मारग्रेट को फटकारने पुचकारने की रणनीति

मारग्रेट अल्वा की बिसात क्या बिछी। अपने अहमद पटेल पस्त हो गए। चार दिन बीत गए। सोनिया फैसला करने की हालत में नहीं पहुंची। वीरप्पा मोइली सुबह गरम तो शाम को नरम। न उगला जाए, न निगला। प्रवक्ताओं के मुंह में तो जुबान ही नहीं। कांग्रेस महासचिव कोई छोटा-मोटा पद नहीं। याद करो, हू-ब-हू ऐसी हालत बीजेपी में हुई थी। बात दस नवम्बर 2004 की। तो बीजेपी ने कितनी फुर्ती दिखाई थी। जैसे मारग्रेट अब दिग्गी राजा-पृथ्वीराज चव्हाण के खिलाफ भड़की। वैसे उमा भारती तब जेटली-वेंकैया-महाजन-नकवी के खिलाफ भड़की थी। मारग्रेट की तरह उमा भी पार्टी की महासचिव थी। उमा ने मीटिंग से वाकआउट किया। दो मिनट बाद ही जेटली ने उमा के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव रख दिया। उमा को पार्टी से निकाल दिया गया। वीरप्पा मोइली बोले- 'मारग्रेट अल्वा ने टिकटों की बिक्री का खुलेआम आरोप लगाकर अनुशासनहीनता की। पर कार्रवाई का फैसला सोनिया के हाथ में।' कांग्रेस की हालत का अंदाज लगाइए। जब तक सोनिया गांधी इशारा न करें। कोई कार्रवाई की मांग करने की हिम्मत नहीं कर सकता। अनुशासन समिति के चेयरमैन एंटनी भी लाचार। कुछ बोलने की हालत में नहीं। मारग्रेट अल्वा ने एंटनी से मिलकर आरोप दोहरा दिए। सोनिया से मिलकर इस्तीफा दे दिया। प्रवक्ताओं की बात तो छोड़िए। प्रवक्ताओं के मुखिया वीरप्पा मोइली तक कुछ कहने की हालत में नहीं। बोले- 'मैं पुष्टि भी नहीं कर सकता। खंडन भी नहीं कर सकता।' सोनिया से मुलाकात हुई या नहीं। इस पर भी सबकी जुबान पर ताला। कांग्रेस में दहशत का माहौल। एंटनी दस जनपथ में घुसे। सोनिया से मिलकर लौटे, तो जुबान पर ताला। मारग्रेट अपने घर में चुप्पी साधकर बैठी रहीं। पर बाहर से दिखने वाली खामोशी कितना तूफान लाएगी। इसका अंदाज दस जनपथ को भी नहीं। पी. शिवशंकर की तो जैसे बांछें खिल गई। कभी सोनिया गांधी के करीब हुआ करते थे। पर चौकड़ी ने निकाल बाहर किया। तो अब कांग्रेस से भी बाहर। वह पहले शख्स निकले। जिनने मारग्रेट से मुलाकात कर खिचड़ी पकाई। अपन ने आठ नवम्बर को इशारा किया था- 'वह जाफर शरीफ, नारायण राणे, सिध्दा रमैया के संपर्क में।' नारायण राणे तो मंगलवार को फूट पड़े। बोले- 'मनमोहन सिंह पहले महंगाई को लेकर फिक्रमंद थे। पर अब जरा फिक्रमंद नहीं। ऐसी हालत में कांग्रेस का लोकसभा चुनावों में बाजा बजेगा।' सिध्दारमैया ने सोमवार को कहा- 'मारग्रेट अल्वा कांग्रेस की सीनियर लीडर। वह कांग्रेस के बारे में बेहतर जानती हैं। उसकी कोई बात खारिज नहीं की जा सकती। कांग्रेस को गंभीरता से सोचना चाहिए।' अपन ने कर्नाटक के कांग्रेसी एमपी जलप्पा का इशारा नहीं किया। पर सोमवार को वह भी मारग्रेट की भाषा बोले। कहा- 'मुझे पता है, उन्होंने टिकटों के बदले में अच्छी-खासी रकम बटोरी। अगर हाईकमान मेरे से पूछेगा। तो मैं सबूत देने को तैयार हूं।' बात सबूत की चली। तो बता दें- मारग्रेट अल्वा के पास भी सबूतों की कमी नहीं। कमी तो कांग्रेस सचिव योगेन्द्र मकवाना के पास भी नहीं। उनने तो कांग्रेस के दफ्तर में बैठकर ही बगावत शुरू कर दी। सोमवार को उनने राजस्थान में टिकटें बिकने का आरोप लगाया। तो मंगलवार को बोले- 'अब हम पंद्रह नवम्बर को दिल्ली में मीटिंग करेंगे। जाफर शरीफ भी आएंगे। छह राज्यों के दलित जुड़ेंगे। उसी दिन राष्ट्रीय बहुजन कांग्रेस बनेगी।' बात जाफर शरीफ की चली। तो बता दें- मंगलवार को उनने मारग्रेट से दूरी बनाई। कहा- 'मेरे पोते को टिकट नहीं दिया। नाराज मैं भी था। पर अब यह पुरानी बात हो गई।' यह दस जनपथ की पुचकारने की नीति का नतीजा। पुचकारा सिध्दारमैया और जलप्पा को भी गया। सो मंगलवार को वह भी खिसियाने लगे। मारग्रेट की अरुण जेटली से संपर्क की खबर से कांग्रेस दहशत में। पर उससे ज्यादा मायावती से संपर्क की दहशत।

सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि

सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि मार्गरेट अल्वा ईसाई भी हैं, ऐसे में भला कौन सा कांग्रेसी उनके खिलाफ़ बोले्गा? सोनिया गाँधी से पूछे बिना तो कांग्रेसी सुबह को दिशा-मैदान तक नहीं जाते, इतनी बड़ी बात पर तो "हाईकमान" को ही फ़ैसला लेना होगा ना…

सुरेश भाई से पूर्णतया सहमत

सुरेश भाई से पूर्णतया सहमत ....इनकी जगह कोई दूसरा कोई होता तो अब तक बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता ....

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