चुनाव में आडवाणी के लक्ष्मण होंगे नरेंद्र मोदी

चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने शांत समुद्र में कंकड़ फेंक दिया। लंदन जाकर बोले- 'लोकसभा चुनाव आठ अप्रेल से पंद्रह मई के बीच होंगे।' याद है- अपन ने 24 जनवरी को ही लिखा था- 'पर चुनाव होंगे अप्रेल-मई में।' वैसे अप्रेल-मई में कुल 61 दिन। कुरैशी ने इनमें अड़तालीस दिन तय किए। सिर्फ तेरह दिन छोड़े। वैसे कोई अनाड़ी भी ये तारीखें बता दे। पर आयोग में खलबली मच गई। बाकायदा खंडन जारी किया गया- 'आयोग में अभी कोई मीटिंग ही नहीं हुई।' पर लगते हाथों अपन कुरैशी की एक और बात याद करा दें। आयोग में वह अकेले थे। जो जम्मू कश्मीर में चुनाव टालने के हिमायती थे। उन्हीं के हवाले से एक खबरिया चैनल ने खबर चला दी थी- 'जम्मू कश्मीर के चुनाव अभी नहीं होंगे।' तब भी आयोग में खलबली मची थी। चैनल को फोन करके कहा गया- 'चुनाव टालने या कराने का कोई फैसला नहीं हुआ।' पर आखिर वक्त पर ही चुनाव हुए। कांग्रेस के शुरूआती विरोध के बावजूद हुए। यह बात अलग। जो बाद में गुलाम नबी फौरी चुनाव के हक में हो गए। बात जम्मू कश्मीर की चली। तो बताते जाएं- ओबामा ने रिचर्ड होलबु्रक को पाक-अफगानिस्तान का जिम्मा सौंपा। तो अपने यहां अमेरिका नियत पर शक हुआ। कहीं अमेरिका का इरादा कश्मीर मामले में दखल का तो नहीं। अपन को सुसान राईस का बयान याद आया। सुसान को यूएन में अमेरिकी दूत बनाया है ओबामा ने। सुसान ने कश्मीर को दुनिया का विवादास्पद हल्का बताया था। अपने कान तो तभी खड़े हुए थे। पर रिचर्ड होलबु्रक की तैनाती से सारे देश के कान खड़े हुए। हिलेरी क्लिंटन का इरादा तो अपन को पहले पता ही था। उनने चुनाव के दौरान ही इशारा किया था। खैर राहत की बात यह रही। बुधवार को अमेरिका ने सफाई दी। विदेश विभाग के प्रवक्ता राबर्ट वुड ने कहा- 'होलबु्रक का अधिकार क्षेत्र सिर्फ अफगानिस्तान-पाकिस्तान। वह भी पाक के कबाइली इलाकों के संदर्भ में।' पर अपन बात कर रहे थे चुनाव की। तो इस बार चुनावी हलचल वक्त से पहले शुरू हो चुकी। उम्मीदवारों का एलान शुरू हो गया। गठबंधनों की बातचीत शुरू हो चुकी। गठबंधन की बात चली तो बताते जाएं- 'मुलायम-सोनिया गठबंधन में मायावती ने टांग अड़ा दी है।' मायावती की गहलोत को पांच साल के समर्थन की चिट्ठी से मुलायम की नींद हराम। इसे कांग्रेस के नेता इशारा मान रहे हैं। कल्याण-मुलायम खिचड़ी से कांग्रेस की भौंहें तनी ही हुई हैं। मुलायम को मुस्लिम विरोध अब समझ आने लगा। वह अलग बात, पर मायावती की चिट्ठी से अमर सिंह की बोलती बंद। रीता बहुगुणा भी धमकी देने लगी- 'तीस जनवरी तक फैसला करो।' यूपी में अब तक कांग्रेस मुलायम भरोसे थी। मनमोहन कांग्रेस-सपा में पुल बने थे। पर मनमोहन के बिस्तर पकड़ने पर अब राजनीति में उतार-चढ़ाव होगा। वह बुधवार को आईसीयू से भले बाहर आ गए। यों पीएम के लिए अस्पताल का हर कमरा आईसीयू से कम नहीं। बात अस्पताल में पड़े पीएम की चल ही पड़ी। तो बताते जाएं- सोनिया परिवार वालों से मिलकर लौट आई थी। तो अपनी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील सोए पड़े पीएम के सिरहाने फूलों का बुका छोड़ आई। पर बात राजनीतिक असर की। अब राहुल की भूमिका अहम होने में कोई शक नहीं। मनमोहन को कम तवज्जो मिलेगी। तो उन्हें कोई गिला भी नहीं होगा। मनमोहन अब स्टार प्रचारक नहीं होंगे। यों राहुल के सामने आने से बेचैनी जरूर। पर बीजेपी की रणनीति में ज्यादा बदलाव नहीं। पीएम के उम्मीदवार आडवाणी ही रहेंगे। बीच रास्ते में नरेंद्र मोदी को लाने का कोई इरादा नहीं। पर मोदी चुनाव में निभाएंगे अहम भूमिका। सरकार बनी, तो अहम भूमिका में होंगे मोदी भाई। आडवाणी के लक्ष्मण अब प्रमोद की जगह मोदी होंगे।

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