कमाल के हैं कलाम

माना- मनमोहन की गठबंधन सरकार। पर छोटे-छोटे दलों की ऐसे बंधक बनेगी। अपन ने नहीं सोचा था। वेणुगोपाल के मामले में हैल्थ मिनिस्टर रामदौस ने जो किया। उससे मनमोहन की छवि भी कोई अच्छी नहीं बनी। रामदौस पहले दिन से एम्स डायरेक्टर वेणुगोपाल को हटाने पर आमादा। रिश्तेदार डायरेक्टर लाने की सुगबुगाहट शुरू से। सो रामदौस ने इसे सरकार का न्यूनतम साझा कार्यक्रम बना दिया। तीन साल से सरकार इसी एजेंडे के इर्द-गिर्द। दो बार गवर्निंग बॉडी से बर्खास्तगी करवाई। पर दोनों बार अदालत में मुंह की खानी पड़ी। आखिरी फैसला इसी 29 मार्च को आया। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- 'तैनाती पांच साल के लिए। तैनाती चिट्ठी में पहले हटाने का कोई जिक्र नहीं।' इतना ही नहीं। रामदौस की बार-बार की कोशिशों पर अदालत ने कहा- 'ऐसा लगता है- मंत्री ने डायरेक्टर को हटाना अपना एजेंडा बना लिया।' कोई मंत्री खुन्नस में ऐसे काम करेगा। डेमोक्रेसी में कोई सोच भी नहीं सकता। रामदौस ने आखिर संसद से बिल पास करवा लिया- 'पांच साल या पैंसठ की उम्र, जो भी पहले हो। तीन महीने के नोटिस में हटाया भी जा सकेगा। कानून राष्ट्रपति के दस्तखत वाले दिन से ही लागू होगा।' संसद के इस फैसले पर अपन को पाकिस्तान का ख्याल आया। अपन को दोनों देशों के लोकतंत्र में कोई ज्यादा फर्क नहीं दिखा। जिसके हाथ में लाठी, उसके हाथ में भैंस वाला लोकतंत्र हो गया। राज्यसभा में तो कमाल ही हो गया। जब नए चेयरमैन ने नियम-कायदे को भी ताक पर रख बिल पास करा लिया। बीजेपी ने न सिर्फ ऐतराज जताया। चेयरमैन का बायकाट भी किया। ऐसा अक्सर नहीं होता। पर जो जैसे बीज बोएगा। वैसा ही फल पाएगा। जब भैरोंसिंह शेखावत चेयरमैन हुआ करते थे। तो पीएसी अध्यक्ष के नाते बूटा सिंह ने नियम की धाी उड़ाई। इस पर शेखावत की टिप्पणी से कांग्रेस इतनी खफा हुई। चेयरमैन के खिलाफ बयानबाजी तो की ही। तीन दिन सदन नहीं चलने दिया। पर बूटा सिंह के दलगत तौर-तरीके अपन ने बिहार में देखे। जिस पर सुप्रीम कोर्ट की ख्िचांई से बूटा सिंह की लाट साहिबी गई। अब वेणुगोपाल के मामले पर भी हू-ब-हू वैसी हालत। बिल का मकसद सिर्फ एक- 'वेणुगोपाल को हटाना।' सो वेणुगोपाल बुधवार को सुप्रीम कोर्ट चले गए। गुरुवार को अदालत ने अर्जी मंजूर कर ली। सोम को सुनवाई भी तय कर दी। अपन को उम्मीद थी। कोर्ट के फैसले तक राष्ट्रपति  मोहर नहीं लगाएंगी। पर शाम होते-होते प्रतिभा पाटिल की मोहर लग गई। पता नहीं क्यों, अपन को अब्दुल कलाम याद आ गए। जिनने आफिस आफ प्राफिट का बिल रोक दिया था। तो मनमोहन सरकार की घिग्गी बंध गई थी। जब के.आर. नारायणन ने बिहार में राष्ट्रपति राज की सिफारिश रोकी। तो वाजपेयी सरकार की घिग्गी बंध गई थी। पर बात कलाम की चली। तो बताएं- राष्ट्रपति पद से हटकर कोई इतना व्यस्त नहीं रहा। जितने अपने कलाम। हर रोज कहीं न कहीं भाषण या इंटरव्यू। इंटरव्यू की बात चली। तो बताएं- पिछले दिनों एक चैनल के स्टूडियो में इँटरव्यू देने गए। बाहर निकलते हुए उनने कहा- 'आप देश के सफल लोगों पर खबरें क्यों नहीं दिखाते। राजनीति, हत्या, जातिवाद ही क्यों?' यों तो कलाम की वेबसाइट- अब्दुलकलाम डाटकाम पहले से थी। पर आइडिया आया। सो उनने उसी वेबसाइट पर एक ई-पेपर शुरू कर दिया- 'बिलियन बीट्स'। चौदह नवंबर को पहला पेपर दिखा। उनतीस को दूसरा। अपन ने देखा- पहली लीड स्टोरी बेगलुरू की आठ साल की लड़की की। जिसने देश में अनुशासन की कमी पर अपनी राय लिखी। अब्दुल कलाम का मकसद लोगों में ज्ञान पहुंचाना। अब्दुल कलाम को राजनीति से कितनी नफरत। इसका उदाहरण वेबसाइट में दिखा। उनने गणतंत्र-स्वतंत्रता दिवसों पर दिए भाषण तो दर्ज किए। पर सेंट्रल हॉल में दिए अभिभाषण नहीं। जिसे उनने नही, सरकार ने लिखकर भेजा था।

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