दो आतंकी भाग गए तो पाटिल का क्या कसूर

अपने मीडिया में भी तिस्ता सीतलवाड़ों, पीयूडीआर, पीयूसीएल जैसों की कमी नहीं। कहीं मुठभेड़ हुई नहीं। लगेंगे फर्जी बताने। इस बार तो इलाके की मुस्लिम जनता को भी भड़काया। ठीक उसी तरह, जैसे 1999 में विमान अपहरण के समय भड़काया था। शुक्रवार को दिल्ली के जामिया इलाके में आतंकियों से मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ खत्म भी नहीं हुई थी। सबसे तेज चैनल के मानवाधिकारी खबरची ने कांग्रेस  ब्रीफिंग में पूछा- 'मुठभेड़ को फर्जी बताया जा रहा है। कांग्रेस का क्या कहना है?'

उसने यह भी नहीं सोचा- आतंकियों की गोली से जख्मी दो पुलिसिए मौत से जूझ रहे थे। शाम होते-होते इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए। शुक्रवार की मुठभेड़ से कांग्रेस बेहद खुश। अभिषेक मनु सिंघवी फूले नहीं समाए। अहमदाबाद से लाए गए अब्दुल बशीर से मिले सुराग पर मुठभेड़ हुई। पर पाटिल, पुलिस, सिंघवी अपनी पीठ थपथपाने लगे। लगे अब्दुल बशीर से मिले सुराग का खंडन करने। पर सब जानते हैं- आतंकियों तक पहुंची मोदी की गुजरात पुलिस। वहीं से मिला सुराग, तो दिल्ली पुलिस पहुंची जामिया। मुठभेड़ की सफलता से सिंघवी के नुथने फूल गए। लगते हाथों धर्मांतरण के खिलाफ हुई हिंसा पर येदुरप्पा को धमकी देते हुए बोले- 'कर्नाटक और उड़ीसा सरकारें केंद्र को लाचार न समझें।' यह सीधा-सीधा बर्खास्तगी की धमकी। चर्च और क्रिश्चियन कांग्रेसियों की सबसे बड़ी कमजोरी। सो मनमोहन सरकार ने पहले 355 के तहत कर्नाटक, उड़ीसा सरकारों को नोटिस दिया। मध्यप्रदेश के कांग्रेसियों का दबाव पड़ा। तो शिवराज सरकार को भी नोटिस। बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- '356 से पहले 355 के तहत नोटिस देना चाहिए।' यानी कांग्रेस गैर कांग्रेसी सरकारों को बर्खास्त करने की पुरानी करतूतों पर उतारू। 356 यानी सरकार की बर्खास्तगी। 355 यानी बर्खास्तगी से पहले चेतावनी। सोनिया मैनो गांधी को खुश करने का मौका क्यों चूकते मनमोहन। सिंघवी ने भी वही किया। पर नरेंद्र मोदी केंद्र की इस चेतावनी से भड़के। उनने कुछ तीखे सवाल किए- 'असम में हिंदी भाषियों का कत्लेआम हुआ। तो आपने 355 का नोटिस क्यों नहीं दिया? नंदीग्राम में लोगों के मानवाधिकार का हनन हुआ। तो आपने बंगाल सरकार को नोटिस क्यों नहीं दिया? कश्मीर को हिंदू रहित किया जा रहा था। तो कांग्रेस सरकार क्यों सोई थी?' गुजरात का सीएम बनने के बाद मोदी पहली बार दिल्ली में गरजे। वह उसी जगह पर रैली में गरजे। जहां तेरह सितंबर को आतंकियों ने बम फोड़े थे। उनने सीधा मनमोहन-पाटिल पर हमला किया। बात एचएम की चली। तो बताते जाएं- यह शिवराज पाटिल की छवि का ही नतीजा। जो लोग उनके पुलिस हेडक्वार्टर पहुंचने पर ऊंगली उठाने लगे। दिल्ली के जामिया इलाके में जब मुठभेड़ चल रही थी। तब पाटिल आनन-फानन में पुलिस हेड क्वार्टर पहुंचे। उसी समय मुठभेड़ बंद हो गई। दो आतंकियों का फरार हो जाना। पाटिल ने पहले सिमी पर बैन हट जाने दिया। बवाल मचा, तो नए सिरे से बैन लगाया। इस बार बैन की हिमायत में अदालत को सबूत नहीं दिए। कोर्ट ने बैन हटा दिया। तो बवाल मचते ही सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। अफजल की फांसी पर सिर्फ कुंडली मारकर नहीं बैठे। अलबत्ता अफजल के पक्ष में दलील दी- 'सरबजीत की रिहाई मांगने वाले अफजल की फांसी कैसे मांग सकते हैं।' ऐसे रिकार्ड वाले पाटिल पुलिस हेडक्वार्टर जाएं। मुठभेड़ रुक जाए। दो आतंकी भाग जाएं। तो शक होना ही था। सो लोगों ने ऊंगली उठाई। पुलिस प्रमुख डडवाल खंडन न करते। तो बर्खास्त होते। सो उनने फौरन अपनी नौकरी बचाई। वैसे भी पाटिल ने किसी को भगाने के लिए तो कहा नहीं होगा। उनने तो कहा होगा- महात्मा गांधी खून खराबे के खिलाफ थे। अगर यह नहीं कहा हो, तो कहा होगा- मुर्दा नहीं जिंदा पकड़ो। अब वे भाग गए, तो उसमें पाटिल का क्या कसूर।

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समर्थ का कोई दोष नहीं होता. पाटिल के सर पर जब तक उनका हाथ है तब तक एक विदेशी द्वारा मनोनीत इस कठपुतली सरकार में पाटिल दोषी हैं ऐसा कहने की किस में हिम्मत है?

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