटते हुए मनमोहन सिंह ने यह कहते हुए अन्ना हजारे की तारीफ की कि उनकी आंदोलन के सकारात्मक पहलू सामने आए हैं। शनिवार को सीबीआई और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों के द्विवार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने वही बात दोहराई। उन्होंने माना कि लोकपाल के गठन को लेकर हुए आंदोलन ने सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता के मुद्दे को हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के एजे