लेफ्ट ने खोला करार का पहला दरवाजा

बहुत शोर सुनते थे पहलू में। जो चीरा तो कतरा-ए-खूं न निकला। लेफ्ट ने आईएईए से बात की हरी झंडी दी। तो अपन को गालिब याद आ गए। गालिब ने यह शे'र लेफ्ट पार्टियों के लिए तो नहीं लिखा। पर लेफ्टियों पर लागू जरूर। डेढ़ साल पहले एटमी करार पर साझा बयान जारी हुआ। तब से हल्ला कर रहे थे। वन-टू-थ्री का ड्राफ्ट जारी हुआ। तब से तो एक ही रट थी- 'करार ऑप्रेशनालाइजेशन नहीं किया जाए।' जब कपिल सिब्बल ने कहा- 'आईएईए से बात करार का ऑप्रेशनालाइजेशन नहीं।' तो लेफ्ट के चारों नेताओं ने आठ अक्टूबर को बयान जारी करके कहा- 'आईएईए से कोई बात न हो।' पर जब ग्यारह अक्टूबर को अल बरदई ने डेढ़ घंटा मनमोहन से गुफ्तगू की। अपन ने उस दिन लिखा- 'डेढ़ घंटा सिर्फ खाना तो नहीं खाया होगा। या सोफे पर बैठ भारत-आस्टे्रलिया मैच तो नहीं देख रहे होंगे। जरूर रिएक्टरों की निगरानी पर बतियाए होंगे।' अपन ने तभी लिखा था- 'अल बरदई ने बजरिया रूस लेफ्ट को मनाने का मंत्र दिया।' ग्यारह-बारह नवंबर को उधर मनमोहन मास्को में थे। इधर लेफ्ट ने करार पर तेवर ढीले कर लिए। अपन ने चौदह नवंबर को लिखा- 'अब सोलह की टली हुई मीटिंग होगी। मीटिंग में लेफ्ट कहेगा- जाइए, आईएईए से बात करिए। पर दस्तखत नहीं करना। पहले आकर हमें ड्राफ्ट दिखाना।' वही हुआ। शुक्रवार को सोलह नवंबर था। लेफ्ट-यूपीए मीटिंग हुई। बयान जारी हुआ- 'कमेटी ने वन-टू-थ्री पर हाईड एक्ट के प्रभाव पर विचार किया। हाईड एक्ट के सुरक्षा मामलों और विदेश नीति पर असर की बात भी हुई। तय हुआ- हाईड एक्ट और वन-टू-थ्री समझौतों का आईएईए सेफगार्ड पर क्या असर होगा। उसे भी जांच लिया जाए। इसके लिए आईएईए से बात की जरूरत पड़ेगी। सो सरकार आईएईए से बातचीत करे। फिर उसका नतीजा कमेटी के सामने रखे।' हुआ न वही। इतनी अक्ल तब क्यों नहीं आई। जब बार-बार आईएईए से बात न करने की धमकियां दी गई। अब जो बरदई ने ग्यारह अक्टूबर को दिल्ली में कहा। जरा उसे भी याद करा दें। उनने कहा था- 'रिएक्टरों का सेप्रेशन प्लान तैयार। रिएक्टर निगरानी का प्लान भी तैयार।' अब अपन आईएईए का तौर-तरीका बता दें। आईएईए उस ईंधन के रजिस्टर की निगरानी करेगा। जो एटमी बिजली के लिए अमेरिका-फ्रांस या रूस से आएगा। एक कतरा भी इधर-उधर नहीं होने देगा। आईएईए का एक दफ्तर बाकायदा भारत में खुलेगा। आईएईए इंस्पेक्टरों की शक्ल में अमेरिकी जासूस घुसेंगे। उनकी नजर अपने बिजली रिएक्टरों पर नहीं। अलबत्ता अपने एटमी हथियारों वाले रिएक्टरों पर होगी। अपन सेप्रेशन तो पहले ही कर चुके। अपने रिएक्टर कहां-कहां। इसकी निशानदेही अब अमेरिका के पास। अपन को भूलना नहीं चाहिए। अमेरिका का ईरान के साथ क्या रवैया। ईरान ने सीटीबीटी पर दस्तखत कर गलती की। इसी से बजरिया आईएईए अमेरिकी जासूस ईरान में घुसे। ईरान अब कुछ भी करे। अमेरिका को पल भर में खबर। अमेरिका आज तक नहीं भूला। जब वाजपेयी ने पोखरन कर डाला। तो अमेरिका को भनक तक नहीं लगी। तब से अमेरिका की नजर अपने एटमी ठिकानों पर। जसवंत-टालबोट में कई दौर की बात हुई। पर वाजपेयी ने न सिटीबीटी-एनपीटी पर दस्तखत किए। न ऐसा एटमी करार होने दिया। जिससे अमेरिका एटमी ठिकानों तक घुस सके। इसलिए जब वन-टू-थ्री का ड्राफ्ट जारी हुआ। तो अपन ने चार अगस्त को लिखा- 'अपनी सुरक्षा और ऊर्जा अमेरिका की मोहताज।' जब तक मनमोहन रूस नहीं गए थे। तब तक लेफ्ट का भी यही नजरिया था। यों तो अब भी लेफ्ट का यही कहना- 'करार नहीं होने देंगे।' पर अपनी नजर में यह रस्सी जल जाना, बल नहीं जाना ही। करार का पहला दरवाजा खुल गया। दूसरा एनएसजी बात से खुलेगा।

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