बनारस में सत्य की ही जीत हुई

Publsihed: 11.Dec.2019, 09:48

अजय सेतिया / बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में डाक्टर फिरोज खान की नियुक्ति का मामला सुलट गया है | डाक्टर फिरोज खान को इस्तीफा देना पडा | तथाकथित खुले विचारों वाले स्वयंभू हिन्दू बुद्धिजीवी गलत साबित हुए और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हडताली छात्र सही साबित हुए | सत्य की जीत हुई है और आडम्बरी असत्य की हार हुई | असत्य यह कि उन की नियुक्ति सनातन हिन्दू धर्म विभाग में हुई थी और उन्हें संस्कृत का प्रोफ्सेर बता कर प्रचारित किया गया ताकि हड़ताली छात्रों और इस बहाने सभी हिन्दुओं को दकियानूसी बताया जा सके | टीवी चेनलों ने साम्प्रदायिक जहर फैलाने वाले जिन्नावादी मुस्लिम नेताओं को बहस में बुला कर हिन्दुओं को दकियानूसी साबित करने की भरसक कोशिश की | लेकिन इस का हडताली छात्रों पर कोई असर नहीं हुआ , उन की हडताल जारी रही |

छात्रों की जीत नए हिन्दू नवजागरण का प्रतीक है | करीब करीब सारा हिन्दू समाज उदारवाद की हवा में बहते हुए हिन्दू छात्रों का विरोध कर रहा था , क्योंकि उन्हें हिन्दू धर्म की बारीकियां समझाने वाला एक मुस्लिम मिल गया था | वे इसी बात पर गदगद हुए फिर रहे थे | इसी उदारवाद के कारण ही हिन्दुओं की यह हालत हुई है कि इस्लाम के नाम पर मुस्लिम राष्ट्र बना लेने के बावजूद वे सेक्यूलरिज्म के नाम पर भारत में शरणार्थी बन कर फिर से घुसना चाहते हैं | और खुद को सेक्यूलर बता कर भारत में रह गए मुस्लिम उन्हें भारत में शरण देने के लिए जगह जगह आगजनी कर रहे हैं क्योंकि मोदी सरकार ने पडौसी मुस्लिम देशों से घुसपैठ करने वाले मुसलमानों को भारत में शरण नहीं देने का क़ानून बना दिया है |

तथाकथित सेक्यूलर हिन्दुओं की जो उदारता डाक्टर फिरोज खान की संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में नियुक्ति पर दिखी थी , वही उदारता गांधी की भी थी | गांधी की उस मुस्लिम उदारवादिता के कारण ही नाथू राम गोडसे ने गांधी की हत्या की थी | गोडसे का गांधी की हत्या करने का तात्कालिक कारण यह था कि सरदार पटेल ने पाकिस्तान के कश्मीर पर हमले के कारण उसे दी जाने वाली 55 करोड़ की दूसरी किश्त रोक दी थी और गांधी ने इस के खिलाफ आमरण अनशन की धमकी दी थी | गांधी की यह जिद्द भारत को नुक्सान पहुँचाने वाली थी , और वह बाद में सही भी साबित हुई क्योंकि नेहरु और पटेल गांधी की जिद्द के आगे झुक गए थे और पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए की किश्त तुरंत अदा कर दी थी | जिस से हथियार खरीद कर वह कश्मीर में भारत की फोजों से कई महीने लड़ता रहा |

हिन्दू मूल रूप से उदार और सर्वधर्म समभाववादी है , इस लिए वह इस बात के लिए जल्दी ही गदगद हो जाता है कि कोई गैर हिन्दू उन के धर्म शास्त्रों को पढ़ता है और ज्ञाता बन गया है | यह वास्तव में गर्व की बात है कि जिन तुर्कों और मुगलों ने हिन्दू धर्म को खत्म करने के लिए हर हरबा इस्तेमाल किया , उन्हीं के हाथों हिन्दू धर्म छोड़ कर मुस्लिम बना कोई फिरोज खान और उस का परिवार मन कर्म से अपनी जड़ों की ओर लौट कर हिन्दू धर्म संस्कृति का विद्वान बना है | पर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में उन की नियुक्ति गदगद होने वाली बात नहीं थी | करीब करीब सारा हिन्दू समाज उदारवाद की हवा में बहते हुए हिन्दू छात्रों का विरोध कर रहा था , जबकि इन छात्रों की ओर से उठाए गए इस मूल मुद्दे पर कोई भी सोचने को तैयार नहीं था कि फिरोज खान की नियुक्ति संस्कृत नहीं , अलबत्ता हिन्दू धर्म पढाने के लिए हुई है |  

22 नवम्बर को इसी कालम में अपन ने दो रास्ते सुझाए थे | एक रास्ता तो यह था कि फिरोज खान यजोपवित धारण कर हिन्दू धर्म ग्रहण कर लें , क्योंकि वह सिर्फ जन्म से ही मुस्लिम है , कर्म से हिन्दू है | दूसरा रास्ता यह था कि फिरोज खान की नियुक्ति संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग की बजाए बनारस हिन्दू विश्वविध्यालय में ही संस्कृत पढाने के लिए कला विभाग में कर दी जाए | वामपंथी मीडिया देश को गुमराह करता रहा कि फिरोज खान की नियुक्ति संस्कृत पढ़ाने के लिए हुई है , जबकि वह सत्य नहीं था उन की नियुक्ति संस्कृत पढाने के लिए नहीं हुई थी | अब उन्ही दो रास्तों में से एक रास्ता निकला , फिरोज खान की नियुक्ति अब संस्कृत पढाने के लिए कला विभाग में हुई है , यही तो हडताली छात्र भी कह रहे थे , उन्होंने कब फिरोज खान की मुस्लिम होने के कारण संस्कृत पढ़ाने पर आपत्ति की थी |

 

 

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