गुजरात मॉडल ही बेड़ा पार करेगा भाजपा का

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कांग्रेस जीती तो सुभाष यादव को ही पेश करना पड़ सकता है पचौरी का नाम, रैलियों में प्रस्ताव पास करके कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं बनते। मुख्यमंत्री तो विधायक दल की बैठक में सोनिया गांधी को अधिकृत करने वाले प्रस्ताव से ही तय होगा।

मध्य प्रदेश में चुनावी शतरंज के लिए बिसात बिछ गई है। कांग्रेस अभी तय नहीं कर पा रही कि वह किसे चुनावी बारात का दूल्हा बनाए। हालांकि कांग्रेस में दूल्हों की कमी नहीं, अलबत्ता दूल्हे ज्यादा बाराती कम हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की राजनीति चुपके से काम करने की रहती है। उन्होंने अर्जुन सिंह, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे धुरंधरों को किनारे करके अपने वफादार और खामोशी से काम करने वाले सुरेश पचौरी को अपना प्रतिनिधि चुना है। मध्य प्रदेश के भावी नेता के तौर पर पेश करने के इरादे से ही सोनिया गांधी ने उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना कर भेजा था। यही कांग्रेस की परंपरा भी रही है, दिग्विजय सिंह को भी चुनावों से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गई थी। उन्हीं की अध्यक्षता में चुनाव जीतने पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। राजस्थान में भी अशोक गहलोत को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर भेजा गया था जब उनकी रहनुमाई में कांग्रेस 1998 में चुनाव जीती तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर भी यही परंपरा लागू रही। पंजाब में अमरेंद्र सिंह को भी चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया था और चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री बनाया गया। इसी तरह गुलाम नबी आजाद को छह साल पहले जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भेजा गया था, नतीजों के बाद कांग्रेस-पीडीपी गठजोड़ में पहले पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने और दूसरी पाली में गुलाम नबी आजाद को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया। सोनिया गांधी ने राजशेखर रेड्डी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया था। आंध्र प्रदेश के विजय भास्कर रेड्डी जैसे धुंरधर नेताओं ने शुरू में राजशेखर को पसंद नहीं किया था, लेकिन आखिरकार उन्हें झुकना पड़ा। मध्य प्रदेश के धुरंधर कांग्रेसी नेताओं को भी सुरेश पचौरी गले नहीं उतर रहे, तभी तो नेताओं की एकजुटता दिखाने के लिए बुलाई गई रैली में फूट सामने आ गई। हालांकि सुरेश पचौरी और कमलनाथ को एक ही खेमे के और आपस में करीबी माना जाता है लेकिन कमलनाथ को भी सुरेश पचौरी की अगुवाई रास नहीं आ रही। इसीलिए सुभाष यादव के माध्यम से रैली में कमलनाथ की रहनुमाई में विधानसभा चुनाव में उतरने और उन्हें ही मुख्यमंत्री बनवाने का प्रस्ताव पास करवा दिया गया। बड़ी हैरानी की बात है कि सारी जिंदगी कांग्रेस में गुजारने वाले कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और सुभाष यादव यह भी नहीं जानते कि कांग्रेस का मुख्यमंत्री कैसे बनता है। कांग्रेसी मुख्यमंत्री रैलियों में प्रस्ताव पास करके नहीं अलबत्ता विधायक दल की बैठकों में कांग्रेस अध्यक्ष को अधिकृत करने का प्रस्ताव पास करके बनता है। फिर दिल्ली से जो नाम भेजा जाता है उसे विधायक दल भी दुबारा बैठक बुलाकर पास करता है। क्या पता कांग्रेस के बहुमत में आने पर सुभाष यादव को ही विधायक दल की बैठक में सुरेश पचौरी का नाम पेश करने का फरमान जारी हो जाए। कांग्रेस की बागडोर जब नेहरू परिवार के किसी वारिस के हाथ में हो जो सारी जिंदगी कांग्रेस में गुजारने वाले की भी कोई हैसियत नहीं होती। सोनिया गांधी ने आखिर अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी और प्रणव मुखर्जी जैसों को दरकिनार करके तेरह साल पहले कांग्रेस में शामिल हुए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर सबका नेता बना दिया। आज अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज राहुल गांधी जिंदाबाद के नारे लगाते दिखाई देते हैं, फिर भी उन्हें फटकार सहनी पड़ती है। ऐसे में रैलियों के प्रस्तावों की क्या अहमियत।

