पवार की दोहरी सदस्यता पर कांग्रेस में खलबली

तो यूपीए का सारा कुनबा ही बिखर गया। वाइको, चंद्रशेखर राव, रामदौस तो गए ही। लालू, मुलायम, पासवान भी बाहर। अब पवार भी इशारे करने लगे। यूपीए में बची सिर्फ ममता। वह भी चुनाव बाद पक्की नहीं। ममता का असली घर एनडीए। यूपीए तो सिर्फ खेत की ढाणी। आप कहेंगे पवार का तो सीट एडजेंटमेंट हो चुका। अपन भूल भी जाएं। पर पवार क्यों भूलेंगे। सोनिया देशभर में तालमेल की बात मान जाती। तो यह दिन देखना ही नहीं पड़ता। अपने पी. चिदम्बरम मुंह लटकाए हुए थे। जब पूछा- ‘पवार का सीपीएम-बीजेडी के साथ जाना कैसा लगा?’ तो बोले- ‘एनसीपी से उड़ीसा में तालमेल तो नहीं। पर पवार का हमारे विरोधियों से जा मिलना ठीक नहीं।’ वैसे पवार भी उसी दिन उड़ीसा गए। जिस दिन सोनिया उड़ीसा में थी। तेवर दिखाने का असर भी हुआ। कांग्रेस ने गुजरात में एक सीट की पेशकश कर दी। राजकोट न सही, सूरत सही। इसे कहते हैं- दिया जब रंज बुतों ने, तो खुदा याद आया। यों पवार की टेढ़ी चाल से कांग्रेस की चाल बेढंगी हो गई। कांग्रेसियों को लालू, मुलायम, पासवान के लौटने का तो पूरा भरोसा। भरोसा वामपंथियों के भी झक मार कर समर्थन देने का। जी हां, यह चिदम्बरम ने कहा है। बोले- ‘एनडीए को सत्ता से दूर रखने के लिए वामपंथी यूपीए का समर्थन करेंगे।’ पर अपन को तो आशंका पवार के तीसरे मोर्चे में जाने की। पर बात चिदम्बरम की। जो कांग्रेस दफ्तर में अपन को समझा रहे थे- ‘नेताओं को आतंकवाद से उतना खतरा भी नहीं। जितना मीडिया फैला रहा।’ पर वह आडवाणी को सावधान करके कांग्रेस दफ्तर आए थे। उनने माना- ‘आडवाणी -वरुण को खतरा। सो सरकार ने दोनों की सुरक्षा बढ़ा दी। यही बताने आडवाणी के घर गया था।’ चिदम्बरम ने वरुण को खतरा बताकर मायावती की पोल खोल दी। मायावती ने अपने डीआईजी से कहलवाया था- ‘वरुण की सुरक्षा को खतरे की कोई धमकी नहीं मिली।’ बात वरुण की चली। तो बताते जाएं- सुप्रीम कोर्ट ने रासुका पर माया सरकार को नोटिस दे दिया। पर बात आडवाणी-वरुण की चली। तो चिदम्बरम दोनों पर भड़के। बोले- ‘शर्म की बात है आडवाणी ने वरुण को टिकट दिया।’ सोचो, संजय गांधी की दुर्घटना में मौत न हुई होती। वही इंदिरा गांधी के वारिस रहते। तो किसी चिदम्बरम की ऐसी हिम्मत होती। चिदम्बरम तो स्विस बैंक के मुद्दे पर भी आडवाणी से खफा दिखे। आडवाणी ने कहा था- ‘सत्ता में आए, तो स्विस बैंकों में जमा धन वापस लाएंगे।’ चिदम्बरम बोले- ‘आडवाणी  ने एनडीए शासन में ऐसा क्यों नहीं किया।’ इस पर अरुण जेतली ने बोलती बंद करने वाला जवाब दिया- ‘हमने तो क्वात्रोची का खाता सील भी करवा दिया था। सोनिया के इशारे पर चिदम्बरम ने सील तुड़वाई।’ पर यह तो थी बात चुनाव लांछनबाजी की। कुछ बात जनता के मुद्दों की भी हो जाए। आज बीजेपी का घोषणा पत्र जारी होगा। तो पुराने मुद्दों के साथ रोटी-रोजगार का भी वादा होगा। यों हल्ला बीजेपी के पुराने मुद्दों पर ही मचेगा। पर अपन बताते जाएं- आपको अब्दुल कलाम का विजन 2020 तो याद होगा। कुछ उसी की झलक दिखेगी घोषणा पत्र में। कलाम का ख्याल था- ‘गांवों के आसपास हब बनें।’ उनने नाम दिया था- ‘पुरा।’ पब्लिक यूटिलिटी सर्विस इन रूरल एरिया। ताकि आबादी का दबाव शहरों पर न बढ़े। सो गांव-किसान की बात करेगी बीजेपी। कांग्रेस ने तीन रुपए किलो चावल का वादा किया। तो बीजेपी बीपीएल को दो रुपए में देगी। आंतरिक सुरक्षा तो आडवाणी-जोशी का वैसे भी मनपसंद मुद्दा। जोशी ने लिखा है घोषणा पत्र। जोशी का आपको पता ही होगा। सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित नए भारत की बात करेंगे ही। यों घोषणा पत्र तो अपन आज देखेंगे ही। बात हो रही थी चिदम्बरम की। जो पवार के सवालों पर बेहद परेशान दिखे। सचमुच शरद पवार की दोहरी सदस्यता पर कांग्रेस की नींद हराम। दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर ही तो टूटी थी जनता पार्टी। गिरी थी मोरारजी सरकार। अब यूपीए पर भी दोहरी सदस्यता की मार।

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