जग के ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार

कांग्रेस-लेफ्ट में लाख मतभेद। पर तस्लीमा के मुद्दे पर दोनों एक। तस्लीमा दोनों पार्टियों के लिए शाहबानो बन चुकी। जरा तस्लीमा के बारे में बता दें। तब बांग्लादेश नहीं बना था। पूर्वी पाकिस्तान था। जब मेमनसिंह में तस्लीमा अगस्त 1962 में पैदा हुई। तस्लीमा ने डाक्टरी पास की। सरकारी डाक्टर हो गई। पर लिखने का शौक घटने के बजाए बढ़ गया। बात शुरू हुई 1990 से। जब तस्लीमा ने मुस्लिम औरतों की दशा पर अखबार में लेख लिखा। कट्टरपंथियों ने अखबारों पर हमले किए। कट्टरपंथी संगठन- 'इस्लाम के सिपाही' ने तो 1993 में फतवा ही जारी कर दिया। सरकारी दबाव  में तस्लीमा को ढाका मेडिकल कालेज की नौकरी छोड़नी पड़ी। मुकदमा भी दायर हुआ। गैरजमानती वारंट भी निकले। पर तस्लीमा और जुझारू हो गई। तस्लीमा ने बांग्लादेशी हिंदुओं पर हुए अत्याचारों पर अपनी कलम चलाई। तस्लीमा का नावल 'लज्जा' हिंदुओं की दुर्दशा पर ही। इस नावल ने तो कट्टरपंथियों की नींद उड़ा दी। कट्टरपंथियों ने मांग की- 'तस्लीमा का सर कलम किया जाए।' आखिर तस्लीमा स्वीडन चली गई। बांग्लादेश में उदारवादी सरकार बनी। तो 1998 में स्वदेश लोटी। पर जल्द ही कट्टरपंथी फिर सिर उठाने लगे। तो 1999 में भारत आ गई। तब से कभी कोलकाता, तो कभी स्वीडन। पर इस बीच बात 2004 की। जब बंगाल की लेफ्ट सरकार ने कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेके। तस्लीमा की किताब 'दुखिनदितो' बैन की गई। पर मानवाधिकार संगठनों ने अदालत में चुनौती दी। तो हाईकोर्ट ने बैन हटाया। तब तस्लीमा नसरीन ने कहा था- 'यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जीत।' पर तस्लीमा तब से सीपीएम की आंख की किरकिरी। अब जब नंदीग्राम में मुस्लिम सड़कों पर उतरे। तो लेफ्ट सरकार ने तस्लीमा को धोखे से जयपुर भेज दिया। भले ही अपनी वसुंधरा ने भी जयपुर से दिल्ली भेज किनारा किया। पर राजस्थान का अमन चैन बचाने का यही तरीका ठीक रहा। वसुंधरा ने बिन बुलाए आए मेहमान से किनारा नहीं किया। जयपुर न सही- 'पधारो म्हारे देस' न सही। दिल्ली का राजस्थान भवन सही। मेहमाननवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी। तस्लीमा दो दिन राजस्थान हाउस में रही। तो दोनों दिन वसुंधरा खुद कंट्रोल करती रही। तस्लीमा को लेकर लेफ्ट ने जितनी फजीहत अपनी करवाई। उतनी ही जगहसाई यूपीए सरकार की भी। आखिर वही हुआ। जो होना था। सोमवार की रात केंद्रीय एजेंसियां तस्लीमा को उठा ले गई। भले ही वसुंधरा ने भी तस्लीमा को दिल्ली भेजा। पर चोरों की तरह गायब नहीं किया। जैसे केंद्र सरकार ने किया। बीजेपी संसद में सरकार पर हमलावर हुई। तो जवाब आया- 'तस्लीमा पर बुधवार को बयान देंगे।' पर मंगलवार को संघ का बयान धमाकेदार रहा। आखिर 'लज्जा' ने बांग्लादेशी हिंदुओं पर अत्याचारों को जुबान दी।  मौका था- तरुण विजय की नई किताब- 'सेफरन सर्ग' के विमोचन का। सेफरन सर्ग यानि 'भगवा लहर'। जो संघ प्रमुख के. एस. सुदर्शन के हाथों रिलीज हुई। भगवा लहर पर चार प्रमुख पत्रकार भी बोले। करण थापर, सैईद नकवी, संध्या जैन, चंदन मित्रा। पर बात के. एस. सुदर्शन की। तस्लीमा पर पूछा गया। तो उनने नरेंद्र मोदी वाला स्टेंड दोहराया। जिसका जिक्र अपन ने कल यहीं पर किया। मंगलवार को मोदी भावनगर में थे। उनने पब्लिक मीटिंग में कहा- 'तस्लीमा ने कट्टरपंथियों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत की।' केंद्र तस्लीमा की हिफाजत नहीं कर सकता। तो गुजरात की जनता और सरकार उसकी हिफाजत करेगी। संघ प्रमुख ने भी मोदी के स्टेंड पर मुहर लगाते हुए कविता गुनगुनाई- 'जग के ठुकराए लोगों को, लो मेरे घर का खुला द्वार।' मतलब साफ था- तस्लीमा को भारत की नागरिकता मिले।

भूखे नंगे, अपराधी और आतंकी जब

भूखे नंगे, अपराधी और आतंकी जब भारत में आ सकते है मतदाता बन सकते है तो कोई लेखक क्यों नहीं? सलमान रश्दी को भी बुला लो.

लेकिन सवाल यह कि सलमान को

लेकिन सवाल यह कि सलमान को भारत मे बसने का शौक है कि नही?

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