रूस और अमेरिका दोनों के लिए भारत सिर्फ मार्केट

बीते हफ्ते चौदहवीं लोकसभा के मध्यावधि सर्वेक्षणों की धूम रही। दो निजी चैनलों और उनके प्रिंट मीडिया ने सर्वेक्षण एजेंसियों के साथ मिलकर मध्यावधि सर्वेक्षण करवाए। दोनों औद्योगिक घरानों का मकसद सिर्फ अपनी टीआरपी बढ़ाना था। अगर एक चैनल अपना जन सर्वेक्षण जारी कर दे और टुकड़ों-टुकड़ों में जारी कर दे, तो उसे लगातार टीआरपी में बढ़ोतरी मिलती है। प्रतिद्वंदी चैनल को भी जवाबी तैयारी करनी ही पड़ती है। राजेंद्र यादव ने जनवरी के 'हंस' का विशेषांक विजुअल मीडिया की टीआरपी लड़ाई पर ही निकाला है। इस विशेषांक में खुद विजुअल मीडिया के पत्रकारों ने अपनी टीआरपी की भूख मिटाने के लिए किए और किए जा रहे कुकर्मो का खुलासा किया है। ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो ब्रिटिश चैनल फोर पर दिखाए जा रहे 'बिग ब्रदर' और भारतीय सोनी चैनल पर दिखाए जा रहे 'बिग बास' में हुई बदमजगियों की वजह भी टीआरपी बढ़ाना मानते हैं। यह सच भी है, जैडे गुडी ने जब शिल्पा शेट्ठी के लिए नस्लवादी टिप्पणियां की और उन्हें कुत्ती कहा, तो चैनल फोर की टीआरपी बढ़ने लगी। उसके दर्शक भी बत्तीस लाख से बढ़कर छप्पन लाख तक हो गए। ठीक यही बात सोनी चैनल पर भी दोहराई गई, भद्दी भाषा का इस्तेमाल करने वाली राखी सावंत को जब वोटिंग से जनता ने बाहर कर दिया तो उन्हें 'बिग बास' सिर्फ इसलिए वापस ले आए, क्योंकि विवाद पैदा करने वाला कोई नहीं बचा था। राखी सावंत दुबारा वापस आई तो उसने एक बार फिर रुपाली गांगुली को वही कहा, जो जैडे गुडी ने शिल्पा शेट्ठी को कहा था। भारत की जनता ने शिल्पा शेट्ठी को कुत्ती कहे जाने पर एतराज किया, लेकिन इस घटना के बाद भी राखी सावंत ने रुपाली गांगुली की उसकी गैरहाजिरी में उसे कुत्ती कहा। लेकिन किसी भारतीय को यह नस्लवादी टिप्पणी नहीं लगी। हालांकि बिग बास के फैसले को ठुकराते हुए भारतीय जनता ने दुबारा वोटिंग से राखी सावंत को घर से बाहर निकाल दिया। लेकिन यह टीआरपी का खेल सिर्फ बिग ब्रदर और बिग बास तक सीमित नहीं रहता। अलबत्ता इसके लिए कभी स्टिंग आपरेशन करने पड़ते हैं और कभी सर्वेक्षण। अपना माल बेचने के लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं। यह बात सिर्फ दुनिया भर के निजी चैनलों पर लागू नहीं होती। महाशक्तियों पर भी लागू होती है। अमेरिका और रूस दोनों अपना माल बेचने के लिए निजी चैनलों जैसी होड़ में शामिल हो चुके हैं। देश की जनता से अब यह छिपा नहीं है कि अमेरिका ने अपना परमाणु ईंधन बेचने के लिए और परमाणु ऊर्जा तैयार करने वाले बेकार पड़े रिएक्टर बेचने के लिए परमाणु ऊर्जा ईंधन सप्लाई करने के कानून को बदल डाला। भारत अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के लिए सिर्फ एक मार्केट है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। रूस भी भारत को एक मार्केट की तरह ही इस्तेमाल कर रहा है। यह बात रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत यात्रा से स्पष्ट हो गई। रूस और अमेरिका दोनों भारत को लड़ाई के हथियार बेचने की होड़ में शामिल हैं और गांधी का भारत एक ग्राहक है। राष्ट्रपति बुश ने परमाणु ऊर्जा ईंधन का ऐसा झुनझुना भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हाथ में थमा दिया है कि मौजूदा सरकार अपनी स्वतंत्र विदेश नीति तक भूल गई। राष्ट्रपति बुश ने परमाणु ऊर्जा ईंधन समझौते से दोनों लक्ष्य हासिल किए, एक तरफ लाखों डालर अमेरिका पहुंचेंगे और दूसरी तरफ भारत का इराक के बाद ईरान के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि मनमोहन सिंह सरकार अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का दावा अभी भी कर रही है, लेकिन अमेरिकी पहल पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की ओर से ईरान के खिलाफ कार्रवाई के फैसले से यह साबित हो गया है कि राष्ट्रपति बुश का असली मकसद क्या है। कभी अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियां थी और दोनों एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी थी। लेकिन ईरान के मामले में इस बार जिस तरह सोवियत संघ टूटने के बाद उसके प्रमुख घटक रूस ने अमेरिका के साथ एकजुटता दिखाई है, उससे साफ हो गया है कि दोनों ने मिलकर गुट निरपेक्ष देशों को मात दे दी है। जिस तरह राष्ट्रपति पुतिन ने गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत आकर हथियारों की दुकान सजाई है, उससे यह साफ हो गया है कि रूस और अमेरिका दोनों में भारत को बाजार बनाने के लिए अघोषित संधि हो चुकी है। यूपीए सरकार की विदेश नीति एकदम बचकाना और नकारा साबित हो रही है। कम्युनिस्ट विरोधी होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिका के खिलाफ भारत-रूस और चीन का राजनीतिक-कूटनीतिक त्रिगुटा बनाने की मुहिम शुरु की थी, जिसे मौजूदा मनमोहन सिंह सरकार ने छोटे-मोटे लालचों में आकर दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति को ध्वस्त कर दिया। इस समय जरुरत इस बात की है कि अमेरिका के निरंकुश होने पर ब्रेक लगाई जाए, लेकिन भारत का मौजूदा नेतृत्व इस मामले में खुद को लाचार मानकर चल रहा है। जिसका न सिर्फ रूस और अमेरिका बाजार के तौर पर इस्तेमाल करके फायदा उठाना चाहता है अलबत्ता अब चीन ने भी उसी तरफ कदम बढ़ाना शुरु कर दिया है। अगर भारत इन तीनों देशों का बाजार बनकर रह गया तो आने वाले समय में देश के आर्थिक गुलामी में फंसने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट