बंगाल में इस से ज्यादा और क्या होता

Publsihed: 02.May.2021, 21:07

अजय सेतिया / अपन 1999 से चुनावी भविश्यवाणी लिखते रहे हैं | आमतौर पर अपना आकलन सर्वेक्षण एजेंसियों पर भारी पड़ता रहा है | इस के सबूत अखबारों में छपे अपने कालमों में मौजूद है | पर अपन इतना गलत कभी साबित नहीं हुए | अपना आकलन था कि बंगाल में भाजपा की सीटें , सौ के आसपास आएंगी | अब इस का मतलब यह भी लगा सकते हैं कि सौ या सौ से थोड़ी बहुत कम भी आ सकती हैं | पर नहीं , सच यह है कि अपन भाजपा की सीटें 100-120 के बीच मानते थे , सौ से कम नहीं | पर अपन यह तो श्योर थे कि तृणमूल कांग्रेस भारी पड़ेगी | भाजपा की सरकार बनने के कोई चांस नहीं हैं | हाँ असम के बारे में अपन श्योर थे , केरल में वामपंथी लौट रहे हैं , तमिलनाडू में द्रमुक आएगी , इस पर सौ फीसदी श्योर थे | पांडिचेरी के बारे में भी अपन को लगता था कि भाजपा एआईडीएमके के सहारे सत्ता पा लेगी |

वैसे अपन गलत कहीं भी साबित नहीं हुए , लेकिन हाँ अपन ने 2019 के चुनाव नतीजों के आधार पर समझना शुरू कर दिया था कि भाजपा 121 तक सीटें जीत सकती है | क्योंकि भाजपा ने लोकसभा की 18 सीटें और विधानसभा के 121 सेगमेंट पर जीत हासिल की थी | तृणमूल ने 22 लोकसभा सीटें और विधान सभा की 164 सीटों पर बढत बनाई हुई थी | यानी लोकसभा चुनाव नतीजों में भी विधानसभा के लिए ममता को जनादेश मिला था | बस यही वह टर्निंग प्वाईंट था , जिस में भाजपा की हार और तृणमूल कांग्रेस की जीत की पटकथा लिखी गई थी | ममता बेनर्जी ने प्रशांत किशोर से सलाह लेना शुरू किया | जिस ने उन्हें बताया कि दुश्मन की ताकत को पहचान कर रणनीति बनानी होगी | ममता ने प्रशांत किशोर की यह बात स्वीकार कर ली थी कि मोदी की पापुलरटी का मुकाबला करना होगा | मोदी को चुनौती मानते हुए ममता ने अपनी चुनावी रणनीति पूरी तरह बदल ली थी | उसने मुस्लिम परस्त होने की छवि तोड़ने के लिए खुद को शाडिल्य गौत्र का ब्राह्मण बताया , चंडी पाठ किया, हनुमान चालीसा पढ़ा | तो बेलेंस बनाने के लिए 42 मुसलमानों और 51 महिलाओं को टिकट दिया | 51 महिलाओं को टिकट ने मोदी की महिला वोट बैंक को रणनीति को पंक्चर कर दिया था |

जबकि भाजपा 2019 के घमंड के घोड़े पर ही सवार थी | वह 2019 में जी रही थी , ममता 2019 से सबक ले कर रणनीति बदल चुकी थी | इसी लिए प्रशांत किशोर ने ताल ठोक कर कह दिया था कि भाजपा दो अंकों से आगे बढी तो वह अपना चुनावी धंधा छोड़ देंगे | हालांकि अपन को पहले से पता था कि प्रशांत किशोर जदयू  के पहले राजनीतिक प्रयोग में मात खाने के बाद राजनीति में लौटने को छटपटा रहे हैं | उन्होंने एलान कर दिया था कि वह धंधा छोड़ कर सीधे राजनीति में दुबारा आएँगे | अब जब भाजपा सौ से कहीं पीछे रह गई , बल्कि उतनी सीटें भी नहीं जीती , जितनी 2016 में कांग्रेस और माकपा जीती थी | फिर भी प्रशांत किशोर ने चुनावी रणनीतिकार का धंधा छोड़ कर राजनीति में प्रवेश का एलान कर दिया है | शायद ममता के रास्ते वह जल्द ही राज्यसभा में होंगे |

पर सोचो अगर वामपंथी-कांग्रेस अपना 2016 का आंकडा 76 सीटें जीत लेता तो विधानसभा त्रिशंकू होती , ऐसे में कांग्रेस टूटती और भाजपा सरकार बना लेती | पर अपन को नवजोत सिंह सिद्धू का वह जुमला याद आता है –“मेरी मौसी की मूछें होती , तो मैं उसे मौसा कहता |” कांग्रेस और वामपंथियों का सूपड़ा साफ़ हो गया | भाजपा 3 से 75 जरुर हो गई , उसे कांग्रेस और माकपा की सीटें मिल गई , लेकिन तृणमूल कांग्रेस का बाल भी बांका नहीं कर सकी , क्योंकि तृणमूल की सीटें 211 से बढ़ कर 215 हो गई | तृणमूल कांग्रेस की जीत तय थी क्योंकि भाजपा ने ध्रुवीकरण की जो रणनीति बनाई थी , वही उस के गले का जंजाल बन गई | उस रणनीति से वह नंदीग्राम तो जीत गई ,क्योंकि वहां 75 हजार मुस्लिम थे , तो 2 लाख हिन्दू भी थे | लेकिन पूरे बंगाल में जिन 110 सीटों पर हार जीत मुस्लिम तय करते हैं , वे सभी ममता की झोली में जाना तय हो गई थीं | भाजपा की रणनीति ने 30 प्रतिशत मुस्लिमों को ममता के पीछे खड़ा कर दिया , लेकिन 70 प्रतिशत हिन्दू कभी इक्कठे हो ही नहीं सकते थे | भाजपा नहीं समझ पाई कि वामपंथी क्लास का पढ़ा लिखा बंगाल का हिन्दू कभी उत्तर प्रदेश के हिन्दू जैसा नहीं हो सकता | यह बात अपन ने टीन अप्रेल के कालम में लिख दी थी |

 

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