कश्मीर में चुनाव टलवाने की कुटिल चालें, पर....

शुक्रवार को दिनभर कश्मीर का हल्ला मचा। चुनाव आयोग में मधुकर गुप्ता को बुलाकर सुरक्षा बंदोबस्त का जायजा लिया। तो चुनावों के ऐलान का इंतजार होने लगा। होम सेक्रेट्री मधुकर कुछ दिन पहले भी बुलाए गए थे। तब उनने चुनाव टालने की पैरवी की थी। बहाना बनाया था कश्मीर के हालात का। तब सीईसी गोपालस्वामी ने पूछा- 'आप बताओ 2002 में कैसे हालात थे। तब भी तो चुनाव हुए थे।' होम सेक्रेट्री की सीटी-पीटी गुल। बताते जाएं- 2002 में जब वाजपेयी ने एसेंबली चुनाव करवाए। तो खुद गोपालस्वामी होम सेक्रेट्री थे। तब और अब के हालात का मुकाबला हुआ। तो मौजूदा हालात तब से बेहतर निकले। गोपाल स्वामी के तेवर देख कांग्रेस ने रुख बदला। सब कुछ चुनाव आयोग पर छोड़ दिया। अब सात-आठ को आयोग खुद हालात का जायजा ले आया। राजनीतिक दलों से बात हुई। पीडीपी की महबूबा मुफ्ती की मुखालफत जग जाहिर। नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला की भी। पर बाहर आकर अब्दुल्ला बोले- 'हालात देखकर आयोग फैसला करे।' कांग्रेस ने अंदर फैसला आयोग पर छोड़ा। बाहर आकर बोले- 'हम चुनाव के हक में।' यानी कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस अंदर कुछ और, बाहर कुछ और। बीजेपी-पीडीपी जो अंदर, सो बाहर। पीडीपी चुनाव के खिलाफ। बीजेपी फौरन चुनाव के हक में। यों पीडीपी-नेकां-कांग्रेस को फौरी चुनाव से नुकसान का डर। पर बीजेपी जम्मू की हिंदू एकता का फौरी फायदा उठाने की फिराक में। गुरुवार को जम्मू से लौटकर अरुण जेटली अपन को बता रहे थे- 'जम्मू कभी भी इतना ज्यादा बीजेपी के हक में नहीं रहा। इसलिए सभी चुनाव टालने की फिराक में।' कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां अंदर कुछ-बाहर कुछ। पर यह आयोग के तीनों मेंबरों को मालूम। सो आयोग के तीनों मेंबरों में मतभेद। यों फौरी चुनाव के विरोधियों से मीटिंग में गोपालस्वामी ने पूछा- 'अगर अभी चुनाव न हों। तो फिर कब हों?' महबूबा-उमर ने कहा- 'मार्च-अप्रेल में कराए जाएं।' गोपालस्वामी ने कहा- 'तो मार्च-अप्रेल में लॉ एंड आर्डर बेहतर होगा? आतंकवाद खत्म हो जाएगा?' उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को काटो, खून नहीं। दोनों जवाब नहीं दे सके। गोपालस्वामी की राय एकदम साफ। जैसे हालात अब, वैसे ही मार्च में होंगे। सो चुनाव अभी क्यों नहीं। यों तो गोपालस्वामी तीन अक्टूबर को फैसला कर लेते। पर सरकार ने पावर-रेल उद्धाटनों का वक्त मांग लिया। गवर्नर एन एन वोरा ने छह अक्टूबर का इंतजार करने की गुहार लगाई। छह को हुर्रियत का लाल चौक कूच था। कूच कर्फ्यू की सख्ती से पिट गया। अब तो गोपालस्वामी, कुरैशी, चावला खुद कश्मीर हो आए। यों अपन जानकारों पर भरोसा करें। तो कुरैशी-चावला फौरी चुनाव के हक में नहीं। इन्हीं में से एक ने शुक्रवार को कहा। तो एक चैनल ने चुनाव मार्च तक टलने की खबर फैलाई। पर मधुकर से मीटिंग के बाद गोपालस्वामी बोले- 'ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ। होम सेक्रेट्री से सुरक्षा इंतजामों का जायजा लिया। पीएम कश्मीर में हों। तो हम फैसला कैसे कर सकते हैं? पीएम को लौटने दो।' बात पीएम और सरकार की। जो गोपालस्वामी के तेवरों से पूरी तरह दहशत में। सो बागलिहार पावर प्रोजेक्ट का उद्धाटन शुक्र को कर दिया। अनंतनाग-श्रीनगर-राजवनशेर रेल लिंक का उद्धाटन आज। दोनों प्रोजेक्ट वाजपेयी ने शुरू करवाए थे। उद्धाटन मनमोहन ने किया। फोटू सोनिया-लालू का छपा। आचार संहिता से पहले कई लॉलीपाप दिए। कश्मीर को फिर से स्वर्ग बनाने का सपना दिखा आए। पाकिस्तान से संबंध सुधारकर व्यापार की गोली दे आए। पर कांग्रेस अंदर से चाहती है- चुनाव टल जाएं। सो आयोग से बहुमत के आधार पर फैसले के जुगाड़ में। कुरैशी-चावला एक तरफ हुए। तो गोपालस्वामी अकेले पड़ेंगे। आज मनमोहन लौट आएंगे। तो कश्मीर के चुनाव का फैसला आज नहीं तो कल। गोपालस्वामी चाहते हैं- लोकसभा न सही, कश्मीर के चुनाव रिटायरमेंट से पहले करा जाएं।

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