चुनाव टालने की कांग्रेसी सियासत विफल

जम्मू में हिंदुओं के विरोध में आ जाने से भयभीत कांग्रेस शुरू में विधानसभा के चुनाव टलवाने की कोशिश में जुटी थी, लेकिन चुनाव आयोग के सामने एक नहीं चली, तो जल्द चुनाव की वकालत शुरू कर दी।

यूपीए सरकार अलगाववादियों के दबाव में आकर जम्मू कश्मीर के चुनाव टालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी के तेवरों को देखकर अब केंद्र सरकार ने घुटने टेक दिए हैं। केंद्र सरकार ने अब चुनाव आयोग से आग्रह किया है कि चुनावों को इस साल होने वाले बाकी विधानसभाओं के चुनावों से अलग किया जाए क्योंकि जम्मू कश्मीर के लिए सुरक्षा एजेंसियों की ज्यादा जरूरत पड़ती है। चुनाव आयोग को इस पर कोई ऐतराज नहीं होगा, हालांकि जम्मू कश्मीर में लागू गवर्नर राज की अवधि दस जनवरी तक है, लेकिन  अब संभावना यह बन रही है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली से पहले ही जम्मू कश्मीर  के चुनाव करवा लिए जाएं। जबकि इन चारों विधानसभाओं का कार्यकाल जम्मू कश्मीर के गवर्नर राज की अवधि खत्म होने से पंद्रह-बीस दिन पहले ही खत्म हो रही है। शुक्रवार से चुनाव आयोग ने पूर्वोत्तर की एक विधानसभा समेत सभी छह राज्यों में चुनाव करवाने पर विचार करने के लिए बैठकों का दौर शुरू कर दिया है। वैसे चुनावी तैयारियां और तारीखों का फैसला करने के लिए बैठक पिछले हफ्ते ही हो जाती लेकिन एक चुनाव आयुक्त एमआई कुरैशी उमरा करने के लिए सऊदी अरब गए हुए थे। एक अन्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने चुनाव आयोग की पहली बैठक में जम्मू कश्मीर के चुनाव फौरन करवाने की मुखालफत की थी, लेकिन अब केंद्र सरकार और कांग्रेस के रुख में काफी बदलाव आ गया है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने अपने पुराने रुख में परिवर्तन करते हुए कहा है कि कांग्रेस पार्टी नवंबर-दिसंबर में ही चुनावों के पक्ष में है। साफ है कि कांग्रेस के रुख में बदलाव मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी के तेवरों को देखते हुए आया है। वरना कांग्रेस भी नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की तरह मार्च-अप्रेल में चुनाव करवाने के पक्ष में थी।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पिछले महीने पार्टी की कोर कमेटी की बैठक बुलाई तो उसमें उनके सामने फरवरी-मार्च में चुनाव करवाने की राय रखी गई थी। कांग्रेस अध्यक्ष को बताया गया था कि चुनाव आयोग को इसके लिए तैयार किया जा सकता है और राज्यपाल प्रशासन का मौजूदा कार्यकाल छह महीने और बढ़ाया जा सकता है। सोनिया गांधी कोर कमेटी की राय से सहमत नहीं हुई, क्योंकि इससे पहले हिमाचल विधानसभा के चुनावों और कर्नाटक विधानसभा के चुनावों में चुनाव आयोग ने कांग्रेस की एक नहीं चलने दी थी। चुनाव आयोग ने हिमाचल विधानसभा के चुनाव पहली विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने से दो महीने पहले ही करवा दिए थे। जबकि कर्नाटक में भी कांग्रेस छह महीने और राष्ट्रपति राज लगाकर येदुरप्पा के पक्ष में बनी हवा को ठंडा पड़ जाने देना चाहती थी। विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने चुनाव आयोग से चुनाव टालने की गुहार भी लगाई थी लेकिन पूर्व विधि मंत्री अरुण जेटली ने मुख्य चुनाव आयुक्त को साफ-साफ बता दिया कि अगर फौरन चुनाव करवाने में आना-कानी की गई तो पार्टी अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी खुद भी बिना वजह राष्ट्रपति राज का कार्यकाल बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। कांग्रेस का अनुमान था कि अगर जल्दी चुनाव हो गए तो उसकी लुटिया डूब जाएगी। कांग्रेस का अनुमान सही निकला और दक्षिण में पहली बार भगवा फहरा गया। पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए सोनिया गांधी ने कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में कहा कि पार्टी को चुनाव आयोग पर ज्यादा भरोसा करने की बजाए नवंबर-दिसंबर में ही जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनावों की तैयारी करनी चाहिए।

