एटमी करार पर लेफ्ट की हरी झंडी वाया रूस

अपन ने बारह अक्टूबर को लिखा- 'तो रूस से एटमी करार तोड़ेगा लेफ्ट से गतिरोध।' आखिर एक महीने बाद वह ब्रेकिंग न्यूज साबित हुई। न उससे पहले किसी ने लिखा। न बाद में। पहली नजर में दिखता होगा। एटमी करार पर लेफ्ट के तेवर नंदीग्राम ने बदले। अपने यशवंत सिन्हा का अंदाज भी यही। पर नंदीग्राम का असर कम। चीन-रूस का ज्यादा। लेफ्टिए बीजेपी को अमेरिकापरस्त कहते-कहते थक गए। पर अमेरिका ने सारा जोर लगा लिया। आडवाणी नहीं झुके। पर देखा चीन-रूस का असर। सोनिया-प्रणव का चीन दौरा रंग लाया। तो पीएम का रूस दौरा। पुतिन ने जब बजरिया मनमोहन लेफ्टियों से कहा- 'कूडांकुलम में चार एटमी रिएक्टरों का करार तब होगा। जब भारत आईएईए से सेफगार्ड का समझौता करे।' रातोंरात लेफ्ट के तेवर ढीले पड़ गए। उधर पुतिन-मनमोहन गुफ्तगू शुरू हुई। इधर प्रणव दा लेफ्ट को ब्रीफ करते। पीएम इतवार को रूस गए। तो उसी रात प्रणव दा के घर येचुरी बुलाए गए। सोम को पीएम की पुतिन से गुफ्तगू हो रही थी। तो  प्रणव दा की बगल में प्रकाश करात बैठे थे। इसे कहते हैं चुंबकीय असर। यों तो सोमवार को रूस का असर दिखने लगा। पर मंगलवार को करीब-करीब पक्का हो गया। अब सोलह की टली हुई मीटिंग होगी। मीटिंग में लेफ्ट कहेगा- 'जाइए, आईएईए से बात करिए। पर दस्तखत नहीं करना। पहले आकर हमें ड्राफ्ट दिखाना। कमेटी में फिर गुफ्तगू-गुफ्तगू का नाटक खेलेंगे। तब दस्तखत की इजाजत देंगे।' मनमोहन-प्रणव पिछली दो मीटिंगों में हाथ जोड़ते थक गए। करात-वर्धन ने इजाजत नहीं दी। चीन-रूस का दौरा पहले ही कर लेते। तो मिन्नतों की जरूरत ही नहीं पड़ती। विदेश नीति तो छोड़िए। पुतिन ने अपनी अंदरूनी राजनीति भी ठिकाने लगा दी। लेफ्टिए कहते थे- 'एटमी करार से विदेश नीति प्रभावित होगी।' पर अब कूटनीति और राजनीति दोनों में विदेशी दखल। पर लेफ्ट झुके या बीजेपी। अपनी राय जस की तस। जो अपन ने वन-टू-थ्री ड्राफ्ट जारी होने पर कही। याद करिए, चार अगस्त का अपना कहा। अपन ने कहा था- 'अपनी सुरक्षा और ऊर्जा अमेरिका की मोहताज।' हाईड एक्ट के चलते करार पर अपनी राय आज भी वही। करार भारत के नहीं, अमेरिका के हित में। इसीलिए अमेरिका ने बीजेपी को पटाने की लाख कोशिश की। पहले अपन को लगता था- 'रूस से एटमी करार होगा। तो लेफ्ट के तेवर बदलेंगे।' इसलिए अपन ने बारह अक्टूबर को लिखा- 'तो रूस से एटमी करार तोड़ेगा लेफ्ट से गतिरोध।' अपन याद करा दें- बजरिया रूस आईएईए से गुफ्तगू की अक्ल अल बरदई ने दी। कूडांकुलम रिएक्टर करार होता। तो भी लेफ्ट झुकता। पुतिन ने करार न करके भी लेफ्ट को झुका दिया। अल बरदई की दी हुई रणनीति कामयाब रही। खरबूजा छुरी पर गिरता। तो भी खरबूजा कटता। छुरी खरबूजे पर गिरी। तब भी खरबूजा ही कटा। बजरिया रूस-चीन अपने लेफ्टिए खरबूजा बनकर रह गए। वैसे अपन यशवंत सिन्हा की मानें। तो दो तरफा रणनीति ने काम किया। इधर नंदीग्राम पर बजरिया गवर्नर तेवर दिखाए। उधर एटमी करार पर बजरिया पुतिन दबाव बनाया। अपन को विदेश मंत्रालय के हवाले से पता चला- 'भारत चाहता है-पहले आईएईए के सेफगार्ड तय हो जाएं। एनएसजी एटमी व्यापार के दिशा-निर्देश बदल दे। तब रूस से एटमी करार हो। उससे पहले रूस से करार सिर्फ कागजी होता।' मनमोहन की पुतिन से दो घंटे बंद कमरे में गुफ्तगू हुई। उस गुफ्तगू के तार प्रणव दा के घर से जुड़े थे, या नहीं। अपन नहीं जानते। पर जब मनमोहन रूस में थे। तभी प्रणव-करात की बंद कमरे में गुफ्तगू हुई। तभी बंद कमरे में प्रणव-येचुरी गुफ्तगू हुई। बरसात मास्को में हुई। लेफ्टियों ने छाता दिल्ली में तान लिया।

याने अपने कामरेडों के लिये

याने अपने कामरेडों के लिये रूस और चीन का हित पहले आता है और भारत का बाद में? पर इसमे नया क्या है? ये तो अंग्रेजो के जमाने से यही करते आ रहे हैं!!!

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