न अंतुले को अफसोस, न सरकार शर्मसार

मनमोहन के अपने ही मंत्री ने छह दिन सरकार की फजीहत करवाई। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया। पाकिस्तान को कहने का मौका मिला- 'मुंबई के आतंकी मुसलिम लिबास में नहीं थे। वे क्लीन शेव थे। वे आर.एस.एस. काडर जैसे दिखते थे। जिसे कसाब कह कर पाकिस्तानी बताया गया। उस की दाईं कलाई पर पीला धागा बंधा है। जैसा हिंदू पहनते हैं।' जी हां, यह सब पाकिस्तानी प्रैस में छपा है। अपन को वहां के पत्रकार अब्दुल कयूम ने लिखकर भेजा। कसाब की वह फोटू भी ई मेल में भेजी। ताकि अपन दाईं कलाई पर बंधा वह धागा देख लें। जिसे अपन पूर्जा-अर्चना के वक्त बांधते हैं। पाक में अंतुले के सवाल भी उठाए गए- 'आतंकी ने पहले पंद्रह मिनट में करकरे को कैसे मार दिया। करकरे ने बुलेट प्रूफ जैकट पहनी थी। यह आतंकी को भी पता था। इसलिए गोली उसकी गर्दन पर मारी। आतंकी ने भीड़ में करकरे को कैसे पहचान लिया।' पाक इसीलिए बार-बार कह रहा है- 'कोई आतंकी पाकिस्तानी नहीं था। कोई कसाब किसी फरीदकोट में नहीं रहता था।' पाक का भी कहना- आतंकी हिंदू थे, जिनने करकरे को निशाना बनाया। जो मालेगांव बम धमाकों की जांच कर रहा था। यही सवाल ए.आर. अंतुले ने उठाया। जब उन ने कहा- 'करकरे कामा अस्पताल की तरफ क्यों गए। ताज होटल की तरफ क्यों नहीं गए। करकरे को उस तरफ जाने का आदेश किसने दिया।' अंतुले छह दिन तक वही बोल रहे थे। जो पाकिस्तान में छप रहा था। मनमोहन हटाने का मन बनाकर भी मन मसोस कर रह गए। आखिर क्यों? क्या वोटों की धार देख रहे थे। अंतुले किस के हाथों में खेल रहे थे? क्या यह कहना चाहते थे- 'मुंबई के पुलिस कंट्रोल रूम में आरएसएस का कब्जा था। या शिवसेना ने करकरे को कामा अस्पताल जाने की हिदायत दी।' क्या कसाब को संघ-शिवसेना निर्देशित कर रहे थे। कैसे पाकिस्तानियों जैसे कुतर्क। सिर्फ अंतुले नहीं। दूसरे मंत्री शकील अहमद की दलीलें भी वैसी थी- 'करकरे आईएसआई-आरएसएस रिश्तों की जांच करने वाले थे।' क्या कह रहे थे- दोनों मंत्री। जिस का समर्थन कर थे- अपने दिग्गी राजा। छठे दिन पी. चिदंबरम- प्रणव मुखर्जी ने अंतुले को समझाया। अपन नहीं कहते। मंगलवार को हर कांग्रेसी पूछ रहा था- 'यह काम पहले दिन क्यों नहीं हुआ।' चिदंबरम का यह बयान भी छठे दिन आया- 'करकरे को लेकर उठाए गए सवाल गलत और दुर्भाग्यपूर्ण। करकरे की हत्या की कोई साजिश नहीं था। साजिश की थ्योरी में कोई सच्चाई नहीं।' सरकार को बयान देने में छह दिन लगे। छह दिन तक केंद्र सरकार का मंत्री देश में भ्रम फैलाता रहा। जवाब भी आया। तो करकरे की मौत के हालात पर सफाई देने वाला। पर जैसा लालकृष्ण आडवाणी ने कहा- 'सवाल उन हालात का नहीं। सवाल ए.आर. अंतुले के उठाए सवालों का।' किसी ऐरे-गैरे, नत्थू खैरे ने सवाल नहीं उठाए। केबिनेट मंत्री ने उठाए थे। सरकार की सफाई से मामला खत्म नहीं होता। मामला तो खत्म होगा अंतुले के इस्तीफे से। जो अब भी ताल ठोक कर कह रहे हैं- 'नहीं दूंगा इस्तीफा। जांच की मांग कर के कोई गलती नहीं की। आडवाणी मेरे पैरों में पड़ें, तब इस्तीफा दूंगा।' सरकार ने अपने मंत्री की आशंकाएं खारिज कर दी। साजिश की थ्यौरी पर अफसोस भी जताया। पर अंतुले कहते हैं- 'किस बात की माफी मांगू। मैंने तो किसी साजिश की बात नहीं की। सिर्फ आशंका जाहिर की थी।' फिर वह होम मिनिस्टर के बयान से संतुष्ट हो गए। उनने देश की जगहसाई करवाने से पहले ही होम मिनिस्टर से जाकर क्यों नहीं पूछा। क्यों नहीं केबिनेट में सवाल उठा लिया। अंदर की बात, अंदर रहती। पाकिस्तान को तो मौका न मिलता। और यह कैसी सरकार है? जो अपने मंत्री के बयानों पर शर्मसार नहीं।

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