सोनिया गांधी की हिदायत के बावजूद कांग्रेस ने अपनी तरफ से चुनाव आयोग को समझाने-बुझाने की पूरी कोशिश जारी रखी कि राज्य में हालात चुनाव करवाने लायक नहीं। एक तरफ जम्मू और कश्मीर में सांप्रदायिक धु्रवीकरण का माहौल है, तो दूसरी तरफ अलगाववादी चुनाव का विरोध कर रहे हैं। असल में कांग्रेस को जम्मू में ही सीटें मिलने की संभावना बनती है, लेकिन वहां श्री अमरनाथ यात्रा के लिए आवंटित की गई जमीन रद्द करने के कारण कांग्रेस अपनी साख गंवा चुकी है, इसलिए कांग्रेस अपने खिलाफ बनी हवा को ठंडा हो जाने देना चाहती है। जहां तक घाटी का सवाल है तो वहां कांग्रेस की स्थिति पहले से ही नाजुक है। घाटी में पिछली बार पीडीपी को अच्छी खासी सीटें मिल गई थी, लेकिन तीन साल शासन करने के बाद वहां पीडीपी की हालत खराब हो चुकी है। वह कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने का बहाना ढूंढ ही रही थी कि मुख्यमंत्री गुलामनबी ने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देकर पीडीपी को रिश्ते तोड़ने का बहाना दे दिया। इससे पीडीपी को घाटी में सांप्रदायिकता उभारकर अपना वोट बैंक फिर से मजबूत करने का मौका मिल गया। छह साल में पीडीपी की साख गिरने का सीधा फायदा नेशनल कांफ्रेंस को होने वाला था, लेकिन जब पीडीपी ने श्राइन बोर्ड को जमीन देने का विरोध करके समर्थन वापस लिया तो नेशनल कांफ्रेंस को अपनी जमीन खिसकती नजर आई। इसलिए नेशनल कांफ्रेंस ने भी श्राइन बोर्ड को जमीन देने की मुखालफत शुरू कर दी थी। तब किसी भी राजनीतिक दल ने यह नहीं सोचा था कि जम्मू में आंदोलन इतना तीव्र रूप ले लेगा।

अब बदले हालात में पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस फौरन चुनाव की मुखालफत कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस ने अपने स्टेंड में परिवर्तन कर लिया है, हालांकि चुनावों में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही होने का अनुमान है। जम्मू कश्मीर तीन हिस्सों में बंटा हुआ है, जम्मू में 37, घाटी में 45 और लद्दाख में चार सीटें हैं। जम्मू की 37 सीटों में से करीब 20 सीटें हिंदू बहुल हैं जिनमें से 14 पिछली बार कांग्रेस जीत गई थी जबकि अब वहां हालात कांग्रेस के खिलाफ हैं। इसके बावजूद चुनाव टालने से होने वाले नुकसान को देखते हुए कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर फैसला छोड़ने की बात कही थी। हालांकि भीतर ही भीतर कांग्रेस चुनाव टालने की कोशिश करती रही। गृहमंत्रालय से चुनाव आयोग पर दबाव भी बनवाया गया, लेकिन गृह मंत्रालय चुनाव आयोग को चुनाव टालने के पक्ष में माकूल जवाब नहीं दे सका है। आयोग ने गृहमंत्रालय से 2002 में हुए चुनावों के समय के हालात की आज के हालात से तुलना करके देने को कहा था। गृह मंत्रालय ने तुलनात्मक चार्ट आयोग को उपलब्ध करवा दिया है, जिसमें साफ है कि हालात पहले से बेहतर हैं। अब केंद्र सरकार ने भी यह मन बना लिया है कि चुनाव टालने की बजाए नवंबर-दिसंबर में चुनाव करवाना बेहतर होगा। क्योंकि अलगाववादियों के तेवरों और जम्मू में हिंदुओं के आक्रोश में चार महीने बाद भी कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है। वैसे जम्मू कश्मीर में इस बार भी 38-40 फीसदी तक ही मतदान रहने के आसार हैं। पिछली बार अलगाववादियों के बायकाट के बावजूद घाटी के ग्रामीण इलाकों में 25 से 30 फीसदी तक मतदान हो गया था हालांकि श्रीनगर में नौ फीसदी और सोपोर-बारामूला में पांच से सात फीसदी तक ही मतदान हुआ था। जम्मू और लद्दाख में अच्छे-खासे मतदान की वजह से राज्य का मतदान 38 से 40 फीसदी तक चला गया था।

अनुमान यह है कि दो-चार दिन में जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनावों का ऐलान हो जाएगा। अलगाववादियों की ओर से चुनाव का बायकाट करने की आशंका को देखते हुए पिछली बार की तरह इस बार भी ऐलान, अधिसूचना और मतदान की अवधि को कम से कम रखे जाने के आसार हैं। पिछली बार चुनाव आयोग ने अधिसूचना और चुनाव की अवधि बाईस दिन से घटाकर पंद्रह दिन कर दी थी, ताकि आतंकवादियों को ज्यादा हिंसा फैलाने का मौका न मिले। इस बार भी ऐसा ही किए जाने के आसार हैं। वैसे जम्मू कश्मीर के हालात को देखते हुए वहां चार या पांच दौर में चुनाव हो सकते हैं। जबकि बाकी राज्यों में चुनावों की घोषणा भी जम्मू कश्मीर के साथ हो सकती है, लेकिन चुनाव वक्त पर ही होंगे। राजनीतिक दलों में बनी आम सहमति के मुताबिक चुनाव आचार संहिता की अवधि 55 दिन के आसपास रहनी चाहिए। आचार संहिता चुनावों का ऐलान होते ही लागू हो जाती है।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट