झूला बदलने की चुनावी सर्कस शुरू
भले ही प्रणव दा को पीएम की कुर्सी नहीं मिली। एक्टिंग पीएम भी नहीं बन पाए। पर बुधवार को जब वह बार-बार आडवाणी को पूर्व उपप्रधानमंत्री बता रहे थे। तो अपन को लगा जैसे बगल में बैठी सोनिया से कह रहे हों- 'कम से कम आखिरी दिनों में उपप्रधानमंत्री ही बना दो।' प्रणव दा अभिभाषण पर हुई बहस का जवाब दे रहे थे। तो आडवाणी को लेकर ज्यादा ही सावधान थे। आडवाणी ने प्रणव दा की तारीफ जो कर दी थी। सो बदले में आडवाणी की तारीफ करने लगते। तो सोनिया के दरबार में बने-बनाए नंबर कट जाते। सो उनने एनडीए राज को याद कराकर आडवाणी को सुई चुभोई। बोले- 'संसद पर हमले के बाद आपने बार्डर पर सेना लगा दी थी। बारूदी सुरंगें बिछा दी थी। हमने मुंबई पर आतंकी हमले के बाद यह सब नहीं किया। पर वह हासिल कर लिया। जो आप नहीं कर पाए।' पाक ने अमेरिका के दबाव में कसाब को क्या कबूला। प्रणव दा अपनी पीठ ठोकने लगे। पर बात कसाब की चली। तो बताते जाएं। पाक के अटार्नी जनरल ने बुधवार को वही कर दिया। जो अपन ने तेरह फरवरी को लिखा था। पाक के अटार्नी जनरल सरदार मोहम्मद गाजी ने कहा है- 'आतंकवादियों को सजा दिलाने के लिए कसाब पाक के हवाले किया जाए।' बात सही, कसाब की गवाही बिना लखवी-जरार शाह पर आरोप कैसे साबित होंगे। पर आतंकवाद के खिलाफ पाक की नियत पाक-साफ नहीं। तो अपनी भी कहां। मोदी-आडवाणी ने स्लीपिंग सेल की बात कही। तो कांग्रेस की नींद हराम। प्रणव दा ने अपने जवाब में तो चुप्पी साधी। पर महाराष्ट्र के होम मिनिस्टर से कहलवाया- 'मुंबई पर हुए हमले में कोई लोकल नहीं था।' वैसे अपन पूछें तो हर्ज क्या। पाकिस्तानी आतंकियों ने बिना लोकल मदद के सिम कार्ड कैसे खरीदे? जरा वह भी आरआर पाटिल बता देते। जैसे पाक के शासक नहीं मान रहे थे। वैसे ही भारत के शासक भी नहीं मान रहे। कबूतर के आंख बंद करने से बिल्ली नहीं भागती। कांग्रेस पता नहीं भारतीय आतंकियों को बचाने के मूड में क्यों। अपने जेटली ने इसी मानसिकता को तालिबानाईजेशन को हवा देना कहा। बात जेटली की। तो बुधवार को वह राज्यसभा में अभिभाषण पर बोल रहे थे। उनने कहा- 'मनमोहन सिंह तो बेचारे रात के चौकीदार। जब तक राहुल बाबा सोकर उठ नहीं जाते।' उनने कहा- 'कांग्रेस ने पीएम पद का कद ही घटा दिया। मनमोहन सिंह देश को नहीं, किसी और को जवाबदेह। पीएम पद के लिए वह कांग्रेस की पहली पसंद नहीं थे। कांग्रेस में जोर अब भी परिवार के वारिस पर।' अब कांग्रेस इससे इनकार भी नहीं कर सकती। चुनाव में मनमोहन से ज्यादा होडिंग राहुल बाबा के होंगे। पर राहुल बाबा की दाल तो यूपी में भी नहीं गल रही। कांग्रेस यूपी में मुलायम से गठजोड़ को उतावली। पर मुलायम पंद्रह से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं। कांग्रेस पंद्रह सीटों पर फ्रेंडली मुकाबले में आए। तो मुलायम को क्या फायदा। सो उनने भी बुधवार को गुगली फेंक दी। कहा- 'वाजपेयी-आडवाणी से भी हो रही है बात।' यों बात हुई नहीं। पर आडवाणी को कोई परहेज भी नहीं। उनने तो दीन दयाल उपाध्याय की पुण्य तिथि पर कहा ही था- 'राजनीति में छुआछूत के हम खिलाफ नहीं।' तो शायद मुलायम को लोहिया की याद आ गई हो। लोहिया-दीनदयाल ने पहली बार कांग्रेस का किला भेदा था। पर सिर्फ मुलायम नहीं। बुधवार को करुणानिधि के चेलों ने भी लोकसभा में तेवर दिखाए। आप सर्कस का वह सीन याद करिए। जिसमें लड़कियां झूला झूल रही हों। इधर का झूला उधर जा रहा हो। उधर का इधर। और झूलती हुई लड़कियां झूला बदल लेती हैं। कोई किसी का हाथ थाम झूला बदल लेती है। तो कोई किसी की टांग पकड़कर। चुनावों से पहले राजनीतिक दलों में वही सर्कस देखेंगे अपन।
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