घिर गईं सोनिया, चले थे येदुरप्पा-नवीन को घेरने

अपन ने ऐसी सरकारी मीटिंग कभी नहीं सुनी- देखी। जैसे सोमवार को राष्ट्रीय एकता परिषद की हुई। मुख्यमंत्री लिखकर स्पीच लाए थे। उनके एक हाथ में माइक थमा दिया। दूसरे में अपनी कापी लेकर खड़े थे। क्या जरूरत थी, संसद की लाइब्रेरी में मीटिंग की। विज्ञान भवन किसलिए बनाया था। येदुरप्पा बोले- 'मीटिंग हड़बड़ी में हुई दिखी। न प्लानिंग, न एजेंडा।' यों भी एक दिन की मीटिंग में 164 मेंबर कैसे बोलते। साजिश तो खूब रची। नरेंद्र मोदी को भी आखिर में वक्त दिया। येदुरप्पा बोले- 'मुझे तो मीटिंग का मकसद समझ नहीं आया।' मकसद तो साफ था- निशाने पर थे येदुरप्पा और नवीन पटनायक। पर तीनों ने उल्टे केंद्र सरकार को धोकर रख दिया। शुरूआत तो मोदी की हमलावर चिट्ठी से ही हो गई। उनने एजेंडे में आतंकवाद न होने पर एतराज जताया। तो मनमोहन के लगुओं-भगुओं की घिग्गी बंध गई। इतवार की रात हड़बड़ी में जोड़ा- उग्रवाद। तो मोदी को हमले का नया मुद्दा मिला। बोले- 'जो सरकार उग्रवाद और आतंकवाद में फर्क नहीं जानती। वह आतंकवाद से कैसे निपटेगी।' मोदी ने कहा- 'आतंकवाद का मुद्दा नहीं लाना- वोट बैंक की राजनीति।' उनने कहा- 'मानवाधिकार के नाम पर आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं तथाकथित बुध्दिजीवी। अब तय हो जाए- कौन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हमारे साथ। कौन हमारे खिलाफ।' लगते हाथों उनने गुजको का मुद्दा भी उठाया। इसाईयों-मुसलमानों को एससी-एसटी में जोड़ने की मनमोहनी रणनीति पर भी हमलावर हो गए। बोले- 'सरकार ने संविधान की भावना के खिलाफ काम किया। तो राष्ट्रीय एकता तोड़ने वाली बात होगी।' राष्ट्रीय एकता परिषद की मीटिंग में खुद घिर गई सरकार। यों अपन को ऐसी मीटिंग की समझ नहीं आती। जिसमें सब नेताओं के भाषण पार्टी लाइन पर होने हों। येचुरी-वर्धन ने उड़ीसा में 356 की वकालत तो नहीं की। पर सवाल किया- 'केंद्र ने उड़ीसा में दखल क्यों नहीं दिया। संघ परिवार के संगठनों की जांच होनी चाहिए।' बजरंग दल पर बैन की मांग भी उठाई। बजरंग दल पर बैन की बात चली। तो अमरवाणी का जिक्र भी करते जाएं। नए-नए मुल्ला को आखिरी दिन मेंबर बनाया गया। तो वह बोले- 'जामिया मुठभेड़ की ज्यूडिशियल जांच होनी चाहिए। जांच न हुई, तो बीस करोड़ मुसलमान अलग-थलग हो जाएंगे।' जैसा अपन ने पहले बताया। सबको आखिर में मोदी ने धोकर रख दिया। उनने कहा- 'सुरक्षाबलों का हौंसला तोड़ने की गुस्ताखी न करें।' वैसे सरकार को अपने मंसूबों पर झटका तो जोरदार लगा। इरादा था- येदुरप्पा-नवीन पटनायक को घेरने का। पर आखिरी दिन आंध्र प्रदेश की हिंसा में खुद घिर गई कांग्रेस। छह मुसलमान जिंदा जला दिए गए। सो कांग्रेसी सीएम राजशेखर रेड्डी बचाव में आ गए। तो केंद्र के मकसद पर पानी फिर गया। बोले- 'मीडिया सांप्रदायिक घटनाओं को हवा न दे। सारा दिन एक ही खबर दिखा-दिखाकर दंगे भड़का रहे हैं। सारे देश में ज्वाइंट एडवाइजरी कमेटियां बननी चाहिए।' पर धो के तो रखा नवीन पटनायक और बीएस येदुरप्पा ने। पटनायक बोले- 'कंधमाल में कोई सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई। टकराव था- आदिवासी-दलितों में। दोनों में जमीन पर हक, रोजगार और धर्म का टकराव। पर मीडिया ने बात का बतंगड़ बना दिया।' येदुरप्पा तो मोदी जैसे हमलावा हुए। ऑस्कर फर्नाडीस,जनार्दन पुजारी, मारग्रेट अल्वा का नाम नहीं लिया। पर इसाईयों को भड़काने का मामला उठा दिया। उनने सोनिया का नाम लेकर धर्म परिवर्तन का मुद्दा उठा दिया। 'न्यू लाइफ' की धर्म परिवर्तन साजिशों पर जमकर बरसे। बोले- 'लालच और जोर जबरदस्ती की कोशिशें तोड़ रही हैं सद्भाव।' देवी-देवता विरोधी किताब 'सत्य दर्शनी' का मुद्दा भी उठाया। इसी किताब ने कर्नाटक में दंगे कराए। बात धर्म परिवर्तन की चली। तो बताते जाएं- मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले याद कराए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है- 'अनुच्छेद 25 (1) धर्म परिवर्तन की इजाजत नहीं देता। धार्मिक आजादी तो सबको है। सिर्फ एक खास धर्म के लोगों को नहीं। इसलिए धर्म परिवर्तन करवाने का मौलिक अधिकार नहीं है।' मोदी बोले- 'सब अपने-अपने धर्म का पालन करें। जबरदस्ती धर्म परिवर्तन को बंद किया जाए। धर्म परिवर्तन के लिए इस्तेमाल होने वाले धन का समाज के हित में इस्तेमाल हो। धर्म को व्यक्तिगत आस्था पर छोड़ दें।'

येदुरप्पा का उभरना सुखद है.

येदुरप्पा का उभरना सुखद है.

आपके ब्लोग का नियमित पाठक हूं

आपके ब्लोग का नियमित पाठक हूं बहहुत ही सार्थक लिखते हैं आप ...कोई जरूरी नहीं कि हर बात पर सहमति हो ....पर आश्चर्य होता है कि बहुत से लोग जो सार्थक ब्लोग लेखन की बात करते हैं आपके चिट्ठों पर बहुत कम टिप्पणियां छोङते हैं.खैर बहुत शानदार

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