दलाईलामा के अरुणाचल दौरे का मतलब

Publsihed: 02.Nov.2009, 10:14

क्या मौजूदा 14वें दलाईलामा इतिहास को उसी मोड़ पर लाने की सोच रहे हैं जहां से पांचवें दलाईलामा ने सत्ता संभालने की शुरूआत की थी। क्या वह अपने इसी तवांग दौरे के दौरान ऐसा ऐतिहासिक ऐलान करने की सोच रहे हैं, जैसी चीन की आशंका है।

आठ नवंबर का दिन जैसे-जैसे करीब आ रहा है, अरुणाचल का सुरक्षा घेरा उतना ही बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से मुलाकात के बाद भारत-चीन में तनाव कुछ कम हुआ है, लेकिन इसका असर अरुणाचल में दिखाई नहीं देता। जैसे-जैसे दलाई लामा के अरुणाचल पहुंचने की तारीख नजदीक आ रही है, वहां के लोगों में दहशत फैल रही है। दलाईलामा के दौरे को लेकर अरुणाचल के लोग उत्साह से भरे हैं, उनके स्वागत की तैयारियां हो रही हैं, लेकिन एक डर भी समाया हुआ है कि कहीं उस दिन चीन अक्टूबर 1962 की याद ताजा न कर दे।

बीजेपी आलाकमान के नाम खुली चिट्ठी

Publsihed: 26.Oct.2009, 10:09

हमें आपकी नहीं, देश की फिक्र है, आप सुधरोगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लोकतंत्र मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा। आपने अपने अनुभव से कुछ नहीं सीखा तो युवा पीढ़ी के नए तौर तरीकों से राजनीति का क ख ग सीखिए। राहुल गांधी से सीखिए।

वैसे तो आपको आलाकमान कहूं या नहीं। इस पर मन में असमंजस है। पर परंपरा निभाने के लिए आलाकमान शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं। वैसे तो भाजपा में आलाकमान का होना ही हास्यास्पद सा लगता है। राजनीति में आलाकमान शब्द का इस्तेमाल कांग्रेस में ही शोभा देता है। इंदिरा गांधी के जमाने में आलाकमान शब्द चलन में आया। उससे पहले कांग्रेस में सिंडिकेट हुआ करता था, जिसे आम भाषा में सामूहिक नेतृत्व कह सकते हैं। नेहरू की मौत के बाद कांग्रेस में सामूहिक नेतृत्व का चलन शुरू हुआ था। इंदिरा गांधी ने सामूहिक नेतृत्व को तहश-नहश करके कमान अपने हाथ में ली। वह कांग्रेस की आलाकमान बन गई। इस तरह राजनीति में आलाकमान की शुरूआत हुई।

अमेरिकी शर्तें भारत के अनुकूल

Publsihed: 12.Oct.2009, 08:42

पाक में जमहूरियत समर्थक और विरोधी आमने-सामने आ गए हैं क्योंकि अमेरिकी असैन्य आर्थिक मदद की शर्तें सेना और आईएसआई की बेजा हरकतों पर अंकुश लगाने वाली हैं।

सार्क सम्मेलन के मौके पर जनवरी 2004 में पाकिस्तान जाना हुआ तो जियो टीवी के मौजूदा सीईओ आमिर मीर के साथ बातचीत का मौका मिला। होटल के बाहर सड़क पर ही काफी देर टहलते-टहलते बात होती रही। आमिर मीर की भारत से शिकायत थी कि वह पाकिस्तान के चुने हुए शासकों के साथ बातचीत नहीं करता, लेकिन जब-जब सैनिक शासक आ जाता है, बातचीत तेजी से शुरू कर देता है। उनका कहना था कि भारत के इस रवैये ने पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत नहीं होने दिया। आमिर मीर की यही शिकायत अमेरिका के साथ भी थी।

केंद्र का इम्तिहान नहीं होते विधानसभा चुनाव

Publsihed: 05.Oct.2009, 09:53

हरियाणा में विपक्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ है, जिसका कांग्रेस को सीधा फायदा होगा। लेकिन महाराष्ट्र में ऐसी बात नही है। जहां  लोकसभा में सीटें बढ़ने के बावजूद विधानसभा क्षेत्रों में हारी है कांग्रेस। अरुणाचल में चीन की सीमा पर इंफ्रांस्टक्चर की कमी मुख्य चुनावी मुद्दा।

पंद्रहवीं लोकसभा का गठन हुए पांच महीने हो चले हैं। इस बीच हुए विभिन्न विधानसभाओं के उपचुनावों को यूपीए सरकार की लोकप्रियता में गिरावट का पैमाना नहीं माना जा सकता। इन उप चुनावों में मोटे तौर पर उन्हीं राजनीतिक दलों की जीत हुई, जिनकी उन राज्यों में सरकारें थी। यूपीए सरकार की लोकप्रियता या अलोकप्रियता का पैमाना राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों को भी नहीं माना जाना चाहिए।

