ताकि राम मंदिर पर कोई भ्रम न रहे

बीजेपी की नेशनल काऊंसिल पूरे शबाब पर रही। शुक्रवार को वर्किंग कमेटी में भाषण हुआ। तो राजनाथ सिंह ने तीनों मुद्दों को नहीं छुआ। यह बात अपन ने कल लिखी थी। अपने मीडिया बंधुओं को वही खबर चाहिए। तीनों मुद्दे दोहराए, तो क्यों दोहराए। नहीं दोहराए, तो क्यों नहीं दोहराए। सो खबर वही बनी। राजनाथ सिंह के भाषण में मंदिर, सिविल कोड, 370 का जिक्र तक नहीं। संघ की तरह मीडिया भी बीजेपी को याद कराता रहता है- 'अपनी जड़ें मत छोड़िए।' बात संघ की चली। तो बताते जाएं- नागपुर संघ का हेड क्वार्टर। सो यह भी खबर बनी- 'सुदर्शन, भागवत नागपुर से नदारद।' जैसे वैसे वे नागपुर में ही बैठे रहते हैं। अठाईस जनवरी को अपनी मोहन भागवत से मुलाकात हुई। तो उनने बताया था- 'मैं पांच फरवरी को तो नागपुर में हूं। पर इसी दिन आगे का प्रवास।' केएस सुदर्शन का प्रोग्राम तो महीनों पहले तय होता है। मोहन भागवत का भी कम से कम दो महीने पहले। बीजेपी वर्किंग कमेटी की तरह प्रोग्राम नहीं बदलते। होनी थी जनवरी में, हुई फरवरी में। बात मीडिया की चल ही पड़ी। तो बताते जाएं- एक और खबर उड़ी। खबर थी- राजनाथ जब अध्यक्षीय भाषण दे रहे थे। तो नरेंद्र मोदी ने टोका। अब जो राजनीतिक दलों की वर्किंग नहीं जानते। उनके लिए यह खबर होगी। पर जो जानते थे, उनने बाकायदा चैक किया। नरेंद्र मोदी ने कोई टोका-टाकी नहीं की। अपनी बारी से ही बोले। हां, राजस्थान-दिल्ली की हार को भूलने की बात उनने कही। लब्बोलुबाब था- 'बीती ताहि बिसार दे। आगे की सुध ले।' बात मोदी की चली तो बताते जाएं- अपन ने कहा था- मोदी का कद बढ़ेगा। शुरूआत तो हो गई। मोदी गुजरात के साथ महाराष्ट्र, गोवा के भी चुनाव इंचार्ज। पर बात हो रही थी राजस्थान-दिल्ली में हार की। हां, राजनाथ ने हार का जिक्र किया था। तो क्या हार को पी जाते राजनाथ। हार याद कराना सबक लेने के लिए जरूरी। सो हार राजनाथ ने शनिवार को काऊंसिल में भी याद कराई। पर राजस्थान के नेता सबक सीखते नहीं दिखते। राज्य की रपट न वसुंधरा ने रखी, न ओम माथुर ने। यह है हार से मुंह छुपाना। पर बात काऊंसिल के शबाब की। राजनाथ सिंह शनिवार को तो वाजपेयी का विकल्प दिखने लगे। उनका भाषण सिर चढ़कर बोला। उनने राम मंदिर पर तो मीडिया की खबर गलत की ही। कांग्रेस को गांधी के मुद्दे पर भी कटघरे में खड़ा किया। राजनाथ ने बरसों बाद वाजपेयी का गांधीवादी समाजवाद याद दिलाया। जब उनने कहा- 'कांग्रेस के पास गांधी का क्या है। सिर्फ एक परिवार से जुड़ा गांधी का नाम। गांधी ने तो हिंद स्वराज में सभ्यताओं के संवाद की बात कही थी। पर कांग्रेस ने देश में आपसी वैमनस्य खड़ा कर दिया। कांग्रेस की रहनुमाई वाली सरकार सभ्यताओं की लड़ाई कैसे खत्म कराएगी। कांग्रेस के चिंतन में न हिंद स्वराज है। न ग्राम स्वराज है। न नीतियों में गांव की कोई जगह। न किसान का सम्मान। न स्वदेशी कुटीर उद्योग। न त्याग, न वैराग्य का जीवन जीने वाले लोग। कांग्रेस में न स्वदेशी शैली बची, न स्वदेशी भाषा। गांधी के कर्मवाद की प्रतीक गीता कांग्रेस की नजर में सांप्रदायिक। गांधी के राम राज्य का तो कोई मतलब ही नहीं। जब कांग्रेस ने कह दिया- भगवान राम हुए ही नहीं।' राजनाथ ने दावा किया- 'गांधी की नीतियां हमने अपनाई।' राजनाथ के भाषण से अपन को गांधीवादी समाजवाद की गंध आई। रही सही कसर अपने यशवंत सिन्हा ने आर्थिक प्रस्ताव में पूरी की। जब उनने कहा- 'यूपीए सरकार देश का ऐसा बिगड़ा हुआ बच्चा। जिसने सब कुछ फिजूलखर्ची में उड़ा दिया। सारा बजट सांप्रदायिक बना डाला।' कांग्रेस पर मुस्लिमपरस्ती का आरोप लगाया। यह आरोप शुक्रवार को राजनाथ के भाषण में भी था। बात राजनाथ की। तो उनने राम मंदिर पर भ्रांति साफ की। बोले- 'हम मंदिर के हिमायती। हम मंदिर बनाएंगे, पर जनता पूरा बहुमत दे। पूरा बहुमत मिला, तो कानून बनाकर मंदिर बनाएंगे।'

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