अब हम गाली खा ही रहे हैं, तो सबकी खाएंगे

अपन ने कल जानबूझ कर स्पीकर पर नहीं लिखा। दादा का गुस्सा सातवें आसमान पर। कहीं अपन पर ही न फूट पड़ें। आखिर दो साल पहले सुभाष कश्यप पर फूटा ही था। जरा वह किस्सा याद दिला दें। दादा और ममता की सदन में खटपट हुई। सुभाष कश्यप ने एक चैनल पर सिर्फ इतना कहा था- 'दादा अपने जीवन में एक बार ही हारे। वह भी ममता बनर्जी से। सो वह टीस तो रहेगी ही।' दादा इस पर भड़क गए। सुभाष कश्यप लोकसभा के महासचिव थे। सो अपनी क्या बिसात। दादा जब गुस्से में हों। तो बचना ही चाहिए। यों तो दादा का गुस्सा कई बार फूटा। बार-बार फूटा। पर अपन नौ मार्च 2005 का किस्सा याद कराएं। तब सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के गवर्नर की खाट खड़ी की थी। सिब्ते रजी ने शिबू सोरेन को सीएम की शपथ दिला दी थी। बहुमत था नहीं। सिब्ते रजी ने खरीद-फरोख्त का अच्छा खासा मौका दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट गया। तो कोर्ट ने जल्द सदन बुलाने की हिदायत दी। बहुमत साबित करने की मोहलत घटा दी। दादा भड़क गए थे। दादा को गुस्सा क्यों आया। अपन को अब तक समझ नहीं आया। उनने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर दिया। आल पार्टी मीटिंग बुला ली। स्पीकरों की मीटिंग का ऐलान कर दिया। सरकार से कहा- 'कोर्ट के फैसले पर राष्ट्रपति से रेफ्रेंस कराया जाए।' पर फजीहत करा चुकी सरकार ने चुप्पी साध ली। दादा ने फिर भी हार नहीं मानी। सांसदों के फोटो सेशन से निकलते वक्त अपन ने दादा से पूछा- 'क्या अब स्पीकर मीटिंग नहीं होगी?' तो भड़कते हुए सोमनाथ बोले थे- 'मैं जुझारू व्यक्ति हूं। कठपुतली स्पीकर नहीं। जो चुप करके बैठ जाऊं।' स्पीकर ने सचमुच मीटिंग बुलाई। बीजेपी के छह स्पीकर मीटिंग में आए जरूर। पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही बताया। दादा को बीजेपी शासित राज्यों के स्पीकरों ने याद दिलाया- स्पीकरों की 1994 की मीटिंग का फैसला। फैसला था- 'सुप्रीम कोर्ट वाच डाग की भूमिका निभाएगा।' इसके बाद दादा आगे नहीं बढ़े। पर सदन में उनका गुस्सा बढ़ता चला गया। पिछले साढे तीन साल का रिकार्ड इस बात का गवाह। सांसदों के खिलाफ तीखी-तीखी टिप्पणियां की। विपक्ष के साथ एक नहीं, अनेक बार टकराव हुआ। ऐसा टकराव, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। स्पीकर का बायकाट भी हुआ। एक बार अविश्वास प्रस्ताव की नौबत भी आई।  पर दादा का सबसे बड़ा टकराव तो अब अपनी ही पार्टी से। दादा यूपीए-लेफ्ट एग्रीमेंट में स्पीकर बने थे। एटमी करार पर यह एग्रीमेंट टूट गया। तो लेफ्ट ने दादा को इस्तीफे की हिदायत दी। दादा इस्तीफे की धमकी देते रहते थे। पर जब सीपीएम ने कहा। तो उनने इस्तीफे से इंकार कर दिया। टकराव इतना बढ़ा। सीपीएम ने दादा को पार्टी से निकाल बाहर किया। अब लेफ्ट को दादा फूटी आंख नहीं सुहा रहे। दादा को लेफ्ट फूटी आंख नहीं सुहाता। इसी रंजिश में बुधवार को दादा लेफ्ट के अब्दुल्ला कुट्टी पर भड़क गए। सदन से बाहर निकाल दिया। भड़के हुए लेफ्ट ने वाकआउट कर दिया। तो गुरुवार को दादा बोले- 'मुझे अब किसी चीज की इच्छा नहीं। यह मेरे जीवन का सबसे खराब वक्त है। मैं चालीस साल इस सदन में रहा। बहुत पीड़ा और व्यथा से इस सदन से जा रहा हूं।' उस वक्त तो लेफ्ट के सांसद चुप रह गए। पर थोड़ी देर बाद ही गुरुदास दासगुप्त ने सरकार पर संसद की अनदेखी का आरोप लगाया। कहा- 'सालभर में अब तक सिर्फ 34 दिन बैठक हुई।' तो थोड़ा कटाक्ष दादा की काबिलियत पर भी था। जो कोई भी सत्र सलीके से नहीं चला पाए। ऐसा नहीं, जो दादा इशारा न समझे हों। सो गुस्सा कांग्रेस के एसपी गोयल पर निकला। गोयल को फटकारते हुए बोले- 'मैं आप पर कार्रवाई करूंगा। हम जब गाली खा ही रहे हैं। तो सबकी गाली खाएंगे।' पर लाख टके का सवाल। क्या उनने इस्तीफे का मन बना लिया। अपन को लोकसभा टीवी पर इंटरव्यू से भी यही इशारा लगा।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट