मुशर्रफ-बुश-बेनजीर खिचड़ी कितने दिन?

पाक में अपना एक यार है अब्दुल कय्यूम। मुशर्रफ ने इमरजेंसी लगाई। तो अपन ने अल्ला बख्श का शे'र  एसएमएस किया- 'पाकिस्तान दियां मौजां ही मौजां, जिधर देखो फौजां ही फौजां।' दो दिन जवाब नहीं आया। तो अपना माथा ठनका। एसएमएस ने कय्यूम को मुसीबत में तो नहीं डाल दिया। पर नहीं, सोमवार को जवाब आया। तो अपन को दोस्त का दर्द महसूस हुआ। अब्दुल कय्यूम का जवाब है- 'तंज (फब्ती) कर रहे हैं आप भी। प्रतिद्वंदी मेरे देश की यह हालत देख खुश हैं। क्या आप भी?' महसूस हुआ, जैसे अपन ने जख्म कुरेद दिए। अपन ने इमरजेंसी का स्वाद सिर्फ एक बार चखा। पर पाक तो यह कड़वा घूट सात बार पी चुका। पहली बार अय्यूब खां ने सिकंदर मिर्जा का तख्ता पलटा। लाहौर के अल्ला बख्श ने तभी अपनी लंबी नज्म  में यह शे'र लिखा था। पर बात सिकंदर मिर्जा की। जो बटवारे से पहले भारत के फाइनेंस सेक्रेटरी थे। राष्ट्रपति बन पाक का संविधान पहली बार उनने रद्द किया। फिर फौजी शासक अय्यूब खां ने भी वही किया। दूसरे फौजी शासक याहियां खां ने भी वही किया। भुट्टो का तख्ता पलट तीसरे फौजी शासक जिया उल हक ने भी वही किया।  मुशर्रफ चौथे फौजी शासक। पहले फौजी शासक मार्शल लॉ लगाते थे। कहने को भले अब इमरजेंसी। पर बकौल अपने पाकिस्तानी खबरनवीस दोस्त हमीद मीर- है मार्शल लॉ ही। मुशर्रफ से परेशान हो पाक छोड़ चुके नजम सेठी की भी यही राय। मुशर्रफ ने जिस आईन के आर्टिकल 232 के तहत इमरजेंसी लगाई। उसी आईन को फौज प्रमुख के नाते रद्द कर दिया। इमरजेंसी लगते ही अपन ने मुशर्रफ की इंदिरा से तुलना की। अपन को हैरानी नहीं हुई। जब कांग्रेस ने पाक का अंदरूनी मामला कहकर टाला। अपनी सरकार ने जरूर चिंता जाहिर की। पर ऐसी चिंता  म्यांमार में नहीं दिखती। जैसे अपनी विदेशनीति म्यांमार में। वैसी अमेरिका की पाक में। कोंडालिसा राइस ने कहा- 'हमने इमरजेंसी लगाने की मुखालफत की थी।' पर कूटनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं। जो होता है, वह दिखता नहीं। कोंडालिसा ने भले ही अब फंडिंग रोकने की बात कही। और कहा- 'मुशर्रफ वर्दी उतारें। लोकतंत्र बहाल करें। वक्त पर चुनाव करवाएं।' रक्षामंत्री रोबर्ट गेट्स ने भी यही दोहराया। पर आप देख लेना। फंडिंग नहीं रुकेगी। अपन को तो बेनजीर भुट्टो की धमकियां भी गीदड़-भभकी लगी। बेनजीर ने भी वही तीन मांगें रखीं। जो कोंडालिसा ने रखी। सो अपन को अब अंदेशा। बुश के इशारे पर मुशर्रफ कहीं बेनजीर को वर्किंग पीएम ही न बना दें। यों सोमवार को मुशर्रफ ने कहा- 'वक्त पर चुनाव होंगे।' पर अपन को शक। मुशर्रफ ने नेशनल और प्रांतीय असेंबलियों की मियाद नहीं बढ़ाई। भंग भी नहीं की। सो मियाद खत्म होते ही असेंबलियों के अपनी मौत मरने की आशंका। पर इस बार विरोध ज्यादा धारदार। सात जजों ने प्रोविजनल कांस्टीटयूशनल आर्डर के तहत दुबारा शपथ नहीं ली। वे सभी अपने-अपने घरों में नजरबंद। उनमें इफ्तिखार चौधरी के साथ अपने राणा भगवान दास भी। नया चीफ जस्टिस अब्दुल हमीद डोगर जज ही नहीं था। सिर्फ बार काउंसिल का मेंबर। पर बार काउंसिल का मुखिया अहमद बख्श जेल में। पर इस बार एक बात नई हुई। पहली बार आईएसआई के पूर्व प्रमुख गुल हमीद गिरफ्तार किए गए। गुल हमीद तालिबान का हमदर्द। अपने यहां अस्सी के दशक में जो खालिस्तान आतंकवाद चला। वह गुल हमीद के दिमाग की उपज थी। बेनजीर ने गुल हमीद पर हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया। बेनजीर-मुशर्रफ-बुश की खिचड़ी का अपन को इसीलिए शक। पर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। सोमवार को दिनभर डिप्टी आर्मी चीफ के एवान-ए-सदर पर कब्जे की अफवाह उड़ी रही। पर बकौल मंत्री तारिक अजीम- 'मुशर्रफ ने सुना तो हंसे।' पर यह हंसी कितने दिन? मुशर्रफ की उलटी गिनती शुरू।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट