सोनिया का आम आदमी अब बीजेपी-मोदी के साथ


लुटिया डूबने के बाद भी कांग्रेस जिद पर कायम। सोमवार को भी वीरप्पा मोइली बोले- 'मौत के सौदागर वाले बयान पर कोई अफसोस नहीं।' पर यह नहीं बताया- मौत के सौदागर वाला भाषण लिखा किसने था। यों लिखा-लिखाया पढ़ने की आदत अब कांग्रेस में छूत की बीमारी। मोइली भी लिखा-लिखाया पढ़ते दिखे। लिखे भाषण की बात चली। तो अरुण जेटली याद आए। बोले- 'सोनिया को तो मौत के सौदागर का मतलब भी पता नहीं होगा। जो लिखकर दे दिया गया, बोल दिया।' पर सोनिया अब इतनी अनाड़ी भी नहीं। अनाड़ी होती, तो मौत के सौदागर वाली जिद छूट जाती। सोमवार को सोनिया के सामने सारे दिग्गज सिर झुकाए खड़े थे। पर किसी ने मौत के सौदागर वाला जिक्र नहीं छेड़ा। कोई नेता इस भाषण का लेखक होने का श्रेय लेने को तैयार नहीं। अलबत्ता अपन को कोई बता रहा था- 'फिल्मी डायलाग लिखने वाले एक घोर मोदी विरोधी से मदद ली थी।' अपने पास इस बात का पुख्ता सबूत नहीं। सो अपन किसी का नाम क्यों लिखें। अगर यह बात सही, तो लेखक का नाम आप भी समझ गए होंगे। पहले लेफ्टियों के प्रभाव में रामायण को फर्जी बताया। अब मोदी को मौत का सौदागर। खैर बात सोनिया के घर पर हुई मिजाजपुर्सी की। बैठक से निकलते पृथ्वीराज चव्हाण फुसफुसाए- 'हिमाचल का नतीजा भी आ जाता। तो इकट्ठी ही बैठक बुला लेते।' हिमाचल की हार का अंदाज भी कांग्रेस को लग चुका। वहां हार का ठीकरा तो वीरभद्र के सिर फूटेगा। पर गुजरात की हार का ठीकरा किसके सिर फोड़ें। कांग्रेस दो घंटे इसी मुशक्कत में लगी रही। बीके हरिप्रसाद ने तो एक दिन पहले ही कह दिया था- 'गुजरात में सोनिया नहीं हारी, कांग्रेस हारी।' कांग्रेस अब रट लगाएगी- 'गुजरात में बीजेपी नहीं जीती, मोदी जीते।' कांग्रेस की इस रट का मतलब भी यही हुआ- सोनिया हार गई, मोदी जीत गए। ओम माथुर अपन को पहले ही बता रहे थे- 'नतीजों के बाद मीडिया सवाल पूछेगा- मोदी जीता या बीजेपी।' इतवार को यही सवाल सुनते-सुनते अपने कान पक गए। मीडिया के इस जाल में राजनाथ फंसे। तो अहमदाबाद में अपने खिलाफ नारे लगवा लिए। मोदी का रुतबा अब बीजेपी में बढ़ेगा। अपन मेघना देसाई की भविष्यवाणी को नजरअंदाज नहीं कर सकते। उनने कहा- 'आडवाणी के बाद मोदी पीएम होंगे।' यह सुनकर कांग्रेसियों-लेफ्टियों को तो सांप सूंघ गया होगा। मोदी विरोधी लॉबी को एक सबक तो मिला होगा- 'मोदी विरोध मोदी को नहीं हरा सकता। अलबत्ता मोदी को मजबूत करेगा।' पर अब सेक्युलर मीडिया की नई खाम-ख्याली। मोदी की जीत से एनडीए बिखरेगा। पर अपन बता दें- मोदी की जीत से बीजेपी मजबूत होगी। बीजेपी मजबूत होगी, तभी तो एनडीए की औकात होगी। यह बात एनडीए के भावी नेताओं को मालूम। सो मोदी की ताजपोशी पर उदारवादी भैरोंबाबा भी दिखेंगे। पर बात राजनाथ सिंह की। जिनके खिलाफ मुहिम तेज होगी। पार्टी अब पूरी तरह आडवाणी खेमे के हाथ होगी। पार्टी अध्यक्ष बनकर जब राजनाथ ने मोदी को पार्लियामेंट्री बोर्ड से निकाला। तो आडवाणी भी खफा थे। आखिर पार्लियामेंट्री बोर्ड में जमीन से जुड़े नेता होने चाहिए। चुनाव हरवाने वाले हवाई नहीं। यूपी-गुजरात के चुनाव ने संघ का भ्रम भी तोड़ा। यूपी का चुनाव संघ ने लड़ा। बीजेपी हारी। गुजरात के चुनाव में संघ को किनारे किया। बीजेपी जीती। अब संघ का दखल कम करने की कवायद होगी। जमीनी वर्करों की पूछताछ बढ़ेगी। वक्त की नजाकत को मोदी ने पहचाना। बोले- 'मैं सीएम था, मैं सीएम रहूंगा। मेरे लिए सीएम का मतलब चीफ मिनिस्टर नहीं। अलबत्ता कॉमन मैन।' गुजरात मॉडल और मोदित्व का मतलब शायद अब सेक्युलरिज्म के ठेकेदारों को समझ आए। गुजरात मॉडल का मतलब दंगे नहीं, अलबत्ता विकास। मोदित्व का मतलब हिटलर नहीं, अलबत्ता कॉमन मैन। यानी आम आदमी।

"चुनाव हरवाने वाले हवाई

"चुनाव हरवाने वाले हवाई नहीं।" क्या मस्त बात कही है. सारे रोड़ से फ्लोप शो हो गए. राहूल के नाम में से अब "ल" नहीं दिखता कॉग्रेस को.

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