विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका का टकराव

राजग सरकार के समय न्यायपालिका और कार्यपालिका में एक बार टकराब की नौबत आ गई थी, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने इस टकराव को टालने के लिए अपने सबसे प्रिय मित्र और तब के विधि मंत्री राम जेठमलानी को मंत्री पद से हटाकर इस टकराव को बचाया था। लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार-बार ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं, जिनसे टकराव के हालात पैदा हों। हालांकि मनमोहन सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि इन टकरावों को बड़ी आसानी से टाला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि टकराव के हर मुद्दे पर न्यायपालिका ही सही है, लेकिन जिस तरह कार्यपालिका और विधायिका हर मुद्दे पर खुद को सुप्रीम समझते हुए न्यायपालिका को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है, उससे टकराव बढ़ रहा है। वरना जिन छोटे-मोटे मुद्दों पर न्यायपालिका गलत भी हो, उन्हें बड़ी आसानी से हल किया जा सकता है। जैसे शहरी विकास मंत्रालय की ओर से दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए मकान अलाट करने का मामला। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहली नजर में ही गलत दिखाई देती है, लेकिन सरकार ने जो रवैया अपना लिया है उस कारण सुप्रीम कोर्ट भी कई बार जिद पकड़ रही है। शहरी विकास मंत्रालय ने कुछ कोठियां न्यायपालिका के लिए तय की हुई हैं, अगर कोई जज रिटायर होता है तो वह कोठी नए जज को अलाट हो जाती है। इसी तरह मंत्रियों के लिए भी कोठियां तय हैं, जो मंत्रियों के साथ-साथ बदलती रहती हैं। लेकिन इस बार विवाद यह खड़ा हो गया कि सुप्रीम कोर्ट का कोई जज पहले वाले जज की ओर से खाली की जाने वाली कोठी के बजाए अपनी मनमर्जी की कोठी मांग रहा है। किसी जज ने नजमा हेपतुल्ला की कोठी पर उंगली रख दी और शहरी विकास मंत्रालय को वह कोठी देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह वैसे ही संवैधानिक सत्ता का दुरुपयोग है, जैसे विधायिका और कार्यपालिका संवैधानिक नियम-कायदों को ताक पर रखकर कोई फैसला करे। सुप्रीम कोर्ट का काम संवैधानिक नियम-कायदों की रक्षा करना है, अगर कोई प्रभावित व्यक्ति जनहित याचिका लेकर या इंसाफ की गुहार लगाते हुए अदालत में जाए और अदालत उस पर फैसला करे, तो इसे विधायिका या कार्यपालिका में दखल नहीं माना जाना चाहिए। मैंने पहले भी यह बात कई बार जोर देकर लिखी है कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में यह भ्रम फैला दिया कि विधायिका यानी संसद सर्वोच्च है। इंदिरा गांधी की यह धारणा संविधान के ढांचे से मेल नहीं खाती, क्योंकि हमारे संसदीय लोकतंत्र में संसद भी संविधान के नियम-कायदे के तहत काम करती है। कोई संवैधानिक प्रावधान बदलना हो तो उसके लिए भी एक प्रक्रिया है, मामूली बहुमत के बल पर संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता। हमने देश की आजादी के बाद कोई 90 बार संशोधन कर लिया है। इन संशोधनों पर सुप्रीम कोर्ट ने कभी एतराज नहीं किया, शर्त सिर्फ यह है कि संविधान की मूल धारणा में फेरबदल नहीं होना चाहिए। लेकिन मौजूदा टकराव यह पैदा हो रहा है कि विधायिका और कार्यपालिका के रोजमर्रा के कामों पर भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले आ रहे हैं। इस पर कार्यपालिका और विधायिका हताशा का शिकार हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट को अपने दायरे में रखने के लिए मौजूदा सरकार में न्यायपालिका को जवाबदेह बनाने की कोशिश संबंधी जो कानून बनाने की बात की जा रही है, यह इसी हताशा का नतीजा है और सरकार के इस कदम ने न्यायपालिका को और हमलावर बना दिया है। यह टकराव पैदा करने की एक अपरिपक्व कोशिश है, मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि मौजूदा विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज इन टकरावों को टालने के पक्ष में रहे हैं, लेकिन मनमोहन सिंह वामपंथियों और भ्रष्ट सांसदों के दबाव में टकराव मोल लेने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में आईएमडीटी एक्ट, बांग्लादेशी घुसपैठिए, अवैध निर्माण, आरक्षण में क्रीमीलेयर, अल्पसंख्यकों को आरक्षण, भ्रष्टाचार के मामलों में चार्जशीट से पहले सरकार की इजाजत, हत्या के मामलों में सांसदों को सजा संबंधी फैसलों से विधायिका और कार्यपालिका खफा हैं। कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति इन सभी मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को उचित ठहराएगा। सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों पर अगर जनमत संग्रह करवाया जाए और जनमत संग्रह में सिर्फ पढ़े-लिखे लोगों को वोट डालने के लिए कहा जाए, तो मेरा मानना है कि 95 फीसदी लोग न्यायपालिका के हक में होंगे। सवाल पैदा होता है कि इन सब मुद्दों में न्यायपालिका ने फैसले दिए ही क्यों, स्वाभाविक है कि जब कोई व्यक्ति इंसाफ के लिए दरवाजा खटखटाएगा, तो न्यायपालिका अपना काम करेगी ही। लेकिन विधायिका और कार्यपालिका न तो खुद ईमानदारी से काम कर रही हैं और न ही न्यायपालिका को काम करने दे रही हैं, अगर न्यायपालिका संविधान के तहत फैसले देती है, तो वह कार्यपालिका और विधायिका को मंजूर नहीं। आईएमडीटी कानून ऐसा बन गया था, जिससे भारत के मूल नागरिकों और कार्यपालिका के हितों की रक्षा नहीं हो रही थी, अलबत्ता विदेशी घुसपैठियों के हितों की रक्षा हो रही थी। इस कानून के तहत किसी घुसपैठिए को पकड़े जाने पर उसे अदालत में अपने भारतीय होने का सबूत नहीं देना पड़ता था, अलबत्ता कार्यपालिका की जिम्मेदारी थी कि वह उसे घुसपैठिया साबित करे। हमारी कार्यपालिका इतनी कमजोर है कि उसे आसानी से खरीदा जा सकता है, जो घुसपैठिया बड़ी आसानी से राशन कार्ड, वोटर पहचान पत्र और पासपोर्ट तक बनवा ले, उसे कार्यपालिका कैसे घुसपैठिया साबित करेगी। अबू सलेम और मोनिका बेदी के आधा-आधा दर्जन पासपोर्ट हमारी कार्यपालिका के बड़ी आसानी से बिक जाने का जीता-जागता सबूत हैं। घुसपैठिए बड़ी आसानी से रिश्वतखोरी के बल पर इतने सबूत इकट्ठे कर लेते थे, कि आईएमडीटी एक्ट उनके लिए खुद को भारतीय साबित करने का हथियार बन गया था। स्थानीय नागरिक इस कानून के खिलाफ लंबे समय से आंदोलनरत थे, लेकिन किसी ने सुप्रीम कोर्ट में दरख्वास्त नहीं दी थी, आखिर जब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया और अदालत ने इस कानून के गुण-दोषों पर विचार किया, तो पाया कि यह कानून भारत की सुरक्षा के लिए नुकसानदेह था। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को रद्द किया, तो पहले पहल सरकार की प्रतिक्रिया अदालत का सम्मान करने की थी, लेकिन असम में रह रहे बांग्लादेशी वोटरों के दबाव में मनमोहन सिंह ने राष्ट्र के हितों से खिलवाड़ करने में भी कोई गुरेज नहीं किया। जब कार्यपालिका देश और संविधान के प्रति इतनी लापरवाह हो जाए, तो न्यायपालिका को देश और संविधान की रक्षा करनी ही पड़ेगी। बिहार विधानसभा को सरकार बनाने का मौका दिए बिना ही भंग करना कार्यपालिका और विधायिका का संविधान विरोधी कुकर्म था। विधायिका और कार्यपालिका इसके लिए कतई शर्मसार नहीं, अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नाक-भौं सिकोड़ रही हैं। इसी तरह जनता की ओर से चुने गए सांसदों को बिना किसी नियम-कायदे और संवैधानिक प्रावधान के बर्खास्त करना विधायिका का भीड़तंत्र बन जाने का सबसे बड़ा सबूत है। फिर यह कहना कि अदालत उस पर सुनवाई तक न करे, विधायिका की तानाशाही का सबूत ही है। दिल्ली की अवैध दुकानों को ही लो, कार्यपालिका जानबूझकर कानून का उल्लंघन करती और करवाती रही, यह भी रिश्वतखोरी का एक बड़ा मामला है। कार्यपालिका के अफसर अपनी जेबें भरकर रिहायशी इलाकों में दुकानें बनवाते रहे, जब बेचारे 'रेजीडेंट्स' अदालत में गए तो सुप्रीम कोर्ट को नियम-कायदों का हवाला देना पड़ा। लेकिन कार्यपालिका और विधायिका संविधान और कानून का साथ नहीं दे रही, अलबत्ता कानून-कायदे की धाियां उड़ाने वालों का साथ दे रही है, जो महत्वपूर्ण वोटर हैं। विधायिका और कार्यपालिका की सबसे बड़ी कमजोरी वोटर और भ्रष्टाचार बन चुका है। न्यायपालिका देश को भ्रष्टाचार और भीड़तंत्र से बचाने की कोशिश में जुटी हुई है, इसीलिए विधायिका और कार्यपालिका ने उसके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट