टिकटों की बिक्री लोकतंत्र के लिए खतरा

चुनाव आयोग को चाहिए कि टिकटों की बिक्री के आरोपों की सीबीआई से जांच करवाए। आरोप सही पाए जाने पर राजनीतिक दल की मान्यता खत्म होनी चाहिए।

परिवारवाद न तो कांग्रेस में कोई अजूबा है और न ही अन्य राजनीतिक दलों में कोई नई बात। जिस तरह वकील का बेटा बड़ा होकर वकील बनने की सोचता है और डाक्टर का बेटा डाक्टर बनने की सोचता है उसी तरह सांसदों, विधायकों के बेटे भी अपने परिवेश में राजनीति की शिक्षा-दीक्षा हासिल करते हैं, इसलिए वे भी वैसा ही सोचते हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी या उनकी मां सोनिया गांधी कतई राजनीति में नहीं होते अगर राजीव गांधी राजनीति में न होते। इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को राजनीति के लिए तैयार किया था, लेकिन जब उनकी आकस्मिक मौत हो गई तो इंदिरा गांधी ने अपनी राजनीतिक विरासत किसी अन्य कांग्रेसी नेता को सौंपने का सोचा भी नहीं। उन्होंने राजनीति से दूर रहने वाले अपने बड़े बेटे राजीव को जबरदस्ती राजनीति में घसीटा था। इसलिए अगर मारग्रेट अल्वा ने अपने बेटे निवेदित के लिए कर्नाटक विधानसभा का टिकट मांगा तो कोई गलत काम नहीं किया था। आखिर वह भी अपने सास-ससुर की राजनीतिक वारिस बनकर राजनीति में हैं। मारग्रेट अल्वा की सास वायोलेट अल्वा कांग्रेस की सांसद थी। मारग्रेट के ससुर जोएकिम भी कांग्रेस के सांसद थे। जिन पृथ्वीराज चौहान और दिग्विजय सिंह ने मारग्रेट अल्वा के बेटे का टिकट कटवाने के लिए 'एक परिवार एक टिकट' का सिध्दांत बनवाया था उनका अपना रिकार्ड भी देखने लायक है। दिग्विजय सिंह जब खुद मुख्यमंत्री बन गए तो उन्होंने अपनी लोकसभा सीट कांग्रेस के किसी कार्यकर्ता को सौंपने की बजाए अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह को टिकट दिलाया था, जो अब भाजपा में हैं। पृथ्वीराज चव्हाण भी अपने पिता और मां की बदौलत ही राजनीति में हैं। पृथ्वीराज की मां प्रेमल ताई महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष और सांसद थी। पृथ्वीराज के पिता आनंद राव चव्हाण कांग्रेस के सांसद के साथ-साथ केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे हैं। राहुल गांधी ने यह गलत नहीं कहा है कि नए लोगों का राजनीति में आना और टिकट पाना आसान नहीं होता। राजनीति में आकर कार्यकर्ता बनना तो बहुत आसान है। राजनेताओं को मुफ्त के काम करने वाले चाहिए होते हैं, लेकिन राजनीति में आकर टिकट हासिल करना आसान नहीं होता। राघोगढ़ इसका उदाहरण है, जहां दिग्विजय सिंह ने अपनी सीट अपने भाई को ही थमाई थी।

राजस्थान में दस, मध्यप्रदेश में आठ, छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओं के नौ बेटे-बेटियां चुनाव मैदान में हैं। इसलिए मारग्रेट अल्वा का यह सवाल उठाना स्वाभाविक है। सवाल यह भी है कि मारग्रेट अल्वा के बेटे को टिकट नहीं देने का कारण क्या था। क्या उस सीट पर ज्यादा पैसा लगाने वाला उम्मीदवार आ गया था। क्या वह टिकटार्थी स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष को रिश्वत देकर टिकट हासिल कर पाया। क्या मोटी रकम को देखकर एक परिवार- एक टिकट का सिध्दांत बनाया गया था। क्या वह पैसा सिर्फ स्क्रीनिंक कमेटी के अध्यक्ष और प्रदेश के प्रभारी महासचिव ही खा गए या कांग्रेस पार्टी के फंड में भी पैसा पहुंचा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जिस तरह मारग्रेट अल्वा के आरोप को पहले छह महीने तक दबाए रखा और जब वह राजस्थान में टिकट बिकने की खबर आने पर फूट पड़ी तो उन्हें निकाल बाहर किया गया। कांग्रेस पाटी की महासचिव के आरोप को बिना जांच के खारिज करके उनके खिलाफ अभियान चलाकर बाहर निकाल देना कई तरह के शक पैदा करता है।

अगर चुनाव आयोग लालच से वोट हासिल करने पर कार्रवाई करता है, अगर वोटर को पांच-पांच सौ के नोट देने पर कांग्रेस के उम्मीदवार महेंद्र कर्मा के खिलाफ चुनाव आयोग केस दर्ज करता है, तो क्या चुनाव आयोग का यह फर्ज नहीं बनता कि वह टिकट बांटने वाले राजनीतिक दलों पर भी निगरानी रखे। राजनीतिक दल देश में भ्रष्टाचार के सबसे बड़े गिरोह बन गए हैं। सीबीआई ने हाल ही में अखबारों में विज्ञापन देकर भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सुराग देने की गुहार लगाई है, लेकिन भ्रष्टाचार की गंगोत्री तो सीबीआई की आंखों के सामने बह रही है। मारग्रेट अल्वा के बाद योगेन्द्र मकवाना को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, जिन्होंने अल्वा के आरोपों को सही बताते हुए कहा था कि उनके पास राजस्थान से कांग्रेस के टिकट चालीस लाख रुपयों से लेकर डेढ़ करोड़ रुपए तक में बिकने की शिकायत मिली हैं। जालप्पा अभी भी कांग्रेस में हैं, उन्होंने तो यहां तक कहा है कि उनके पास टिकट बिकने के सबूत मौजूद हैं। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह इन जन प्रतिनिधियों के बयानों को आधार बनाकर सीबीआई को जांच का आदेश दे। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने राजनीतिक दलों के नेताओं को पैसा देने वाले हवाला किंग सुरेंद्र कुमार जैन की डायरी के आधार पर सभी राजनीतिक दलों के नेताओं पर जांच की तलवार चला दी थी। यह देश का दुर्भाग्य है कि नरसिंह राव दुबारा प्रधानमंत्री नहीं बने और उनकी हार के बाद सीबीआई ने केस को नकारा बना दिया। शरद यादव ने कबूल किया था कि उन्होंने जैन से पांच लाख रुपया चुनाव फंड के लिए हासिल किया था। यह कैसे हो सकता है कि एक नेता का नाम तो सही हो और बाकियों का गलत हो। नरसिंह राव ने राजनीति को साफ सुथरा करने की कोशिश की थी, इसके तहत उन्होंने अपनों-पराओं में कोई भेद नहीं किया। उन्होंने यह नहीं देखा कि लिस्ट में उन्हीं की सरकार के मंत्रियों बलराम जाखड़, विद्या चरण शुक्ल, कमलनाथ, आरके धवन, अरविंद नेताम, प्रणव मुखर्जी, एआर अंतुले, राजेश पायलट, बूटा सिंह, माधवराव सिंधिया, कृष्णा साही के साथ-साथ कांग्रेस के दिग्गज नेताओं जाफर शरीफ, एनडी तिवारी, नटवर सिंह, जी शिव शंकर, मोती लाल वोरा, अर्जुन सिंह, श्यामा चरण शुक्ल, जगन्नाथ पहाड़िया और चंदूलाल चंद्राकर के साथ-साथ स्वर्गीय राजीव गांधी का नाम भी था।

राजनीति और राजनीतिक दलों में पारदर्शिता के लिए जरूरी है कि उन्हें मिलने वाले चंदे और खर्चों पर निगाह रखने के लिए चुनाव आयोग में स्थाई प्रकोष्ट बनाया जाए। इस प्रकोष्ट को सीबीआई से मदद लेने का संवैधानिक हक होना चाहिए और टिकटों की बिक्री के आरोप लगने पर फौरन जांच के आदेश दिए जाएं। टिकटों की बिक्री करने वाले राजनीतिक दलों पर शिकंजा कसा जाना चाहिए और आरोप सही पाए जाने पर राजनीतिक दल की मान्यता खत्म होनी चाहिए। राजनीतिक दल अगर टिकट बेचने का धंधा करने लगेंगे तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। टिकट खरीद कर लोकसभा और विधानसभाओं में पहुंचने वाले सांसद-विधायक हर तरीके से पैसा कमाने के रास्ते निकालेंगे।  जब तक टिकटों की बिक्री पर निगरानी का कानूनी ढांचा तैयार नहीं होता तब तक राजनीतिक दलों को इस तरह के आरोपों की जांच करवानी चाहिए। मारग्रेट अल्वा को पार्टी के पदों से हटाकर उनकी जुबान बंद की जा सकती है लेकिन आवाम की आशंकाएं खत्म नहीं की जा सकती। अलबत्ता अनुशासन के नाम पर मारग्रेट अल्वा के खिलाफ कार्रवाई से खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कटघरे में खड़ी हो गई हैं क्योंकि ऐसा करके उन्होंने पार्टी के भ्रष्ट नेताओं को बचाने का प्रयास किया है। कांग्रेस पार्टी राजनीतिक दल के नाते कटघरे में है क्योंकि हवाला कांड से लेकर बोफोर्स घोटाले तक, यूरिया घोटाले से लेकर तेल के बदले अनाज घोटाले तक, झामुमो सांसदों की खरीद-फरोख्त से नरसिंह राव की सरकार बचाने से लेकर हाल ही में सांसदों को खरीदकर मनमोहन सिंह की सरकार बचाने तक अनेक ऐसे सबूत सामने आ चुके हैं जिनसे साबित होता है कि कांग्रेस के लिए सत्ता और राजनीति अब सेवा का माध्यम नहीं अलबत्ता धंधा बन गया है।

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