मनमोहन का यह तोहफा इंदिरा को कबूल नहीं था

मनमोहन सिंह लोकसभा में विश्वासमत पेश करने खड़े हुए। तो उनने यूपीए सरकार बनाने में हरकिशन सिंह सुरजीत की तारीफ की। शुक्रवार को एटमी करार का आपरेशनालाइजेशन शुरू हुआ। तो हरकिशन सिंह सुरजीत इस दुनिया में नहीं रहे। सुरजीत क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे गांधीवादी नहीं। शहीद-ए-आजम भगत सिंह की धारा के थे। भगत सिंह के साथ मिलकर काम किया। पकड़े गए, तो अदालत में अपना नाम बताया था- 'लंदनतोड़ सिंह।' आजादी के बाद सुरजीत वामपंथी बने। तो सारी उम्र वामपंथी रहे। वह कांग्रेस के घोर विरोधी थे। पर कांग्रेस से ज्यादा भाजपा विरोधी थे। फिर भी उनने 1989 में ऐसा कुनबा खड़ा किया। जिसमें वामपंथी-भाजपाई दोनों ने वीपी सिंह की सरकार बनवा दी। लालकृष्ण आडवाणी ने सुरजीत को श्रध्दांजलि दी। तो उन्हीं 1989 की मुलाकातों को याद किया। पर मनमोहन ने जब लोकसभा में सुरजीत का नाम लिया। तो वह एटमी करार पर विरोध करने लायक भी नहीं थे। महीनों से बिस्तर पर थे। कभी अस्पताल। तो कभी घर पर ही डाक्टर देखभाल करते रहे। एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट की आखिरी मीटिंग भी तब हुई। जब वह अस्पताल में मौत से जूझ रहे थे।  मनमोहन ने लोकसभा में सुरजीत का नाम तो ऐसे लिया। जैसे वह एटमी करार के हिमायती हों। किसी की बीमारी का ऐसा दुरुपयोग अपन ने न पहले देखा, न सुना। लेफ्ट तो इस बात को हमेशा याद रखेगा। सुरजीत ने जिस कांग्रेस की सरकार बनवाई। वह अमेरिका की झोली में जा बैठी। लेफ्ट इस दिन को भी याद रखेगा। जब मनमोहन सरकार ने एटमी करार का आपरेशनालाइजेशन किया। उस दिन सुरजीत इस दुनिया से उठ गए। अमेरिकापरस्त करार के आपरेशनालाइजेशन पर फूले नहीं समा रहे। जैसे मनमोहन ने चौंतीस साल का कलंक धो दिया है। पर अगर वह कलंक था। तो इसे लगाया था इंदिरा गांधी ने। जब उनने अमेरिका को धत्ता बताकर पहला न्यूक्लियर टेस्ट किया। अगर यह 'गुड न्यूज' है। तो 1974 में इंदिरा ने देश को क्या 'बैड न्यूज' दी थी। प्रणव मुखर्जी लोकसभा में आडवाणी की काट में कह रहे थे- 'सीटीबीटी तो 1970 में बनी। नेहरू तो 1964 में ही विदा हो गए थे।' जैसे नेहरू होते तो सीटीबीटी पर दस्तखत कर देते। वह भूल गए- 'इंदिरा ने सीटीबीटी पर ठोकर मारकर 1974 में न्यूक्लियर टेस्ट किया था।' फिर एनपीटी बना। इंदिरा तो क्या राजीव गांधी ने भी एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए। पर शुक्रवार को जब आईएईए ने सेफगार्ड पर मुहर लगाई। तो ठीक एक दिन पहले गुरुवार को निकोलस बर्न ने दोहराया- 'भारत ने न्यूक्लियर टेस्ट किया। तो हाईड एक्ट के तहत करार खत्म होगा। दुबारा सारे प्रतिबंध लगेंगे।' निकोलस बर्न ही वह शख्स। जिसने करार के हिमायत में अमेरिकी कांग्रेस में दलीलें दी थी। उनने तब भी अमेरिकी कांग्रेस में यही कहा था। अब भी वही दोहराया। मनमोहन-प्रणव ने 21 जुलाई को भी लोकसभा में यह कहकर झूठ बोला- 'हाईड एक्ट भारत पर लागू नहीं होगा। भारत न्यूक्लियर टेस्ट के लिए आजाद।' छोड़िए अमेरिका की बातों को। यूरोपियन यूनियन ने शुक्रवार को आईएईए में क्या कहकर समर्थन दिया। यूनियन ने कहा- 'इससे एनपीटी को ताकत मिलेगी। एनपीटी किसी भी सूरत में लागू होनी चाहिए।' वही एनपीटी जो नेहरू को न सही। इंदिरा-राजीव को तो मंजूर नहीं थी। आईएईए चीफ अलबरदई ने शुक्रवार को भी कहा- 'एग्रीमेंट खत्म होने की शर्तें वही रहेंगी। जो 66-टाइप एग्रीमेंट में।' अपन याद करा दें- 66-टाइप एग्रीमेंट तो गैर एटमी देशों पर लागू होता है। यानी अपन ने न्यूक्लियर टेस्ट किया। तो आईएईए एग्रीमेंट खत्म। यानी मनमोहन ने इंदिरा-अटल के किए-धरे पर पानी फेर दिया। अब अपन एटमी देश कहलाने लायक नहीं रहे। 'गुड न्यूज' के लिए बधाई। पर रुकावटें अभी खत्म नहीं हुई। एनएसजी की शर्तें तो अपन की हालत ईरान जैसी बना देंगी। मनमोहन शुक्रवार को श्रीलंका जा रहे थे। तो उड़नखटोले में सरकारी कुनबे को एनएसजी की शर्तें सता रहीं थी।

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