पाकिस्तान में मौजां ही मौजां जिधर देखो फौजा ही फौजा

परवेज मुशर्रफ ने अपना रंग दिखा ही दिया। जब देखा- सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति की उम्मीदवारी ही नाजायज ठहरा देगी। तो इमरजेंसी लगाकर चीफ जस्टिस को गिरफ्तार कर लिया। चीफ जस्टिस इफ्तिकार मोहम्मद चौधरी ही थे। जिनने परवेज मुशर्रफ की नाक में दम किया। पर चौधरी ऐसा कर पाए। इसकी वजह जनता का मुशर्रफ के खिलाफ खड़ा होना था। अगले हफ्ते पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली की मियाद पूरी होगी। परवेज मुशर्रफ का राष्ट्रपति वक्फा उसके बाद पूरा होता। पर अगली एसेंबली दुबारा चुनने लायक आए या नहीं। क्या भरोसा। सो उनने इसी नेशनल एसेंबली से खुद को दुबारा चुनवा लिया। यों तो छह अक्टूबर को चुनाव हो चुका। पर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लग गई। सो नतीजा नहीं निकला। अर्जी थी- 'मुशर्रफ की उम्मीदवारी जायज या नाजायज।' मुशर्रफ ने वादा किया था- 'दुबारा चुना गया। तो वर्दी उतार दूंगा। सिर्फ राष्ट्रपति रहूंगा, सेनाध्यक्ष नहीं।' सुप्रीम कोर्ट ने पता नहीं मुशर्रफ पर कैसे भरोसा किया। कोर्ट ने यह सोचकर रास्ता साफ किया होगा- मुशर्रफ सुधर गए होंगे। पर जब कोर्ट में रिजल्ट रोकने की अर्जी लगी। तो मुशर्रफ ने कोर्ट को सबक सिखाने का मन बना लिया। सत्रह अक्टूबर को सुनवाई हुई। तो अदालत में कहा गया- 'मुशर्रफ का इरादा इमरजेंसी लगाने का। कोर्ट जल्द फैसला करे।' कोर्ट ने कहा- 'अदालत किसी इमरजेंसी से नहीं डरती।' पर यह कोर्ट की गलतफहमी थी। दो नवम्बर को अदालत ने फैसला किया- मुशर्रफ की उम्मीदवारी पर मुकदमे की सुनवाई तेजी से होगी। इस खबर ने इमरजेंसी लगना तय कर दिया। शनिवार का 'डॉन' अखबार अपने सामने। पाकिस्तान का बड़ा अखबार है 'डॉन।' कोर्ट की खबर तो सिंगल कालम छपी। पर लीड छपी- 'इमरजेंसी लगाने पर विचार।' हालांकि अखबार ने मुशर्रफ को असंमजस में बताया। अपन जानते हैं- असमंजस अमेरिकी दबाव का होगा। अमेरिका की बात चली। तो बताते जाएं- एनडब्ल्यूएफपी में तालिबान के कब्जे से अमेरिका बेहद नाराज। हाल ही की अमेरिकी रिपोर्ट में एनडब्ल्यूएफपी को अलकायदा का स्वर्ग बताया गया। अपन अगर अमेरिका को समझने में गलत नहीं। तो अमेरिका का इरादा पाक-अफगानिस्तान के इस बॉर्डर प्रांत पर कब्जा करने का। ताकि अलकायदा की रीढ़ तोड़ी जा सके। एनडब्ल्यूएफपी की स्वात घाटी में पाक सरकार का हुक्म नहीं चलता। वहां अलकायदा समर्थक मौलाना फजलुल्लाह की हुकूमत। पर अपन बात कर रहे थे 'डॉन' की। अपन ने दो खबरों का जिक्र किया। पहले पेज पर बाकी खबरें थी- 'सरगोधा में एयरफोर्स पर हमला हुआ।' और- 'एनडब्ल्यूएफपी में तालिबानों ने अड़तालीस साथी छुड़वा लिए।' मुशर्रफ जब इमरजेंसी की तैयारी कर रहे थे। तो शनिवार को अलकायदा ने स्वात घाटी पर दूसरा हमला बोला। दो पुलिस स्टेशनों पर कब्जा कर लिया। मुशर्रफ ने भले ही आतंकी हिंसा को इमरजेंसी की वजह बताया। पर इसे कौन मानेगा। वजह साफ- 'खिसकती सत्ता बचाना।' दुबई गई बेनजीर को लौटने से रोकना। नवाज शरीफ को घुसने न देना। रास्ते के रोड़े चीफ जस्टिस इफ्तिकार को हटाना। यहां हटाने का मतलब 'खल्लास' करना। रात को फौज जैसे सुप्रीम कोर्ट में घुसी। उससे इरादे समझना मुश्किल नहीं। एक शायर ने पाक के बारे में कहा था- 'पाकिस्तान में मौज ही मौज। जिधर देखो, फौज ही फौज।' यह बात शनिवार को फिर लागू हुई। सुप्रीम कोर्ट में फौज। टेलीफोन एक्सचेंजों में फौज। मोबाइल फोन बंद। अपन को तो इंदिरा गांधी की इमरजेंसी याद आ गई। उनने भी तब इमरजेंसी लगाई। जब हाईकोर्ट ने इंदिरा का चुनाव रद्द किया। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। तो वहां भी चुनाव रद्द होने का डर था। अब पाकिस्तान में भी वही हाल। भारत और पाक की बानगी एक ही। कुर्सी हिलती दिखे, तो इमरजेंसी।  अब पाक में इमरजेंसी लग गई। संविधान गया भाड़ में। लोकतंत्र की गाड़ी पटरी से उतर गई। अब न नेशनल एसेंबली के चुनाव होंगे। न चारों प्रांतों के। पता नहीं बुश अब किस मुंह से मुशर्रफ की तरफदारी करेंगे।

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