कैबिनेट में आतंकवाद नही, छठ की 'राज' नीति हावी

यूपीए सरकार 'हिंदू आतंकवाद' में फंस गई। अब 'अभिनव भारत' को आतंकवादी साबित करने की तैयारी। अपन अभिनव भारत का इतिहास बताते जाएं। वीर सावरकर ने 1893 में बनाया था 'अभिनव भारत'। 'अभिनव भारत' की आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका रही। जैसे आजादी के आंदोलन में कांग्रेस की। महात्मा गांधी चाहकर भी कांग्रेस भंग नहीं कर सके। पर वीर सावरकर ने 1952 में 'अभिनव भारत' भंग कर दी थी। मौजूदा यूपीए राज में आतंकवादियों का तुष्टिकरण शुरू हुआ। आतंकवाद की वारदातें बढ़ने लगी। तो 'अभिनव भारत' को दुबारा खड़ा किया गया 2006 में।<-- more --> वीर सावरकर के भाई बालाराव की पुत्रवधू हिमानी सावरकर ने बीडा उठाया। बताते जाएं- हिमानी नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे की बेटी। हिमानी की कोशिशों से 'अभिनव भारत' का दुबारा गठन हुआ। उद्देश्य रखा- हिंदू विरोधी आतंकवाद का मुकाबला। हिमानी कहती हैं- 'अभिनव भारत का मालेगांव विस्फोट से कोई लेना-देना नहीं। पर कुलकर्णी और उपाध्याय को कानूनी मदद दी जाएगी। दोनों अभिनव भारत के मेंबर। हो सकता है दोनों ने देशभर में हो रहे विस्फोटों से तंग आकर कदम उठाया हो।' हू-ब-हू वही बात जो अपन ने 28 अक्टूबर को लिखी थी- 'क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या रिटायर्ड फौजी भी आतंकवाद के तुष्टिकरण की नीति से खफा।' हिमानी सावरकर के कहने का लब्बोलुबाब भी यही। यों तो फिलहाल यह पुलिस की ही थ्योरी। अपन को पुलिस की यह थ्योरी पूरी तरह पिटने का भरोसा। जैसे अपन को कभी भी राजेश तलवार हत्यारा नहीं लगा। पर पुलिस तलवार को बेटी का हत्यारा बताने की थ्योरी पेलती रही। जो कोर्ट में नहीं टिकी। खैर अब तो पुलिस ने सबका नार्को टेस्ट भी करवा लिया। दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। यों तलवार वाले मामले में टेस्ट के बाद भी पुलिस चंडूखाने की पेलती रही। हिंदुओं को आतंकी साबित करने में कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ रही। अब तो कांग्रेसी पुलिस 'अभिनव भारत' में बांग्लादेशी घुसपैठियों की थ्योरी भी पेलने लगी। मकसद एक ही- बीजेपी से चुनाव में आतंकवाद का मुद्दा छीनना। अलबत्ता बीजेपी को कटघरे में खड़ा करना। वोट बैंक की राजनीति यूपीए पर आतंकवाद से ज्यादा हावी हो गई। इसका उदाहरण अपन को गुरुवार रात की कैबिनेट मीटिंग में दिखा। गुरुवार को असम में तेरह जगह बम फटे। पचहत्तर से ज्यादा लोग मारे गए। पर कैबिनेट की मीटिंग में असम पर बात कम हुई। राज ठाकरे पर ज्यादा। यूपीए के दो मंत्रियों लालू-पासवान को बिहार का वोट बैंक सताने लगा। दोनों को लगने लगा- 'राज ठाकरे के खिलाफ जितना बोलेंगे। चुनाव में उतना फायदा होगा।' कांग्रेस को क्या चाहिए था। असम की आतंकवादी वारदात पर शिवराज पाटिल घिरते। कम से कम पाटिल की तो जान बची। विलासराव पर नजला उतरा, तो कोई बात नहीं। लालू-पासवान को बिहार में बीजेपी-जद से खतरा। इस खतरे से बचने की राम बाण औषधि मिल गई- राज ठाकरे। मुलायम-अमर को यूपी में मायावती के हाथों पिटने का खतरा। सो मुलायम-अमर को भी इस खतरे से बचने की औषधि मिल गई- राज ठाकरे। सबने एक ही राग अलाप दिया- 'राज ठाकरे को रासुका में गिरफ्तार किया जाए।' वह भी चार नवंबर से पहले। यानि बिहार के त्योहार छठ से पहले। आपको याद होगा- लालू ने मुंबई में छठ मनाने की ताल ठोंकी थी। सो जैसे तमिलों के मुद्दे पर करुणानिधि ने केंद्र को झुकाया। वैसे ही लालू-पासवान ने ताल ठोक दी। अब मनमोहन ने विलासराव को समझाया- 'राज ठाकरे से छठ पर युध्द विराम करवाओ।' राज ठाकरे की प्रेस कांफ्रेंस हो गई। सशर्त युध्द विराम हो गया। लालू-पासवान छठ की राजनीति न करें। छठ को त्योहार रहने दें। तो राज ठाकरे को ऐतराज नहीं। पर गंभीर बात दूसरी। कैबिनेट का वोट बैंक के लिए लालू ने दूसरी बार दुरुपयोग किया। पहले गोधरा कांड पर बनर्जी जांच कमेटी बनवाई। जिसकी रपट पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई।

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