कश्मीर के सच को स्वीकारना होगा

Publsihed: 17.Sep.2019, 17:32

अजय सेतिया / विदेशी मीडिया की यह खबरें तो पूरी तरह गलत साबित हो रही हैं कि कश्मीर में मीडिया को आज़ादी नहीं | अगर ऐसा होता तो मीडिया कश्मीर की अंदरुनी खबरे इतनी बड़ी मात्रा में देता कैसे | भारत की तरफ से 370 हटाए जाने की खुलेआम मुखालफत करनी वाली ब्रिटिश वेबसाईट बीबीसी पर भी ऐसी अनेक खबरें भरी पड़ी हैं , जिन में वीडियो भी दिए गए हैं | अब दिल्ली के कई पत्रकार भी कश्मीर हो आए हैं , और अपने अपने नजरिए से जमीनी हकीकत की रिपोर्टिंग कर रहे हैं | नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट का एक प्रतिनिधिमंडल भी कश्मीर और लद्दाख हो कर लौटा है | वहां से लौट कर आए प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने बताया कि जम्मू कश्मीर के सभी अखबार जस के तस छप रहे हैं , एक भी अखबार बंद नहीं हुआ है , न ही किसी अखबार या टीवी चेनल में कोई सेंसरशिप लागू है | विदेशी मीडिया पता नहीं किस आधार पर  आपातकाल से तुलना कर रहा है , किसी भी अखबार ने अब तक अपने सम्पादकीय कालम को खाली नहीं छोड़ा है , जैसे कि आपात काल में होता था | 
इस से पहले कि अपन रिपोर्ट के कुछ पहलू बताएं , अपन को राजनीतिक दलों के नजरिए पर चर्चा करनी चाहिए | अपना मानना है कि संसद के किसी फैसले के खिलाफ संविधान के अंतर्गत मान्यता प्राप्त किसी राजनीतिक दल का सडकों पर उतरना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है | देश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाने वाली कांग्रेस से ऐसी उम्मींद कभी नहीं की जाती , न ही कांग्रेस ने ऐसा किया है , लेकिन कांग्रेस के भीतर कुछ ऐसे लोग हैं , जो राष्ट्र को सामने रखने की बजाए अपने वोट बैंक और भविष्य की राजनीति के मध्यनजर गैर जिम्मेदार सहयोगी दलों की साजिश में शामिल हो रहे हैं | इसी तरह का एक धरना कार्यक्रम दिल्ली में जंतर मंतर पर हो चुका है , जिस में वामपंथियों के साथ कांग्रेस के कुछ नेता शामिल थे | लेकिन देश के लिए चिंता की बात 16 सितम्बर की घटना है , कम्युनिस्ट पार्टियों ने 370 और 35 ए की बहाली के लिए अपने सहयोगी संगठनों से देश भर में प्रदर्शन करवाए | इसी तरह के एक प्रदर्शन का वीडियो और रिपोर्ट बीबीसी ने जारी किया है , जो चंडीगढ़ के पास मोहाली की है , प्रदर्शन में उसी तरह के भारत विरोधी नारे लगाए गए , जिस तरह जेएनयू में लगाए गए थे | पंजाब में ऐसा होना गम्भीर समस्या कर सकता है क्योंकि पाकिस्तान खालिस्तान के आन्दोलन को भी हवा दे रहा है | वामपंथी दलों की भूमिका निश्चित रूप से देश के लिए चिंता का विषय बनने वाली है | 
यह बात सही है कि घाटी में लोगों को लगता है कि उन के मौलिक अधिकार छीन गए हैं , सुरक्षा एजेंसियों को भी आशंका होगी कि इस का उलटा नतीजा निकल सकता है , इसलिए हर रोज समीक्षा हो रही है , लेकिन अगर सरकार सुप्रीमकोर्ट के दबाव के बावजूद भडकाने वाले नेताओं को नजरबंद रखने में कामयाब रही , तो कश्मीर का भाग्य बदल भी सकता है | घाटी से मौक़ा मुआईना कर के लौटी पत्रकारों की टीम का लब्बे-लुबाब भी कुछ ऐसा ही है | पत्रकारों की इस रिपोर्ट में बहुत कुछ कहा गया है , नकारात्मक भी , सकारात्मक भी | आम आदमी की जिंदगी जहां आशा और आशंका में लिपटी हुई है , वहीं  घाटी में शांतिपूर्ण चुप्पी छाई है, अलगवादियों और आतंकवादियों की ओर से बंदूक, पत्थरबाजी भड़काऊ पोस्टरों, बयानों और हरकतों से डर का वातावरण में समाया हुआ है | इतना ही नहीं , जो लोग आशावादी भी है , उन्हें आशंका है कि देश के अन्य हिस्सों में आतंकवाद की घटनाएं हो सकती हैं |  
इस रिपोर्ट का महत्वपूर्ण अंश यह है कि कश्मीर में अधिकांश लोगों को अनुच्छेद 370 के नफे नुकसान के बारे में अधिक जानकारी नहीं है | उन्हें यह भी नहीं पता कि 370 और  35 ए के हटने से उनका वाकई में क्या नुकसान हुआ है  | हाँ घाटी में इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पर पांबदी से लोग खासकर युवा बेहद झुंझलाए हुए हैं | एक दिलचस्प बात जो जगह जगह युवाओं से बात करने पर उभरी वह यह कि घाटी के युवाओं में इन नेताओं की नज़रबंदी से ज्यादा उन्हें अपने स्मार्टफोन के बंद होने की चिंता है , वे खुल कर कह रहे हैं कि नेताओं के साथ सरकार चाहे जो भी सलूक करे पर उनके मोबाइल फोन एवं इंटरनेट से पाबंदी हटा दे | 
 

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