एनपीटी-सीटीबीटी पर दस्तखत का दबाव

Publsihed: 28.Sep.2009, 10:22

अमेरिका ने भारत को एनपीटी-सीटीबीटी करारों के दायरे में लाने के लिए चौतरफे दबाव शुरू कर दिए हैं। मनमोहन सरकार समझती थी कि एनएसजी और आईएईए से छूट मिलने के बाद अब भारत को इन दोनों प्रस्तावों पर दस्तखत की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यह सवाल तो तब से उठ रहा है जबसे मनमोहन सरकार अमेरिका के करीब हुई है। लेकिन अब यह सवाल ज्यादा गंभीरता से पूछा जा रहा है- क्या भारत सीटीबीटी पर दस्तखत कर देगा? नरसिंह राव ने सीटीबीटी पर भी वही रुख अपनाया था, जो इंदिरा गांधी ने एनपीटी के समय अपनाया था। नरसिंह राव के बाद सभी प्रधानमंत्रियों ने भी अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की ओर से तय की गई विदेश नीति अपनाई। इसलिए कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं झुका।

सीमाओं पर लापरवाही

Publsihed: 20.Sep.2009, 21:27

नेहरू की तरह मनमोहन सिंह भी सीमाओं पर चीन की घुसपैठ को वक्त रहते गंभीरता से नहीं ले रहे। अलबत्ता मीडिया पर घुसपैठ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रहे हैं। सीमाओं पर हमारी सतर्कता और तैयारी आपराधिक लापरवाही की सीमा तक चली गई है।

सितम्बर के शुरू में यह खबरें आनी शुरू हुई थी कि लद्दाख में चीनी सेना घुस आई है। पहले-पहल खबर सिर्फ वायु सीमा अतिक्रमण की थी, पर धीरे-धीरे छनकर खबर आई कि कुछ दिन पहले चीनी सेना ने मेकमाहोन रेखा भी पार की थी। यह घटना एक बार नहीं, बल्कि कई बार हुई थी लेकिन सरकार ने इसे देश की जनता से छुपाए रखा। एक बार चीनी सैनिकों ने हमारे क्षेत्र में घुसकर गडरियों को मारा-पीटा और वहां से चले जाने को कहा। उनका दावा था कि वह क्षेत्र चीन का है, भारत का नहीं। दूसरी बार वे अपने साथ लाल रंग और ब्रुश लाए थे, जिससे उन्होंने पत्थरों पर मेंडरिन भाषा में चीन लिखा।

जयराम रमेश की गुस्ताखी

Publsihed: 14.Sep.2009, 10:15

केन्द्रीय पर्यावरण एवम् वन राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) जयराम रमेश ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य देव भगवान शंकर के समान बताकर एक और अनावश्यक विवाद तो खड़ा किया ही है, हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति के अपमान का अक्षम्य अपराध भी किया है। श्री रमेश ने शनिवार को अपनी भोपाल यात्रा के दौरान महात्मा गान्धी की तुलना ब्रह्मा और नेहरूजी की तुलना भगवान विष्णु से कर डाली।

आतंकियों को अपनी सी लगती है यूपीए सरकार

Publsihed: 29.Jul.2008, 20:39

अपन ने कल सुषमा की आतंकी थ्योरी बताई थी। जिसमें उनने केंद्र सरकार को घसीटा था। सद्दाम हुसैन ने अपनी कुर्सी के लिए हजारों कुर्दो को मरवाया था। अपनी यूपीए सरकार सद्दाम हुसैन के रास्ते पर तो नहीं चलेगी। सो सुषमा की बात किसी के गले नहीं उतरी। एनडीए के बाकी दलों के गले भी नहीं उतरी। गले उतरने वाली बात ही नहीं थी।  सुषमा ने आतंकवाद को सांसदों की खरीद-फरोख्त से जोड़ा। बोली- 'विस्फोट लोकसभा में विश्वासमत के फौरन बाद हुए। विश्वासमत में सरकार खरीद-फरोख्त से नंगी हुई।

दोस्त, दुश्मन की पहचान जरूरी

Publsihed: 01.Jan.2008, 20:40

हम भारतीय इतने सुसंस्कारित हैं कि मरे हुए व्यक्ति की बुराईयां नहीं देखते। ऐसा नहीं कि ऐसी सुसंस्कृति अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान की नहीं। आखिर भारत और पाकिस्तान एक ही देश के विभाजन से ही तो बने हैं। धर्म और पूजा पध्दति को छोड़ दें, तो दोनों देशों की संस्कृति, भाषा-बोली, रहन-सहन एक जैसा ही है। इसीलिए बेनजीर भुट्टो की हत्या पर हम भारतीयों को गहरा सदमा लगा। भले ही बेनजीर ने कभी भी भारत के साथ दोस्ती की वैसी पैरवी नहीं की, जैसी नवाज शरीफ ने की। या कारगिल की साजिश रचने के बाद परवेज मुशर्रफ भी करते रहे हैं। हालांकि मेरे जैसे करोड़ाें भारतीय परवेज मुशर्रफ पर भरोसा नहीं करते, वह बाकी पाकिस्तानी शासकों से कहीं ज्यादा मक्कार और जुबान के कच्चे हैं।