एक तरफ एकजुटता के लिए बुलाई गई कांग्रेस की रैली में कांग्रेसियों की महत्वाकांक्षा और एक-दूसरे से जलन सामने आ गई, तो दूसरी तरफ भाजपा अपने मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को सामने करके चुनावी बिसात बिछा चुकी है। सोनिया गांधी अब भाजपा पर यह आरोप नहीं लगा सकती कि वह धर्म पर आधारित राजनीति करती है। खुद सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को विधिवत लांच करने से पहले उज्जैन के महाकाल मंदिर में पूजा अर्चना की थी। अब शिवराज चौहान ने चुनाव आयोग की आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले महाकाल के मंदिर में पूजा अर्चना से चुनावी अभियान शुरू कर दिया है। नरेंद्र मोदी ने भी अपने चुनाव अभियान की शुरूआत एक मंदिर के प्रांगण से की थी। चौहान ने अपने राजनीतिक गुरु लालकृष्ण आडवाणी की परंपरा का अनुसरण करते हुए रथयात्रा शुरू कर दी है। रथयात्रा को हरी झंडी भी लालकृष्ण आडवाणी ने दी, राजनाथ सिंह की बजाए आडवाणी की मौजूदगी से ही स्पष्ट है कि पार्टी में अब किस का रुतबा क्या है। गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने भी जब रथयात्रा शुरू की थी तो हरी झंडी लालकृष्ण आडवाणी ने ही दिखाई थी। हालांकि लालकृष्ण आडवाणी ने दिल्ली में हुए भाजपा अधिवेशन में जब सभी भाजपाई मुख्यमंत्रियों को चुनाव जीतने के लिए गुजरात मॉडल अपनाने की सलाह दी थी तो कई मुख्यमंत्रियों ने नाक-भौं सिकोड़ी थी। जबकि शिवराज सिंह चौहान से लेकर वसुंधरा राजे तक वही तौर-तरीका अपनाने को मजबूर हैं। नरेंद्र मोदी की चुनावी रणनीति को कर्नाटक में भी आजमाया गया था, जिसका भाजपा को अच्छा खासा फायदा हुआ। गुजरात मॉडल के दो पहलू हैं। पहला- आक्रामक चुनाव प्रचार और जन-जन तक पहुंचने का तौर-तरीका। दूसरा- उन विधायकों का टिकट काटना जिनसे जनता का मोह भंग हो चुका है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा के मौजूदा विधायकों में से 33 फीसदी के टिकट काटने की रणनीति सफल रही तो भाजपा के दुबारा सत्ता में आने की संभावना बन सकती है। वैसे भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह चुनाव वाले सभी पांचों राज्यों में से मध्यप्रदेश को सबसे कमजोर मानते हैं। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की सोच ऐसी नहीं है, आडवाणी के गुजरात फार्मूले पर अमल हुआ तो भाजपा मध्यप्रदेश की नैय्या पार कर सकती है। कांग्रेसी नेताओं की मुख्यमंत्री बनने की भूख भी भाजपा की मददगार होगी क्योंकि राज्य के सभी चार-पांच खेमे एक-दूसरे को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए एक-दूसरे के उम्मीदवारों को चूना लगाएंगे। आखिर उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में नारायण दत्त तिवारी और हरीश रावत के खेमों ने एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने के चक्कर में सत्ता गवाई ही है। बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है, 1996 के लोकसभा चुनाव में जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस को जोरदार झटका लगा तो छोटे उम्मीदवारों ने कांग्रेसी मंत्रियों-विधायकों पर ही उन्हें हरवाने का आरोप लगाया था। वह सिर्फ आरोप नहीं था, आरोपों के साथ कई ठोस सबूत भी थे और उन्हीं सबूतों के आधार पर तत्कालीन प्रदेश प्रभारी कांग्रेस महासचिव सुधाकर राव नाइक ने दिग्विजय सरकार के छोटे-बडे 14 मंत्रियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया ही था।

चुनावों का ऐलान 15 सितंबर को हो सकता है और उसके साथ ही आचार संहिता लागू हो जाएगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 15 सितंबर को आचार संहिता लागू होने की भनक के आधार पर ही 28 अगस्त को महाकाल मंदिर से रथयात्रा शुरू की है। यह रथयात्रा बीस दिन चलेगी, रथयात्रा के आखिरी दिन पार्टी की महारैली होगी, उसी दिन चुनावों का ऐलान हो जाएगा। बीस दिन, 3500 किलोमीटर और राज्य की 230 विधानसभाओं में से 130 सीटों का दौरा। शिवराज चौहान प्रचार में एक कदम आगे तो होंगे ही। चुनाव प्रचार में भाजपा का अभियान गुजरात और कर्नाटक की तरह बमबारमेंट शैली में ही होगा। भाजपा एक ही दिन 30-40 जगह से जनसभाएं करके चुनाव अभियान शुरू करेगी जबकि कांग्रेस के चुनाव अभियान का दारोमदार सोनिया गांधी के दौरों और राहुल गांधी के रोड शो पर निर्भर करेगा। कांग्रेस राज्य में भाजपा की ओर से पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदले जाने और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाएगी, जबकि भाजपा के पास ज्यादा कारगार महंगाई और आतंकवाद जैसे मुद्दे होंगे, जिनसे देश का आम आदमी पूरी तरह त्रस्त है। चुनाव में जिसका प्रचार अभियान हमलावर हुआ वही बाजी मारेगा। आज की तारीख में कांग्रेस का पलड़ा भारी दिखाई देता है, लेकिन चुनाव कभी भी पांच साल की उपलब्धियों और नाकामियों के आधार पर जीते या हारे नहीं जाते।