दे बाबा- अफजल, अजहर, सोहराबुद्दीन के नाम पर

गुजरात के चुनावी महासमर का आज आखिरी दिन। कल बाकी की 95 सीटों पर भी वोट पड़ेंगे। संग्राम तो कांग्रेस-बीजेपी में रहा। पर महाभारत संघ परिवारियों में हुई। आधा परिवार कौरव बन गया। आधा पांडव। आधे मोदी के साथ। बाकी बचे केशुभाई के साथ। केशुभाई की तुलना अपन भीष्म पीतामह से करें। तो ठीक ही रहेगा। भीष्म पीतामह का शरीर कौरवों के साथ था। मन पांडवों के साथ। केशुभाई का शरीर बागियों के साथ था। मन बीजेपी के साथ। सिर्फ बीजेपी ही क्यों। बाकी संघ परिवारिए भी महाभारत में कूदे। वीएचपी को ही लें। तोगड़िया अंदरखाते कांग्रेस के साथ थे। तो अशोक सिंघल-आचार्य धर्मेंद्र बीजेपी के साथ। तोगड़िया वीएचपी के गले की हड्डी बन गए। न उगला जाए, न निगला। मोदी के लिए तोगड़िया से उमा भारती बेहतर रही। जो संघ परिवार छोड़कर भी मोदी के साथ दिखीं। बात उमा की चली। तो बीजेपी को मिली आडवाणी की नई रहनुमाई की बात। आडवाणी अब सर्वेसर्वा हो गए। उमा की वापसी भी इसीलिए टली। उमा मध्य प्रदेश में लौटने की जिद न करती। तो वापसी हो चुकी होती। आडवाणी ने कहा- 'यूपी संभालो।' उमा फिर बिदक गई। सिर्फ उमा ही नहीं। राजग की बात करें। तो ममता भी खुश नहीं होंगी। जिनने शेखावत की बजाए अटल पर जिद की। वह आडवाणी को कैसे मानेंगी। तीसरी देवी जय ललिता की बात अभी न करें। तो अच्छा। यों फिलहाल बीजेपी में आडवाणी जैसा दिमागी कोई नहीं। शुक्रवार की बात ही लें। आडवाणी अहमदाबाद में थे। उनने सोनिया-मनमोहन पर जहर बुझे तीर चलाए। जरा बानगी देखिए- 'पहले दौर में अच्छी वोटिंग हुई। दूसरे दौर में और ज्यादा करिए। मुझे पूरा भरोसा- गुजरात में मोदी जीतेंगे। हिमाचल में धूमल। दिसम्बर के आखिरी हफ्ते में भविष्य तय होगा। अगले साल यूपीए सरकार अपने दिन गिनने शुरू करेगी।' फिर बोले- 'लेफ्ट की ताजा धमकी पर गौर फरमाइए। अगर मनमोहन ने धमकी का उल्लंघन किया। अगर लेफ्ट ने धमकी पर अमल किया। तो 2008 में ही हो जाएंगे मिड टर्म।' अगर-मगर की शर्त के बाद आडवाणी बोले- 'मनमोहन पीछे हटने के माहिर। सो एटमी करार पर चुप्पी भी साध सकते हैं। आखिर यूपीए के बाकी दल चुनाव नहीं चाहते। मनमोहन यों भी अब तक के सबसे कमजोर पीएम साबित हो चुके।' अब बात आडवाणी के दावेदार होने की। तो उनने उस पर कहा- 'बीजेपी ने मेरे बारे में जो फैसला लिया। उस पर मनमोहन ने अपनी टिप्पणीं से हार मान ली। मनमोहन अपनी टिप्पणीं से राजनीति के अनाड़ी साबित हुए।' उनने मनमोहन की लेफ्ट को दी वह धमकी भी याद दिलाई- 'लेफ्ट को जो करना हो सो करे। करार से पीछे नहीं हटेंगे।' लगते हाथों आडवाणी ने सोनिया का मुकरना भी याद कराया। बोले- 'पहले हरियाणा में करार विरोधियों को विकास विरोधी कहकर मुकरी। अब मोदी को मौत का सौदागर कहकर मुकरी।' वैसे तो चुनाव में कोई गांधीवादी नहीं दिखा। शब्दों की मर्यादा तोड़ने में किसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। पर आखिरी प्रेस कांफ्रेंस में आडवाणी बोले- 'चुनाव में व्यक्तिगत जहर उगला गया। कांग्रेस का प्रचार हद दर्जे का निकृष्ट रहा। यही बीजेपी की जीत का कारण बनेगा।' वैसे अपन ने आखिरी दिन की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। जब अपन ने लिखा- 'तुम्हारा अजहर तो हमारा अफजल।' कांग्रेस ने वही किया। आखिरी दिन अपने इश्तिहार में अजहर मसूद का फोटू लगा दिया। अपन को 1989 का चुनाव याद। जब राजीव गांधी ने सांपों और बिच्छुओं के इश्तिहार छपवाए थे। अब कांग्रेस ने सोनिया का फोटू हटाकर अजहर मसूद का फोटू लगा दिया। कुछ वोट अफजल के नाम पर। कुछ सोहराबुद्दीन के नाम पर। कुछ वोट अजहर मसूद के नाम पर।

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