राजनाथ ने शेखावत को माना अपना नेता

साल के पहले हफ्ते में ही बवंडर। साल के शुरू में ही दूसरा कारगिल यूपीए को जख्म दे गया। यूपीए को दूसरा जख्म झारखंड के मुख्यमंत्री की हार से लगा। जख्मों से तो बीजेपी भी लहूलुहान हुई। एनडीए राज में एक फोटू खूब चर्चा में आई थी। अटल, आडवाणी और भैरोंसिंह शेखावत की। तीनों की 1957 की फोटू के साथ 2003 में भी तीनों की साथ फोटू छपी। इतना लंबा समय राजनीति में कोई एकजुट नहीं रहता। सो आडवाणी ने माई कंट्री माई लाइफ में दोनों फोटू छापी। पर अब वही तिकड़ी मुंह फुलाकर बैठी है। पर पहले बात दूसरे कारगिल की। पहले कारगिल के वक्त खुफिया एजेंसियां सोई रही।  वाजपेयी सरकार ने कारगिल पर 1999 का चुनाव जीत लिया। तब कांग्रेस कहती थी- 'कैसी जंग। अपनी ही जमीन छुड़ाने के लिए सात सौ जवान शहीद कर दिए।' अब उसी कांग्रेस राज में दो हजार जवान अपनी जमीन पर फिर लड़ रहे हैं। सरकार जाते-जाते कारगिल कांग्रेस को आइना दिखा गया। आज नौवां दिन। मंढेर की पहाड़ियों पर आतंकियों का कब्जा। अपन को फिर वहीं आशंका। जो कारगिल के वक्त थी। पाकिस्तानी फौज ही तो नहीं लड़ रही। पर अपन बात कर रहे थे शिबू सोरेन की। शिबू सोरेन विधानसभा चुनाव हार गए। तेईस अगस्त को सीएम बने थे। छह महीने में एमएलए बनना जरूरी। सो चुनाव लड़ा था। अब मुख्यमंत्री की कुर्सी जानी तय। वैसे यह पहली बार नहीं हुआ। जब कोई मुख्यमंत्री चुनाव हारा। देश के बहुत बड़े नेता थे कैलाश नाथ काटजू। आजादी के फौरन बाद गवर्नर बनाए गए। उड़ीसा और बंगाल के गवर्नर रहे। फिर नेहरू की केबिनेट में कानून और गृहमंत्री। नेहरू ने मध्यप्रदेश का सीएम बनाकर भेजा। काटजू 1962 में सीएम होते हुए चुनाव हार गए। तो राजनीति से संन्यास ले लिया। शिबू सोरेन राजनीति से संन्यास लेंगे। ऐसा अपन सोचते ही नहीं। उनने कनपटी पर पिस्तौल रखकर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की थी। राजनीति में संन्यास की कौन सोचता है। गुरुवार की बात ही लो। अपने भैरों बाबा कोटा-जयपुर में लोकसभा चुनाव लड़ने का शिगूफा छोड़ दिल्ली पहुंचे। तो एक खबरची ने पूछ लिया- 'राजनीति में संन्यास की उम्र होनी चाहिए या नहीं।' उनने कहा- 'नहीं, राजनीति में संन्यास की कहीं उम्र नहीं होती।' बात भैरोंसिंह शेखावत की चली। तो दिल्ली में उनकी मौजूदगी सर्दी में भी राजनीति की गर्माहट महसूस करा गई। इकत्तीस औरंगजेब रोड डेढ़ साल बाद पहली बार आबाद हुई। जब मीडिया ने शेखावत के घर पर धावा बोल दिया। यों कोटा-जयपुर की गर्मी शाम होते-होते ठंडी हो गई। पर वह आज जोधपुर में क्या गुल खिलाएं। कौन जाने। पर बात दिल्ली की। उनने साफ कहा- 'आडवाणी के रास्ते में कहीं अड़चन नहीं। आडवाणी चुनाव लड़ेंगे, वाजपेयी भी लड़ें, मैं भी लड़ूं तो क्या हर्ज।' वाजपेयी की बात चली। तो बता दें- वह चुनाव लड़ने से रहे। सो लखनऊ में मुलायम सिंह ने संजय दत्त को साईकिल पर बिठा दिया। पर बात शेखावत की। राजनाथ सिंह गंगा नहाकर कुएं में नहाने की बात न कहते। तो बवंडर इतना खड़ा न होता। शेखावत का गुस्सा तो वसुंधरा के खिलाफ था। उसी का शिकार राजनाथ और आडवाणी। वसुंधरा के खिलाफ तो पूरी मोर्चेबंदी। उनने अशोक गहलोत को चिट्ठी लिखकर कांग्रेस के चुनावी आरोप याद दिलाए। अब गेंद गहलोत के पाले में। पर बात दिल्ली की। राजनाथ सिंह के खिलाफ गुस्सा साफ झलका। आखिर जब उनने राजनीति शुरू की। तब राजनाथ पैदा भी नहीं हुए थे। उनने राजनाथ को यह याद भी दिलाया। शाम होते-होते अपन को बात बनती दिखी। जब जसवंत सिंह के घर शेखावत-राजनाथ मिल बैठे। भले ही बाहर निकलकर बोले- 'कोई समझौता नहीं हुआ। चुनाव लड़ने का पहला फैसला कायम।' पर राजनाथ ने शेखावत को अपना नेता माना। तो  अब गुस्सा वैसा नहीं रहा।

यह कैसे लोग हैं? क्या कुर्सी

यह कैसे लोग हैं? क्या कुर्सी पर बैठ कर ही देश की सेवा की जा सकती है? क्या इस उम्र में भी गुस्सा करना जरूरी है, और वह भी ऐसा गुस्सा कि अपनी पार्टी की नेता के ख़िलाफ़ ही कार्यवाही की बात कर रहे हैं और वह भी किस से, दूसरी पार्टी के नेता से जो उनकी पार्टी को हराकर सत्ता में आए हैं. कुछ शर्म-वर्म भी है या नहीं इन लोगों को.

सरकार भी कमाल कर रही है. चंद आतंकवादियों ने नकेल डाल रखी है फौज की नाक में. वहां कुछ नहीं कर सकते पर देश को बता रहे हैं कि बाबा राहुल अब प्रधानमन्त्री बनने के लायक हो गए हैं.

एक अमर सिंह है, जो जब-तब सरकार से समर्थन लेने की कहानी छेड़ देता है. होता कुछ है नहीं इस से. अब संजय दत्त को पकड़ लाये हैं, नाटकबाज ससुरे.

राजनीति के खेल निराले.

राजनीति के खेल निराले.

आपने तो बडा गडबड कर दिया। सब

आपने तो बडा गडबड कर दिया। सब सच-सच लिख दिया। अब वे कहेंगे-मीडीया ने बातों को तोड-मरोड कर लोगों तक पहुंचाया।
वैताल पच्‍चीसी और सिंहासन बत्‍तीसी जैसा आनन्‍द आया।

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