देवगौड़ा की शर्तों से अटका न्यौता

चेन्नई में वेंकैया नायडू कह रहे थे- 'येदुरप्पा को न्यौता नहीं मिला। तो 129 एमएलए लेकर दिल्ली जाएंगे।' पर यह गीदड़-भभकी के सिवा कुछ नहीं। देवगौड़ा की नई चिट्ठी ने गठबंधन में ही आग लगा दी। जेडीएस के एमएलए दिल्ली तो तब पहुचेंगे। जब देवगौड़ा की हरी झंडी होगी। यूपीए-लेफ्ट में वन-टू-थ्री पर छीना-झपटी। जेडीएस-बीजेपी में वन-टू-नाइन पर। देवगौड़ा ने तो शर्तों का पुलिंदा सामने रख दिया। अपन ने कल सही लिखा था- 'बीजेपी माने तो मरी, न माने तो मरी।' अब बीजेपी ने बिना शर्तें माने मरने का फैसला कर लिया। शुक्रवार को बेंगलुरु में जो कोर कमेटी बैठी। उसने वही तय किया। जो अपन ने लिखा था। देवगौड़ा की सिर्फ दो शर्तें ही मंजूर। पहली- 'सीएम येदुरप्पा होंगे।' दूसरी- 'डिप्टी सीएम जिसे चाहे जेडीएस बनाए।' जहां तक बाकी शर्तों का सवाल। तो तय हो गया- जिन शर्तों पर बीस महीने पहले कुमारस्वामी सीएम बने। वही शर्तें कायम रहेंगी। यानी जहां से चले थे, वहीं वापस पहुंच गए। बीजेपी का रुख देख कुमारस्वामी हड़बड़ाते हुए बोले- 'चिट्ठी की बातों को बीजेपी सुझाव माने, शर्तें नहीं।' पर दूसरी ही सांस बोले- 'बीजेपी को समर्थन बिना शर्त नहीं।' तो यह नई शर्तें कौन सी। इसका खुलासा नहीं किया। पर कर्नाटक की बीजेपी को पूरी तरह समझ आ गया। देवगौड़ा ने अपनी पार्टी बचाने के लिए चाल चली। बीजेपी को तो मोहरे की तरह इस्तेमाल किया। पर अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। अपन को हू-ब-हू वही होता दिखने लगा। जैसा तीस जुलाई को गोवा में हुआ। बीजेपी के मनोहर परिकर विधायकों का बहुमत राष्ट्रपति भवन ले गए। रहनुमाई खुद राजनाथ सिंह ने की। पर गवर्नर-स्पीकर ने ऐसा खेल किया। दिन में जो एमएलए परिकर के साथ घूम रहे थे। रात को बर्खास्तगी के डर से कांग्रेस में जा मिले। अब वही कर्नाटक में। जेडीएस के जो एमएलए राजभवन में हल्फिया बयान देकर आए। उनकी नकेल देवगौडा के हाथ। जो ईमानदारी से सरकार बनने देना ही नहीं चाहते। यह बात अब जाकर बीजेपी को समझ आई। सो अब तीन दिन बेंगलुरु में धरना होगा। फिर येदुरप्पा  बेंगलुरु, मैसूर, मांडिया, तुमकर, रामनगरम जिलों की खाक छानेंगे। ये सभी जिले देवगौड़ा के प्रभाव वाले। यानी अब निशाने पर कांग्रेस कम, देवगौड़ा ज्यादा। ऊपर से भले ही न्यौते में फच्चर के लिए कांग्रेस को कोसें। पर निशाना देवगौड़ा की जमीन पर ही होगा। बीजेपी की रणनीति जेडीएस में सेंध की। अपनी मानो, तो जेडीएस के आधे एमएलए बीजेपी टिकट मांगेंगे। मिलेगी भी। झटका बीजेपी एमएलए भी खाएंगे। आधों के टिकट कटेंगे। ये वही लोग, जिनके जीतने के आसार नहीं। सो उनने ही गठबंधन सरकार बनाने का दबाव बनाया। जिससे बीजेपी की भद्द पिटी। जहां तक कांग्रेस का सवाल। तो कांग्रेसी अब भी राष्ट्रपति राज के हक में। वैसे गठबंधन सरकार बनवाकर बिल्लियों की लड़ाई कराते। तो बंदर को ज्यादा मजा आता। पर कांग्रेस प्रवक्ता शकील अख्तर बोले- 'देवगौड़ा की नई शर्तों से साफ हो गया- यह सरकार स्थाई नहीं होगी। गवर्नर को तभी मौका देना चाहिए। जब स्थाई सरकार की संभावना दिखे।' यों कांग्रेस को सरकार बनवानी होती। तो मनमोहन शुक्रवार को ही गवर्नर से रिपोर्ट मंगवा लेते। केबिनेट से मंजूरी हो जाती। येदुरप्पा यही उम्मीद लेकर लौटे थे। पर केबिनेट मीटिंग से बाहर निकले दासमुंशी बोले- 'कर्नाटक का मामला एजेंडे में नहीं था।' होता भी कैसे। पहले गवर्नर की सिफारिश तो आती। अब जैसी सिफारिश आएगी। उसका अंदाजा येदुरप्पा को भी लग चुका। देवगौड़ा की चाल पर येदुरप्पा भले ही अंदर से टूटे हों। पर बाहर से दिखावा नहीं। बोले- 'मैं निराश नहीं हूं। निराश कर्नाटक की जनता। जो कांग्रेस को सबक सिखाएगी।' फिलहाल देवगौड़ा पर सीधा हमला नहीं। पर जमीन खोदेंगे देवगौड़ा की ही।

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