निठारी गांव से मिलने वाला सबक

छब्बीस दिसंबर को जब पायल नाम की एक लड़की के लापता होने और उसके मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव के पास नोएडा की कोठी डी-5 में जाकर रुक गई, तो कोठी के मालिक मोनिन्द्र सिंह को पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। तब तक किसी ने सोचा तक नहीं था कि पायल के मोबाइल की रिंगटोन निठारी गांव से गायब हो रहे बच्चों की गुत्थी सुलझा देगी। मोनिन्द्र सिंह के बाद उसके नौकर सतीश उर्फ सुरेंद्र को अल्मोड़ा के पास मंगरुकखाल गांव से गिरफ्तार किया गया तो गुत्थी सुलझती चली गई। मोनिन्द्र सिंह सारा ठीकरा सुरेंद्र के सिर फोड़ रहा है तो सुरेंद्र सारा ठीकरा मोनिन्द्र के सिर। पर जनता सारा ठीकरा पुलिस के सिर फोड़ रही है। प्रियदर्शिनी मट्टू का केस हो, जेसिका लाल का केस हो या नीतिश कटारा का केस हो, पुलिस की कारगुजारी हर जगह पर शक के दायरे में आ रही है। ठीक इस समय जब निठारी कांड का भंडाफोड़ हुआ, उसी समय देश में पुलिस सुधारों की बात चल रही है। लेकिन क्या पुलिस कानूनों में सुधार पुलिस का ढांचा बदल देंगे, पुलिसियों की मानसिकता में बदलाव ला देंगे। यह बात सही है कि सत्ताधारी पुलिस का जमकर दुरुपयोग करते हैं और बदले में पुलिस को जनता का शोषण करने की छूट देनी पड़ती है। इसी से पुलिस और राजनीतिज्ञों की मिलीभगत का जन्म होता है, इस संदर्भ में इमरजेंसी के बाद जनता शासन के दौरान बनाए गए शाह आयोग की एक टिप्पणी काबिल-ए-गौर है। शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि बयूरोक्रेसी और पुलिस को झुकने के लिए कहा गया था, लेकिन वे लेट गए। शाह आयोग ने राजनीतिज्ञों और बयूरोक्रेसी (जिसमें पुलिस भी आती है) के गठजोड़ का खुलासा किया था। इमरजेंसी के दौरान जेलों में रहे विपक्ष के नेताओं ने यह महसूस किया कि पुलिस का स्वतंत्र होना बहुत जरुरी है, क्योंकि जब इमरजेंसी लगी तो पुलिस सत्ताधीशों के इशारे पर उनके राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मनमाने और झूठे केस बनाने से नहीं हिचकिचाई। इसलिए जनता शासन के दौरान देश का पहला पुलिस आयोग बना, जिसका नाम दिया गया- राष्ट्रीय पुलिस आयोग। इस आयोग ने 1979 से 1981 के तीन सालों में आठ रिपोर्टें पेश की, लेकिन उन पर अमल होता उससे पहले ही इंदिरा गांधी वापस आ गई और कांग्रेस ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को कूड़ेदान में फेंक दिया। अबदुल कलाम जब राष्ट्रपति बने, तो जानेमाने रिटायर पुलिस अधिकारी आरके राघवन ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी। इस लंबी चौड़ी चिट्ठी में राघवन ने राष्ट्रपति अबदुल कलाम को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशें याद दिलाईं और उन्हें बताया कि राजनीतिज्ञ उन सिफारिशों पर अमल नहीं करना चाहते क्योंकि उन सिफारिशों के अमल से उनका पुलिस पर दबदबा कम हो जाएगा। राघवन ने उम्मीद जाहिर की थी कि अबदुल कलाम इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों पर नैतिक दबाव बनाकर देश के पहले जनता शासन के दौरान शुरु हुई सुधार की कोशिशों को आगे बढ़ा सकते हैं। राघवन को यह उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि केंद्र में वाजपेयी की रहनुमाई वाली करीब-करीब वही सरकार थी, जो 1977 में बनी थी। ज्यादातर राज्यों में भी पुलिस सुधार विरोधी कांग्रेस पार्टी ठिकाने लग चुकी थी। राघवन ने अबदुल कलाम को लिखी चिट्ठी में कहा कि इंदिरा गांधी ने पुलिस और बयूरोक्रेसी का जितना दुरुपयोग किया, उतना पहले कभी नहीं हुआ था और इंदिरा गांधी ने पुलिस को इतना भ्रष्ट बना दिया कि अब बड़े पैमाने पर कानूनों में बदलाव के बिना पुलिस में सुधार संभव नहीं है। राघवन ने अपनी चिट्ठी में राष्ट्रपति अबदुल कलाम को झकझोरने के लिए नाटकीय भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने पूछा कि क्या अबदुल कलाम का कभी निचले स्तर की पुलिस से वास्ता पड़ा है या उन्हें कभी पुलिस थाने जाना पड़ा है। अगर वह कभी पुलिस थाने नहीं गए