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Comments by Ajay Setia on Current Political Happenings

रूस और अमेरिका दोनों के लिए भारत सिर्फ मार्केट

बीते हफ्ते चौदहवीं लोकसभा के मध्यावधि सर्वेक्षणों की धूम रही। दो निजी चैनलों और उनके प्रिंट मीडिया ने सर्वेक्षण एजेंसियों के साथ मिलकर मध्यावधि सर्वेक्षण करवाए। दोनों औद्योगिक घरानों का मकसद सिर्फ अपनी टीआरपी बढ़ाना था। अगर एक चैनल अपना जन सर्वेक्षण जारी कर दे और टुकड़ों-टुकड़ों में जारी कर दे, तो उसे लगातार टीआरपी में बढ़ोतरी मिलती है। प्रतिद्वंदी चैनल को भी जवाबी तैयारी करनी ही पड़ती है। राजेंद्र यादव ने जनवरी के 'हंस' का विशेषांक विजुअल मीडिया की टीआरपी लड़ाई पर ही निकाला है। इस विशेषांक में खुद विजुअल मीडिया के पत्रकारों ने अपनी टीआरपी की भूख मिटाने के लिए किए और किए जा रहे कुकर्मो का खुलासा किया है।

सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट से बढ़ती दूरियां

मनमोहन सरकार की अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कारगुजारियों की अगर समीक्षा की जाए, तो पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार के मुकाबले बहुत कमजोर साबित होती है। मनमोहन सिंह इस बात का दावा ठोक रहे हैं कि उन्हाेंने परमाणु ऊर्जा ईंधन का समझौता करके भारत का 33 साल से चला आ रहा अंतर्राष्ट्रीय बहिष्कार खत्म करवाने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। वैसे अमेरिका के परमाणु ऊर्जा ईंधन के निर्यात संबंधी कानून की धारा वन-टू-थ्री के तहत जब समझौता सिरे चढ़ेगा, तभी माना जाएगा कि उन्होंने कोई सफलता हासिल की है। मेरा मानना हैं कि इस समझौते में अभी बहुत अड़चने हैं, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन यह समझौता अमेरिकी कांग्रेस की ओर से पास किए गए कानून के दायरे में रहकर ही कर सकता है।

निठारी गांव से मिलने वाला सबक

छब्बीस दिसंबर को जब पायल नाम की एक लड़की के लापता होने और उसके मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव के पास नोएडा की कोठी डी-5 में जाकर रुक गई, तो कोठी के मालिक मोनिन्द्र सिंह को पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। तब तक किसी ने सोचा तक नहीं था कि पायल के मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव से गायब हो रहे बच्चों की गुत्थी सुलझा देगी। मोनिन्द्र सिंह के बाद उसके नौकर सतीश उर्फ सुरेंद्र को अल्मोड़ा के पास मंगरुकखाल गांव से गिरफ्तार किया गया तो गुत्थी सुलझती चली गई। मोनिन्द्र सिंह सारा ठीकरा सुरेंद्र के सिर फोड़ रहा है तो सुरेंद्र सारा ठीकरा मोनिन्द्र के सिर।

तीस साल में पहली बार लेफ्ट का चेहरा बेनकाब हुआ

साल 2006 की सबसे बड़ी घटना यह है कि वामपंथी दलों ने बंगाल को लेकर देश भर में जो गलतफहमी फैलाई हुई थी, वह खुद उनके कुकर्मो से बेनकाब हो गई। वामपंथी विरोधी दल जब यह कहते थे कि बंगाल में वामपंथियों ने सच्चे लोकतंत्र की हत्या कर दी है और संगठित ढंग से चुनावों में धांधली करके वामपंथी दल सत्ता पर काबिज हैं तो यह बात किसी के समझ में नहीं आती थी। कांग्रेस को नेस्तनाबूद करके वामपंथियों ने अपने पैर जमाए थे और भाजपा को कभी बंगाल में घुसने का मौका ही नहीं मिला। वामपंथी एक बार काबिज हो गए तो उसके बाद उन्होंने जैसे सभी राजनीतिक दलों के लिए 'नो-एंट्री' का बोर्ड लगा दिया। समाज के हर क्षेत्र में वामपंथियों ने पांव जमा लिए और कोई भी संस्था ऐसी नहीं रही, जिस पर वामपंथी दलों का कबजा न हुआ हो।

परमाणु समझौता, मुशर्रफ फार्मूला और हमारे हित

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत तेज दौड़ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से परमाणु ईंधन समझौते के बाद उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से ले-देकर कश्मीर का मसला सुलझाने की कवायद शुरू कर दी है। लेकिन इतना तेज दौड़ते हुए क्या वह भारत के स्वाभिमान की रक्षा कायम रख सकेंगे, जिसे जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक सबने कायम रखा। मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा ईंधन का समझौता करने की सारी औपचारिकताएं पूरी कर दी हैं और उन्हें दंभ है कि उन्होंने परमाणु ईंधन हासिल करने के लिए अमेरिका को अपने कानून में बदलाव करने पर मजबूर किया, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी तो सीटीबीटी पर दस्तखत करने को तैयार हो गए थे।

परमाणु समझौता कहीं गले की फांस न बने

शुक्रवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे के साथ मुलाकात के दौरान परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले देशों की बैठक में भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन सप्लाई करने की बाबत होने वाले फैसले में सहयोग मांगा। हालांकि शिंजो ने फौरी तौर पर कोई भरोसा नहीं दिया है, न ही जापान से परमाणु ऊर्जा ईंधन की सप्लाई का कोई भरोसा दिया है, लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से परमाणु ऊर्जा ईंधन के मुद्दे पर बात किए जाने से एक बात साफ हो गई है कि संसद में अमेरिकी कानून की कितनी भी मुखालफत की जाए, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ वन टू थ्री समझौता करने का फैसला कर लिया है।

विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका का टकराव

राजग सरकार के समय न्यायपालिका और कार्यपालिका में एक बार टकराब की नौबत आ गई थी, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने इस टकराव को टालने के लिए अपने सबसे प्रिय मित्र और तब के विधि मंत्री राम जेठमलानी को मंत्री पद से हटाकर इस टकराव को बचाया था। लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार-बार ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं, जिनसे टकराव के हालात पैदा हों। हालांकि मनमोहन सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि इन टकरावों को बड़ी आसानी से टाला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि टकराव के हर मुद्दे पर न्यायपालिका ही सही है, लेकिन जिस तरह कार्यपालिका और विधायिका हर मुद्दे पर खुद को सुप्रीम समझते हुए न्यायपालिका को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है, उससे टकराव बढ़ रहा है।

संसद में अपराधी नहीं, अब अपराधियों की संसद

पिछले हफ्ते दो सांसद हत्या के मामले में अपराधी घोषित किए गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस कटघरे में थी कि शिबू सोरेन पर हत्या के दो मुकदमे चल रहे थे, फिर भी उन्हें केबिनेट मंत्री बना दिया गया। कांग्रेस और मनमोहन सिंह को कटघरे में खड़ा करने वाली भाजपा दो ही दिनों में खुद कटघरे में खड़ी हो गई, क्योंकि उसके सांसद नवजोत सिंह सिध्दू भी मौत के एक मामले में दफा 304 में अपराधी घोषित हो गए। मनमोहन सिंह ने अगर यह जानते हुए भी शिबू सोरेन को मंत्री बनाया था, कि वह हत्या के दो मामलों में अभियुक्त है, तो भाजपा ने भी यह जानते हुए नवजोत सिंह सिध्दू को अमृतसर से पार्टी का टिकट दिया कि हत्या के एक मामले में उस पर हाई कोर्ट में केस लंबित है, भले ही वह निचली अदालत से बरी हो चुका था।

संसदीय प्रणाली पर चोट करने का स्टिंग ऑपरेशन

देश बड़ी बेसब्री से ग्यारह सांसदों की बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहा है। तेरह जनवरी को चीफ जस्टिस वाई के सभ्रवाल रिटायर हो जाएंगे। उससे पहले फैसला आना स्वाभाविक है। लेकिन माना यह जाना चाहिए कि 15 दिसम्बर को सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियों से पहले फैसला आना चाहिए। वैसे अगर फैसला शीत सत्र से पहले या शीत सत्र के दौरान आ जाता, तो अच्छा रहता। पिछले एक साल से लोकसभा के दस सांसदों ने सदन का मुंह नहीं देखा। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी सांसदों के क्षेत्रों में चुनाव करवाने पर भी रोक लगा दी थी। मेरा शुरू से यह मत रहा है कि संसद को संविधान के किसी प्रावधान में सांसदों को बर्खास्त करने का हक नहीं दिया।

करजई-मनमोहन चाहें, तो मुशर्रफ होंगे मुश्किल में

पाकिस्तान के विदेश सचिव रियाज मोहम्मद खान इस बार भारत आए, तो काफी डरे हुए थे। इसकी ताजा वजह यह है कि बलूचिस्तान और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रॉवींस में जंग--आजादी एक बार फिर मुंह बाए खड़ी है। पाकिस्तान के विदेश सचिव इस्लामाबाद लौटे ही थे, कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद करजई शिमला से होते हुए दिल्ली पहुंच गए। बलुचिस्तान और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर का भारत से शायद उतना नाता नहीं है, जितना अफगानिस्तान से है। पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा विवाद का मुद्दा बना दिया, लेकिन खुद उसने बिना बलुचिस्तान और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवींस से कोई बात किए इन दोनों सीमांत राज्यों पर बलात कबजा किया था।

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