अमेरिकन बोले- 'खरीद फरोख्त से बनेगी सरकार'

जून में अपना पीएम कौन होगा? अपन से ज्यादा अमेरिकन फिक्रमंद। अमेरिका कुछ ऐसे जुगाड़ में- जो सरकार मनमोहन की ही बने। वह भी बिना लेफ्ट की मदद के। सीताराम येचुरी ने तो शुक्रवार को ही कहा- 'थर्ड फ्रंट की सरकार बनी। तो एटमी करार रिव्यू होगा।' यह बात अब आडवाणी ने तो कहनी लगभग छोड़ दी। आडवाणी का नया मुद्दा स्विस बैंक के खातों का। स्विस बैंक के नाम पर कांग्रेसियों के होश फाख्ता। अपन ने सात अप्रेल को कपिल सिब्बल की बेचैनी बताई थी। कांग्रेस के चुनाव इंचार्ज जयराम रमेश की बेचैनी भी बताएं। जयराम मंत्री पद से इस्तीफा देकर इंचार्ज बने। तो अपने कान तभी खड़े हुए थे। जरूर फंड का लफड़ा होगा। अब जब जयराम ने स्विस बैंकों के मामले में आडवाणी को चिट्ठी लिखी। तो अपने कान फिर खड़े हुए। उनने लिखा- 'स्विस बैंकों के बारे में आपकी बताई राशि में कोई दम नहीं। आप अशोक देसाई और बिबेक देबराय के आंकड़े बता रहे हो। दोनों अर्थशास्त्री घोर कांग्रेस विरोधी।' अब आप ही सोचो। आडवाणी ने जब स्विस बैंकों में जमा काले धन की बात उठाई। तो उनने कांग्रेस का नाम कब लिया। न कांग्रेस का नाम लिया, न कांग्रेसियों का। अपन क्यों न कहें- चोर की दाढ़ी में तिनका। यों जयराम को आडवाणी की आलोचना का पूरा हक। पर सवाल उठाकर जयराम खुद सवालों के घेरे में। आडवाणी की बताई राशि ठीक नहीं। तो जयराम को असली राशि जरूर पता होगी। फिर वह खुद ही बता दें स्विस बैंकों में कितना काला धन। पर शुक्रवार को आडवाणी ने जयराम को जवाब दिया। वह बोले- 'स्विस बैंकों में राशि कितनी? सवाल यह नहीं। सवाल यह है- लूट का धन तो जमा है वहां। इस सच से तो इंकार नहीं कर सकते।' आडवाणी पीएम बनें। तो काला धन कैसे लाएंगे। यह सवाल तो उठेगा ही। सो उनने जी-20 पर दबाव का पहला फार्मूला बताया। दूसरा फार्मूला क्या हो। यह टास्कफोर्स सुझाव देगी। उनने चार मेंबरी टास्कफोर्स अभी से बना दी। आप चाहें तो इसे फील गुड फैक्टर मान लें। टास्कफोर्स में एस. गुरुमूर्ति, प्रोफेसर वैद्यनाथन, अजीत दोवाल, महेश जेठमलानी। पर बात स्विस बैंक में जमा काले धन की नहीं। बात एटमी करार से अमेरिका की तिजोरी भरने की। जिसके लिए अमेरिका मनमोहन को पीएम बनवाने को लालायित। पर मनमोहन की खुद चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं। आडवाणी ने चुनौती दी। तो पतली गली से निकल लिए। अब नया खुलासा चंडीगढ़ से हुआ। खबर आई है- 'पंजाब कांग्रेस ने अमृतसर से लड़ने का सुझाव भेजा था।' मनमोहन की नवजोत सिध्दू से भिड़ने की हिम्मत नहीं हुई। पर जो लड़ना चाहता था। उसे टिकट नहीं दिया सोनिया ने। अपन अर्जुन सिंह के बेटे-बेटी की बात कर रहे हैं। अर्जुन सिंह भले ऊपर से कुछ कहें। पर अंदर से टूट चुके सोनिया के रवैए से। इसका खुलासा तब हुआ। जब भोपाल से उड़े अर्जुन सिंह सीधी पहुंचे ही नहीं। रास्ते से लौट आए। न सीधी गए न सतना। सीधी में बेटी के खिलाफ कैसे बोलते। सतना में जब बेटे को टिकट नहीं दिया। तो सतना में क्यों जाते। सो बीके हरिप्रसाद कह रहे थे- 'पुत्रीमोह में पार्टी से धोखा कर रहे हैं अर्जुन।' अर्जुन को कृष्ण ने बताया भी था- 'नाते-रिश्तेदारों की चिंता मत करो। जो हो रहा है- सही, जो होगा सही।' पर कांग्रेस की 'कृष्ण' सोनिया के ज्ञान का अर्जुन सिंह पर असर नहीं। इससे तो सुशील कुमार शिंदे ही भले। जिनने शुक्रवार को लातूर में कहा- 'मैं तो आलाकमान का जी-हजूर हूं। विलासराव मेरे से भी बड़े जी-हजूर। मैंने आलाकमान के कहने पर एक बार इस्तीफा दिया। विलासराव ने दो बार दिया।' पर बात मनमोहन को पीएम बनवाने के लिए बेचैन अमेरिका की। अमेरिकन थिंक टैंक ने कहा है- 'चुनाव नतीजों के बाद बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त होगी। खरीद-फरोख्त से बनेगी नई सरकार। मनमोहन सिंह ने जीडीपी आठ फीसदी रखा। पर आगे इसे बनाए रखना किसी के बूते में नहीं।'

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