सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट से बढ़ती दूरियां

मनमोहन सरकार की अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कारगुजारियों की अगर समीक्षा की जाए, तो पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार के मुकाबले बहुत कमजोर साबित होती है। मनमोहन सिंह इस बात का दावा ठोक रहे हैं कि उन्हाेंने परमाणु ऊर्जा ईंधन का समझौता करके भारत का 33 साल से चला आ रहा अंतर्राष्ट्रीय बहिष्कार खत्म करवाने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। वैसे अमेरिका के परमाणु ऊर्जा ईंधन के निर्यात संबंधी कानून की धारा वन-टू-थ्री के तहत जब समझौता सिरे चढ़ेगा, तभी माना जाएगा कि उन्होंने कोई सफलता हासिल की है। मेरा मानना हैं कि इस समझौते में अभी बहुत अड़चने हैं, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन यह समझौता अमेरिकी कांग्रेस की ओर से पास किए गए कानून के दायरे में रहकर ही कर सकता है। सच्चाई यह है कि जो कानून पास हुआ है, वह मनमोहन सिंह की ओर से भारतीय संसद में किए गए वायदे के अनुरूप नहीं है। खैर, यह समझौता अगर सिरे चढ़ भी जाए तो इसमें इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अमेरिका परमाणु ऊर्जा ईंधन हमेशा देता रहेगा और हमारे रिएक्टर हमेशा चलते रहेंगे, जिन पर हम हजारों करोड़ रूपए खर्च करेंगे। अमेरिका हमारे साथ क्या सलूक करेगा, इसके बारे में अभी अंदाज लगाना ठीक नहीं होगा। बहुतेरे लोगों का अनुमान है कि अमेरिका परमाणु ऊर्जा ईंधन के समझौते में भारत को इतना उलझा देगा कि आखिर वह अपनी अंतर्राष्ट्रीय स्वतंत्र हस्ती को बरकरार नहीं रख पाएगा। इराक और ईरान के मामले में जिस तरह अमेरिका ने भारत को अपनी विदेश नीति में फेरबदल के लिए मजबूर किया है, उससे भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। मनमोहन सिंह सरकार ने दो बड़ी गलतियां की हैं, जिनका आज यहां इसलिए उल्लेख करना पड़ रहा है, क्योंकि वाजपेयी सरकार ने जिस तरह संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट के लिए दावा ठोका था और दुनियाभर में अभियान चलाया था, उस सारी मेहनत पर पानी फिर गया है। मनमोहन सिंह सरकार ने जब शशि थरूर को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद पर जब उम्मीदवार बनाया था, मेरा तभी यह स्पष्ट मत था कि यह करके यूपीए सरकार ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट से दावा छोड़ने का नींव पत्थर रख दिया है। अमेरिका ने भारत के उम्मीदवार शशि थरूर को संयुक्त राष्ट्र का महासचिव भी नहीं बनने दिया और स्थाई सीट के दावे को पूरी तरह कुचल कर रख दिया। परमाणु ऊर्जा ईंधन के समझौते में ही भारत के परमाणु शक्ति संपन्न देश होने का दावा खत्म कर दिया गया। मनमोहन सिंह भले ही परमाणु ऊर्जा ईंधन के समझौते के लिए अपनी पीठ ठोंके और इतराएं, लेकिन सच यह है कि वाजपेयी की ओर से देश को परमाणु संपन्न बनाए जाने के बावजूद मनमोहन सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने घुटने टेक कर सारे किए कराए पर पानी फेर दिया। अब वही हो रहा है, जिसकी आशंका थी। यूपीए सरकार ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट का दावा छोड़कर गैर स्थाई सीट के लिए दावा ठोकने का फैसला कर लिया है। इस बाबत न्यूयार्क में भारत के स्थाई दूतावास को खबर भेज दी गई है कि वह अक्टूबर 2010 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चुनाव में भारत की गैर स्थाई सीट के लिए तैयारी करे। मनमोहन सरकार के इस फैसले के पीछे दलील यह दी जा रही है कि जब तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार नहीं होता, तब तक गैर स्थाई सीट पर दावा ठोकना गलत नहीं होगा। लेकिन अमेरिका ने भारत को अपना पिछलग्गू बनाने में सफलता हासिल करके फिलहाल सुरक्षा परिषद के विस्तार की संभावनाओं पर ही पानी फेर दिया है। कूटनीतिज्ञों का कहना हैं कि भारत ने खुद अमेरिका का जूनियर पाटर्नर बनाकर सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट हासिल करने के रास्ते में खुद की रूकावटें खड़ी कर ली। भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील की ओर से एकजुट होकर स्थाई सीट हासिल करने के लिए जितनी जोरदार कोशिशें की गई थी, उन्हें भारत सरकार ने अमेरिका का जूनियर पाटर्नर बनकर नाकाम बना दिया है। अब हालत यह है कि जर्मनी और ब्राजील भी गैर स्थाई सीट के लिए ही दावा ठोकने की सोच रहे हैं, ताकि स्थाई सीट न सही, कुछ तो हाथ लगे। इस घटनाक्रम से यह साबित हो गया है कि भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन का लालीपॉप दिखाकर अमेरिका भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील में फूट डालकर अपना मकसद हासिल करने में सफल रहा है। पिछली बार भारत के पास गैर स्थाई सीट 1990 से 1992 तक थी, लेकिन 1996 में भारत इस सीट के चुनाव में जापान के हाथों बुरी तरह हारा। गैर स्थाई सीट के लिए दावा करने के पक्ष में एक दलील यह दी जा रही है कि जब तक स्थाई सीटें बढ़ने का फैसला नहीं होता, तो क्या तब तक भारत चुप करके बैठा रहे। लेकिन जैसे मेरा पहले यह मानना था कि शशि थरूर को महासचिव पद पर खड़ा करके भारत ने स्थाई सीट की दावेदारी कमजोर कर ली है, वैसे ही मेरा अब यह मानना है कि जिस तरह शशि थरूर हार को देखते हुए नाम वापस लेने को मजबूर हुए, वैसे ही अगर भारत 2010 के चुनाव में गैर स्थाई सीट हार जाता है, तो स्थाई सीट का उसका दावा और कमजोर हो जाएगा। शशि थरूर को चुनाव में उतारते समय गंभीरता से नहीं सोचा गया और चुनाव मैदान में उतरकर भारत ने अपने कई पड़ोसी मित्र देशों को नाराज कर लिया था। अब हम कहीं उसी नाराजगी का विस्तार तो नहीं करने जा रहे।