तो वह व्यक्ति उन्हें बेहतर बता सकता है जिसे कभी पुलिस थाने जाना पड़ा हो। राघवन का मत है कि कानून का पालन करने वाला शहरी पुलिस थाने के नाम से घबराता है, उसकी कोशिश होती है कि वह पुलिस थाने के आगे वाली सड़क से न गुजरे। आजादी के पचपन साल बाद भी पुलिस की ऐसी छवि आजादी का आभास कतई नहीं दिलाती। राघवन ने अपनी चिट्ठी में बताया था कि इंद्रजीत गुप्त जब गृह मंत्री बने तो उन्होंने पहली बार राज्य सरकारों को चिट्ठी लिखकर राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों पर अमल करने की हिदायत दी, लेकिन वह भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाएं क्योंकि कानून व्यवस्था राज्य का मामला है और राज्य सरकारें अगर उन सिफारिशों पर अमल कर देंगी तो पुलिस स्वतंत्र हो जाएगी और शासक उनका मनमाना उपयोग नहीं कर पाएंगे। राघवन ने राष्ट्रपति को सतर्क करते हुए लिखा कि अगर वह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों के बारे में पूछेंगे तो उन्हें जवाब मिलेगा कि नब्बे फीसदी सिफारिशें लागू हो चुकी हैं, लेकिन असलियत यह है कि आयोग की तीन बड़ी सिफारिशों पर बिलकुल अमल नहीं हुआ। ये तीन बड़ी सिफारिशें हैं- पहली सिफारिश- सभी राज्यों में राज्य सुरक्षा आयोग बने, जो महत्वपूर्ण जगहों पर पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति का फैसला करे। इस आयोग में राज्य का गृह मंत्री और विपक्ष के कम से कम छह नेता होने चाहिए। दूसरी सिफारिश- डीजीपी की एक जगह पर नियुक्ति का कार्यकाल कम से कम चार साल होना चाहिए। तीसरी सिफारिश- 1861 के पुलिस कानून में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए और उसे राजनीतिक और कार्यकारी मजिस्ट्रेट के दायरे से बाहर निकाला जाए। असल में राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने नया पुलिस कानून बनाने के लिए एक प्रारूप भी अपनी सिफारिशों में केंद्र सरकार को भेजा था। राष्ट्रपति अबदुल कलाम ने पुलिस सुधारों को लेकर कोई हिदायत केंद्र और राज्य सरकारों को दी या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन करीब एक साल पहले जब उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों पर अमल के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब जाकर सरकार जागी। गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने हाल ही में पुलिस सुधारों के लिए राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई और सोली सोराबजी की रहनुमाई में पुलिस सुधारों के लिए एक कमेटी का गठन किया। सोराबजी कमेटी अपनी रिपोर्ट दे चुकी है और अब गृह मंत्रालय ने 31 जनवरी तक देश की जनता से पुलिस सुधारों के लिए सलाह मांगी है। लेकिन पिछले हफ्ते हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक से जो नतीजा निकला वह पुलिस सुधारों के लिए उत्साहवर्धक नहीं है। केंद्र सरकार कानून में बदलाव को तैयार नहीं और राज्य सरकारें पुलिस-बयूरोक्रेसी से अपना दबदबा छोड़ने को तैयार नहीं। निठारी में जो कुछ हुआ वह राजनीतिज्ञों और पुलिस की सांठगांठ का जीता-जागता सबूत है। नोएडा में उस समय मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की जाति के सारे यादव पुलिस अधिकारी तैनात थे। मुख्यमंत्री और गृह मंत्री आम तौर पर कमाई वाली जगहों पर अपने करीबी आदमियों को तैनात करते हैं ताकि कुछ फायदा उनका हो और बंधी-बंधाई रकम मुख्यमंत्रियों और संबंधित मंत्रियों को भी पहुंच सके। अब अगर मुलायम सिंह ने अपने यादव भाईयों को निलंबित कर दिया है तो भाई-भतीजावाद को खत्म करने का यह सुनहरा मौका हो सकता है। लेकिन एक सवाल खड़ा होता है कि अगर मौजूदा असंवेदनशील और भ्रष्ट पुलिस को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों के अनुरुप स्वतंत्र और अधिकार संपन्न बना दिया गया तो पुलिस और निरंकुश और भ्रष्ट होगी या सुधरेगी। निठारी से बड़ा सबक यह मिला है कि कानून नहीं अलबत्ता पुलिस की मानसिकता बदलनी होगी।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट