गुलाम नबी के बाद आज से मनमोहन तलवार की धार पर

इतवार को इस्लामाबाद में आत्मघाती हमला हुआ। सोमवार को काबुल में अपनी एबेंसी के सामने। ठीक उसी समय श्रीनगर में एसेंबली के सामने बम फटे। तो अपन को पहली अक्टूबर 2001 याद आ गई। जब जम्मू कश्मीर एसेंबली में बम फटे थे। तीनों आतंकी वारदातों का अपनी सुरक्षा से सीधा ताल्लुक। अब जब नौ जुलाई की रात मनमोहन सिंह टोक्यो से लौटेंगे। तो अपनी सीसीएस हालात पर गौर करेगी ही।  तब तक बात गिरती-पड़ती सरकार की। अपन नहीं जानते- गुलाम नबी पर शनि-मंगल राशियों का असर हुआ होगा। पर गुलाम नबी सरकार सोमवार को निपट गई। बैठे-ठाले अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देकर मुसीबत मोल ली। फिर जब पीडीपी ने समर्थन वापस ले लिया। तो मान-मनोव्वल नहीं की। अलबत्ता गवर्नर एनएन वोहरा को लिख भेजा- 'सात दिन में बहुमत साबित कर दूंगा।' अपन ने तो पहली जुलाई को तभी लिखा था- 'गुलाम नबी सरकार तलवार की धार पर। नेशनल कांफ्रेंस ऐन मौके पर बायकाट करे। तभी सरकार बचेगी।' वही हुआ, जो तलवार की धार पर होता है। वैसे दिल्ली के गलियारों में खुसर-फुसर- 'गुलाम नबी सरकार बचाना चाहते भी नहीं थे।' उनने तो बत्तीस महीने जेल की तरह काटे। गुलाम नबी तो सीएम बनकर जाना ही नहीं चाहते थे। वह तो अहमद पटेल ने दिल्ली की राजनीति से हटवाया। अब जब दिल्ली में चुनावी डुगडुगी बज चुकी। तो गुलाम नबी दिल्ली आने को बेताब। यों भी सोनिया को गुलाम नबी से बेहतर रणनीतिकार नहीं मिलेगा। चुनावी डुगडुगी की बात चली। तो बता दें- कांग्रेस भले ही मुलायम के समर्थन पर इतरा रही हो। पर भरोसा सोनिया गांधी को भी नहीं। सोमवार को उनने चुनाव घोषणा पत्र कमेटी बना दी। चुनावी मुहिम की कमेटी का ऐलान भी कर दिया। लेफ्ट पार्टियों के समर्थन वापसी का मुहर्त आज मुमकिन। मनमोहन ने टोक्यो से बयान देकर खुद उकसाया।   सो दस तक का इंतजार क्यों करें। अब अगर आज लेफ्टिए समर्थन वापस लेंगे। तो आज ही राष्ट्रपति को चिट्ठी देना भले मुमकिन न हो। आखिर राष्ट्रपति आज तिरुचूर में। शाम तक लौटेंगी। तो बुधवार सुबह सही। कांग्रेस कहेगी- 'पीएम के विदेश में होने की मर्यादा भी नहीं रखी।' पर कांग्रेस की मर्यादाएं भी कौन नहीं जानता। मनमोहन ने विदेश जाकर मर्यादा भंग की। प्रणव मुखर्जी से फैसलाकुन मीटिंग की चिट्ठी लिखवाई। टोक्यो में फैसले का ऐलान कर दिया। कांग्रेस ने चरण सिंह, चंद्रशेखर के दिन याद करा दिए। दोनों की सरकार बनवाकर समर्थन वापस ले लिया था। बाद में देवगौड़ा- गुजराल को भी धोखा दिया। अब जब सरकार अपनी। तो अब धोखा समर्थन देने वाले के साथ। यानी चोर चोरी से भले जाए, हेरा-फेरी से नहीं जाता। लेफ्ट मर्यादा में रहा। मंत्रियों ने एटमी करार पर आगे बढ़ने की बयानबाजी की। तो उसी बयानबाजी पर चिट्ठी लिखकर पूछा- 'कब जा रहे हो, आईएईए सेफगार्ड के लिए।' चार दिन कोई जवाब नहीं दिया। आखिरी दिन प्रणव मुखर्जी ने जवाब दिया- 'एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट की फैसलाकुन मीटिंग दस जुलाई को शाम चार बजे होगी।' हालांकि पीएम टोक्यो में ही फैसले का ऐलान कर चुके। कहा- 'जल्द ही जाएंगे, आईएईए में।' यानी सरकार तय कर चुकी। अपन अंतरराष्ट्रीय जानकारों पर भरोसा करें। तो 28 जुलाई तक आईएईए गवर्निंग बोर्ड बैठेगा। अपन तो पहले ही बता चुके- 'बहत्तर घंटे के नोटिस में मीटिंग संभव।' पर बात अब आईएईए -एनएसजी की नहीं। बात सरकार के तलवार की धार पर होने की। मुलायम का समर्थन पाकर मनमोहन भले कितना इतराएं। पर सरकारी आंकड़ा 275 के आसपास। गोवा में कांग्रेस ने बीजेपी विधायकों से इस्तीफा कराकर जो खेल खेला। अब वही खेल बीजेपी कर्नाटक में खेली। तो सोमवार को वीरप्पा मोइली रो रहे थे। अब ऐन वक्त पर मायावती ने मुलायम के दो-चार सांसदों का इस्तीफा करा दिया। तो क्या होगा- मनमोहन का। क्या होगा एटमी करार का। सो गुलाम नबी के बाद अब  तलवार की धार पर मनमोहन।

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