माया-जयललिता ने थर्ड फ्रंट में भेजे भाजपाई दूत

तो अब तीसरे मोर्चे का पत्थर तुमकर में रखा गया। तो सबसे पहले कांग्रेस घबराई। ममता की शर्त मान ली। बंगाल की अठाईस सीटें ममता की, चौदह कांग्रेस की। कांग्रेस ममता के आगे झुकी। तो शरद पवार भी शेर हो गए। बोले- 'थर्ड फ्रंट का भी चांस। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर समझौता न करे। तो पीएम के चुनाव में सहयोगी दलों का भी दखल होगा।' पर बात गुरुवार को फिर से जन्में थर्ड फ्रंट की। अपने हरदन हल्ली डोडेगोडा देवगौडा फिर फुदकने लगे। फिर पीएम बनने का ख्वाब देखने लगे। प्रकाश करात ने भी खूब ख्वाब दिखाए। थर्ड फ्रंट की रैली में बोले- '1996 में देश को पहली बार पता चला। कांग्रेस-भाजपा देश का भला नहीं कर सकते।' बाद में इन्हीं लैफ्टियों ने 2004 में कांग्रेस सरकार बनवाई। और देवगौड़ा ने भी खूब भला किया था देश का। सारी अर्थव्यवस्था चौपट करके गए थे। अब फिर देवगौड़ा को ख्वाब देखने का पूरा हक। पर उतना ही हक मायावती और जयललिता को भी। इसीलिए तो दोनों थर्ड मोर्चे के श्रीगणेश में नहीं पहुंची। पर अपन बात कर रहे थे करात की। एटमी करार पर मनमोहन से समर्थन वापस लिया। तो मायावती को पीएम बनाने का ख्वाब दिखा रहे थे। कई दिन तो सीपीएम में बवाल भी मचा। पर आखिर में सीपीएम ने हामी भर दी। अब देवगौड़ा को ख्वाब दिखाए। तो मायावती क्यों जाती। सो वह तुमकर नहीं पहुंची। वैसे तुमकर में सेक्युलरवादियों की रैली कम। देवगौडा के वोकालिंगा जाति भाई ज्यादा थे। वही देवगौड़ा की ताकत। जाति भाई की बात चली। तो बताते जाएं। अब अपने चंद्रबाबू नायडू भी जातिवादी हो गए। बेंगलूर के जिस अशोका होटल में ठहरे थे। वहां आंध्र की कम्मा जाति के लोगों का जमघट हो गया। आंध्र में बाबू का सितारा फिर बुलंदी पर। राजनीति में सितारा कब डूब जाए। कौन जाने। कभी भावी पीएम माने जाते थे। पर सीएम भी नहीं रहे। सो उनने पीएम पद से पल्ला झाड़ लिया। तुमकर की रैली में बोले- 'मैं पीएम पद का दावेदार नहीं।' बात पीएम की चल ही पड़ी। तो बताते जाएं- थर्ड फ्रंट के हाथ में अनार आया नहीं। बीमार सारे पड़ गए। बीमारों की हालत देखिए। पिछले साल ऐसी ही रैली जयललिता ने की थी। चंद्रबाबू, चौटाला, मुलायम, फारुक, अजित सब पहुंचे थे। पर वहां जयललिता को नेता नहीं चुना। तो वह बिफर गई। मुलायम ने दिल्ली में मीटिंग बुलाई। तो जयललिता नहीं आई। तब देवगौडा बीजेपी के साथ थे। सो थर्ड फ्रंट से दूर ही रहे। यों थर्ड फ्रंट की असलियत बताते जाएं- 'जब चाहे बीजेपी के साथ। जब चाहे कांग्रेस के साथ। जब चाहे दोनों के खिलाफ।' एटमी करार पर सरकार गिरने लगी। तो थर्ड फ्रंट एक था। लैफ्ट ने समर्थन वापस लिया। तो सबसे पहले थर्ड फ्रंट में भूचाल आया। थर्ड फ्रंट के झंडाबरदार मुलायम सबसे पहले खिसके। मुलायम खिसके, तो मायावती घुस आई। वामपंथियों के हाथ में मायावती रूपी ऐसा खिलोना आया। जिसे देख प्रकाश करात का चेहरा खिलखिला उठा। थर्ड फ्रंट का चेहरा-मोहरा बदल गया। हाथ-पांव, घुटने-टखने, कुल्हे-कंधे तो वहीं थे- बाबू, चौटाला, अजित, चंद्रशेखर राव, देवगौडा। पर चेहरा मुलायम की जगह मायावती का हो गया। सरकार तो बची, पर थर्ड फ्रंट नहीं बचा। अजित, चौटाला, प्रफुल्ल महंत बीजेपी से जा मिले। अब टूटा फूटा थर्ड फ्रंट तुमकर में फिर जुटा। तो जयललिता, मायावती भी नहीं पहुंची। जिस नवीन पटनायक पर करात इतरा रहे थे। वह भी नहीं गए। नुमाइंदां भी नहीं भेजा। थर्ड फ्रंट के दलों की पहचान करिए- लैफ्ट के अलावा चंद्रबाबू नायडू, चंद्रशेखर राव, देवगौड़ा। मायावती-जयललिता खुद नहीं आई। अपने नुमाइंदे भेजे। कांग्रेस, बीजेपी के साथ थर्ड फ्रंट का दरवाजा भी खुला रखा। दोनों ने अपने नुमाइंदे भी भेजे, तो दोनों पुराने भाजपाई। मायावती ने सतीश चंद्र मिश्र को भेजा। जयललिता ने डा. मैत्रेयन को। दोनों पुराने भाजपाई। बीजेपी की सीटें कांग्रेस से ज्यादा आई। तो यही दोनों बीजेपी के संपर्क सूत्र होंगे।

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