यूपीए को तलाक यूएनपीए से हनीमून

अपन एक बार फिर याद करा दें। एटमी करार का ड्राफ्ट जारी हुआ। तो अपन ने सबसे पहले इसे देश के खिलाफ कहा। अपना शुरू से मत रहा- करार से अपना फायदा कम, अमेरिका का ज्यादा। पीएम और कांग्रेस यह बात अब तक नहीं मान रहे। मनमोहन-सोनिया से एक सवाल तो वाजिब ही होगा। अगर करार अपने हक में। तो अमेरिका इतना बेचैन क्यों? निकोलस बर्न्स की इसी साल वाली ताजा धमकी क्यों? आडवाणी से अमेरिकी राजदूत डेविड मल्फर्ड की गुहार क्यों। अमेरिका मनमोहन की मदद पर क्यों उतर आया। अपन को यह समझने में कोई दिक्कत नहीं। फायदा अमेरिका का न होता। तो वह अपन को जूते की नोंक पर रखता। लेफ्ट से बात नहीं बन रही। तो बीजेपी पर डोरे। पर अपन मनमोहन सरकार को याद दिला दें। अट्ठारह जुलाई 2005 को करार का साझा बयान आया। तो अपने यहां 19 जुलाई थी। तब सबसे पहला एतराज वाजपेयी ने जताया था। उनने देर रात लिखित बयान जारी कर सवाल उठाए। अपन जब इतिहास के पन्ने खोलने ही लगे। तो लेफ्ट का काला चिट्ठा भी याद करा दें। बात पंद्रह जुलाई 2005 की। अमेरिका रवाना होने से पहले पीएम ने लेफ्ट लीडरों को बुलाया। मनमोहन के घर से निकलते हुए एबी वर्धन ने कहा था- 'मैंने साझा बयान का प्रारूप देख लिया है। हम उससे अक्षरश: सहमत।' चौथे दिन साझा बयान जारी हुआ। वाजपेयी ने एतराज जताया। पर लेफ्ट ने 19 और 20 को चुप्पी साधे रखी। क्या दो दिन तक लेफ्ट को करार समझ नहीं आया? अमेरिकी अखबारों में बुश के खिलाफ बवाल मचा। तो इक्कीस जुलाई को लेफ्ट की नींद खुली। सीपीएम ने कहा- 'यह भारत की स्वतंत्र परमाणु नीति में दखल होगा।' एबी वर्धन  ने कहा- 'पीएम ने बिना संसद को भरोसे में लिए विदेशनीति बदल डाली।' तो जिस ड्राफ्ट को देखने की बात वर्धन ने कही थी। उसकी खामियां वाजपेयी ने निकाली। तब वर्धन के समझ में आई। बात संसद को भरोसे में लेने की चली। तो अपन इस साल के बजट सत्र की याद दिला दें। हाईड एक्ट बनकर सामने आया। उसका पोस्टमार्टम हुआ। तो एनडीए-लेफ्ट-थर्ड फ्रंट ने मिलकर यही सवाल उठाया था। पर आखिर में लेफ्ट बाकी विपक्ष को गच्चा दे गया। अब वही लेफ्ट संसद की भावना का सवाल तो उठा रहा है। पर नियम-184 में बहस को अब भी तैयार नहीं। गुरुवार को बीजेपी प्रवक्ता जावड़ेकर ने दोहराया- 'बीजेपी संसद में बहस के हक में। ताकि देश को पता चले- संसद करार के खिलाफ। संसद का बहुमत तो वोटिंग से ही जाहिर होगा।' पर लेफ्ट संसद में सरकार गिराने को तैयार नहीं। चुनाव अभी हों, या बजट के बाद। आएगा लंगड़ा जनादेश ही। बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए फिर गठजोड़ करना पड़ेगा। तब जगहंसाई होगी। सो नियम-184 में बहस से परहेज। बात संसद सत्र की चली। तो बताते जाएं- गुजरात चुनाव की वजह से सत्र छोटा होगा। पंद्रह नवंबर से शुरू होता। पर उस दिन छठ। सो अब उन्नीस से सात दिसंबर तक के आसार। सत्र के चक्कर में मनमोहन की विदेश यात्रा न टल जाए। जो बीस से पच्चीस नवंबर तक की तय। सत्र की रणनीति पूरी तरह तैयार। इधर लेफ्ट-यूपीए तलाक होगा। उधर लेफ्ट-यूएनपीए हनीमून शुरू होगा। सोनिया का चीन दौरा भी तलाक और नई शादी रोकने में नाकाम रहेगा। सीपीआई की मुलायम से नफरत दूर हो चुकी। गुरुवार को मुलायम ने अजय भवन में जाकर मत्था टेका। तो एबी वर्धन-डी.राजा ने पुराने सारे पाप माफ कर दिए। वाजपेयी सरकार चलाने के लिए चंद्रबाबू नायडू के पाप भी माफ। जयललिता थर्ड फ्रंट को छोड़ गई। चौटाला कुछ दिन बाद छोड़ेंगे। पर शादी में बाराती रहेंगे। लेफ्ट-यूएनपीए में तलाक के बाद दुबारा शादी पर सहमति हो चुकी। तीस अक्टूबर को दिल्ली के साझा जलसे में शादी का एलान होगा। चौबीस नवंबर को विजयवाड़ा में शादी होगी। जयपुर में रिसेप्शन की योजना।

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