मनमोहन ने पाक पर चलाई जुबानी तोपें

मौजूदा मध्यप्रदेश में एक रियासत थी नरसिंहगढ़। नरसिंहगढ़ के महाराज थे प्रभुनाथ सिंह। बाद में नरसिंहगढ़ के सीएम भी रहे। सो महाराज के बेटे भानुप्रताप सिंह जन्मजात कांग्रेसी। एमपी और गवर्नर भी रहे। अब राजनीति के बियाबान में भी कोई मलाल नहीं। संसद के सेंट्रल हाल में आधा घंटा ठहाका न गूंजे। तो समझो महाराज सेंट्रल हाल में नहीं। मंगलवार को धुंध ने मध्यप्रदेश में ही रोक लिया। तो फोन पर अपन से दिल्ली की धुंध का हाल-चाल पूछा। अपन हैरान हुए। महाराज तो कभी मौसम की बात नहीं करते थे। पर वह राजनीतिक धुंध की बात कर रहे थे। बोले- 'दिल्ली की धुंध तो दो-चार घंटे में छंट जाएगी। पर मनमोहन सरकार की धुंध कब छंटेगी। इनका सूरज कब निकलेगा।' महाराज कूटनीतिक जंग वाली खबर से खफा दिखे। बोले- 'देखो, इतने बडे देश की क्या दुर्दशा। पिद्दी से पाक को सबक नहीं सिखा पा रहा। हर आतंकी हमले के बाद कहता है- अबके मार।' अबके मार वाला बयान अपने नए होम मिनिस्टर चिदंबरम का। प्रणव दा के बयान से बिल्कुल उलट। जिसमें उनने कहा था- 'सभी विकल्प खुले।' इसी से जंग का माहौल बना। तिलमिलाए भानुप्रताप सिंह बोले- 'जब कुछ करना नहीं, तो बोलते क्यों हैं?' पर नहीं, न कुछ करेंगे, न बोलने से बाज आएंगे। मंगलवार की बात ही लो। नेशनल एजेंसी पर मुहर लगवाने को मुख्यमंत्रियों की मीटिंग हुई। तो मनमोहन पाक के खिलाफ फिर खूब गरजे। अपन को मुंबई ट्रेन धमाकों की याद आ गई। तब भी मनमोहन ने पाक पर ऊंगली उठाई थी। फिर अचानक अपना हाथ जैकेट की जेब में डाल लिया। ऊंगली दिखाकर छिपाने की आदत से अब देश खफा। पर मनमोहन का कहा तो सुन ही लीजिए। वही जो पहले चिदंबरम ने कहा था- 'मुंबई के हमलावर आतंकियों को पाक की खुफिया एजेंसियों का समर्थन था।' बाकी बातें उनने वाजपेयी वाली दोहराई। जैसे- हम दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं। आतंकवादियों को शह देता है पाक। आतंकवाद पाक की विदेशनीति। बांग्लादेश, नेपाल के रास्ते भी घुसपैठ। वैसे मनमोहन मंगलवार को वाजपेयी से ज्यादा गुस्से में थे। पर अफसोस, बॉडी लैंग्वेज गुस्से वाली नहीं होती। वह सीधी-सपाट। वरना जुबान के तीर तो जोरदार चलाए। बोले- 'पाक आतंकवादियों को नहीं पकड़ रहा। जंग का माहौल बना रहा है।' माफ करिएगा, शुरूआत प्रणव दा ने की थी। फिर अमेरिकी दबाव में पीछे हट गए। पर बात मनमोहन की। भाषण की स्क्रिप्ट अच्छी थी। स्क्रिप्ट पर अपन को याद आया सोनिया का डायलाग। जब उनने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर बताकर गुजरात हारा। अब तक पता नहीं चला- वह डायलाग किसने मारा था। जावेद अख्तर साफ मना कर चुके। मनमोहन ने ऐसी कोई गलती नहीं की। ज्यादातर डायलाग वाजपेयी के ही चुरा लिए। बात चुराने की चली। तो बताते जाएं- जिस नेशनल एजेंसी पर सहमति मीटिंग हुई। एजेंसी का यह आइडिया आडवाणी का था। पर आडवाणी ने सहमति की कोशिश की। तो कांग्रेसी-कम्युनिस्ट मुख्यमंत्रियों ने फच्चर फंसा दिया था। चिदंबरम ने राज्यों की राय ही नहीं ली। पहले बिल पास करवा लिया। फिर सहमति के लिए मीटिंग बुलाई। शादी करके मां-बाप को आशीर्वाद के लिए मजबूर करने जैसी बात। पर राजनीति यहां भी हावी रही। वाजपेयी के जमाने में कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को ऐतराज था। तो अबके ऐतराज भाजपाई मुख्यमंत्रियों ने उठाए। मायावती खुद तो नहीं आई। पर उनने अपने मंत्री लालजी वर्मा से कहलवाया- 'केंद्र ने एजेंसी बनाने से पहले राज्यों से पूछा तक नहीं।' अपने शिवराज सिंह चौहान ने कानून की खामियां बताई। राज्यों के अधिकारों का हनन भी बताया। यही राय नरेंद्र मोदी की भी थी। पर मोदी का रंग-ढंग न्यारा। उनने आतंकवाद की लड़ाई अपने हाथ में लेने पर केंद्र को शुभकामना दी। पर उनने फब्तियों के साथ तीर भी चलाए। बोले- 'आधे-अधूरे मन से नहीं लड़ी जा सकती लड़ाई। पोटा की भरपाई नहीं कर सकता संशोधित सीआरपीसी। नया सख्त कानून ही जरूरी।'

अच्छा लिखा है.

अच्छा लिखा है.

जुबानी तोपें चलाने के अलाबा

जुबानी तोपें चलाने के अलाबा कर भी क्या सकते हैं, बेचारे मनमोहन, बेचारी सरकार, बेचारा देश और बेचारे देशवासी. अरे भाई अगर पाकिस्तान से लड़ना नहीं चाहते तो उस से दोस्ती तो तोड़ सकते हो. बंद करो बस, बंद करो रेल, बंद करो व्यापार, बंद करो सब कुछ. अपना घर ठीक करो. बाहर वालों की ख़बर बाद में ले लेना. अंतुले, शकील, दिग्विजय, लालू, पासवान जैसे अन्दर वालों की पहले ख़बर लो.

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