अब पाकिस्तान के गले में कूटनीतिक फंदा

चीन के उप विदेशमंत्री हे फेई बिचौलिया बनने आए थे। सोमवार को अपने विदेश सचिव से मिले। तो शिवशंकर मेनन ने सबूतों का पुलिंदा थमा दिया। मेनन ने दिन की शुरूआत शाहिद मलिक को तलब करके की। पाकिस्तान के हाई कमिशनर हैं जनाब। मेनन ने मलिक को छह सबूत सौंपे। पहला- अजमल कसाब का कबूलनामा। दूसरा- आतंकियों के रूट मोबाइल का जीपीएस रिकार्ड। तीसरा- आतंकियों की ओर से इस्तेमाल सेटलाईट फोन का कच्चा चिट्ठा। चौथा- सेटलाईट फोन से जरार शाह से हुई बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट। पांचवा- आतंकियों से बरामद हथियारों का ब्योरा। छटा- कराची से मुंबई लाए जहाज की लॉग बुक का रिकार्ड। अब पाकिस्तान का बचकर निकलना मुश्किल। हाई कमिशनर ने सबूत इस्लामाबाद भेजे। तो पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय में सन्नाटा पसर गया। शाह महमूद कुरैशी जहां खड़े थे, खड़े रह गए। पीएम यूसुफ शाह गिलानी की रिचर्ड बाउचर से मुलाकात तय थी। कुरैशी भी मीटिंग में मौजूद होते। पर सबूत मिले, तो सांसें थम गई। पांव रुक गए। गिलानी-बाउचर की ही मुलाकात हुई। कुरैशी बैठ गए दस्तावेज पढ़ने। बोले- 'सबूतों का दस्तावेज पढ़ना ज्यादा जरूरी था।' अपने सबूतों से पीएम गिलानी की भी घिग्घी बंधी। बाउचर से बोले- 'सबूत पुख्ता हुए, तो हम वायदा निभाएंगे। पाकिस्तानियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।' पर अपन जानते हैं। पाक के जरदारी, गिलानी, कुरैशी के हाथ कुछ नहीं। आर्मी चीफ कियानी सब वादे भूला देंगे। अपने पीएम मनमोहन ने जब जरदारी से कहा था- 'भेजो आईएसआई चीफ को। सबूत दिखा देंगे।' तो जरदारी ने हां भरी थी। पर कियानी ने आंख दिखाई। तो मुकरने में देर नहीं लगी। यों अपने पीएम की हरकत भी बचकानी थी। आईएसआई चीफ की बात उठाई ही क्यों। दिल्ली में हाई कमिशनर किसलिए। वही होता है अपने देश का नुमाइंदा। आखिर उसी को थमाए ना सबूत। यों अपन से पहले पाक को एफबीआई ने सबूत दिए। पर पाकिस्तान ने ठुकरा दिए। अमेरिकी राजदूत डेविड मल्फोर्ड इसी बात पर बुरे फंसे। यों मल्फोर्ड की प्रेस कांफ्रेंस पहले से तय थी। मौका था- दूतावास इमारत की पचासवीं सालगिरह का। पांच जनवरी 1959 को हुआ था- इमारत का उद्धाटन। खैर बात हो रही थी- पाक के खिलाफ सबूतों की। तो सवाल हुआ- 'खबर है- पाक ने एफबीआई के सबूत ठुकरा दिए हैं?' तो वह जवाब से बचते दिखे। बोले- 'मैं उस पर टिप्पणीं नहीं कर सकता। अभी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।' अपन लगते हाथों बताते जाएं। होटल ताज में अमेरिकी भी मरे। सो अमेरिकी कानून भी अपना काम करेगा। बात हुई, तो बात चली अमेरिका के पलटने की। याद होगा- अमेरिका ने शुक्रवार को कहा था- 'पाक खुद कार्रवाई करे।' पर अपन चाहते हैं- 'जरार शाह, अबू हमजा, अबू काफा अपने हवाले किए जाएं।' सो मल्फोर्ड से पूछा- 'क्या अमेरिका भारत की इस मांग का समर्थन करेगा?' मल्फोर्ड बोले- 'हां, समर्थन करेगा।' वैसे अपन बता दें- गिलानी-कुरैशी चीख-चीखकर कह रहे हैं- 'सबूत मिले, तो अपने कानून के मुताबिक कार्रवाई करेंगे। किसी पाकिस्तानी को भारत के हवाले नहीं करेंगे।' पर अब बात सिर्फ नान स्टेट एक्टरों की नहीं। शनिवार को पी. चिदंबरम ने कहा- 'पाकिस्तानी एजेंसियों का भी हाथ।' सोमवार को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी बोले- 'पाक की ना-नुकर से लगता है- जरूर स्टेट एक्टरों का हाथ। जहां तक पाकिस्तानियों को सौंपने की बात। तो सार्क देशों में एक्स्ट्राडिशन की सहमति हुई थी।' पर बात अब तू-तू, मैं-मैं की नहीं। पिछले हफ्ते जंग का हौव्वा खत्म हो चुका। जो प्रणव दा ने बेवजह सभी विकल्प खुले बताकर खड़ा किया था। अब मुहिम कूटनीतिक हमले की। चीन को सबूत देकर पाक के खिलाफ कूटनीतिक जंग शुरू। सोमवार को प्रणव दा- मेनन दोनों ने प्रेस कांफ्रेंस कर जंग छेड़ी। आज सारे दूतावासों को सबूत देंगे। दुनियाभर के अपने हाई कमिशनर-राजदूत भी जंग छेड़ेंगे। पाक को आतंकवाद के कटघरे में खड़ा करने का पक्का इरादा।

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